ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजो जो साधन है करते । वे सब इन्हीको बढ़ाते ।
इसीलिये येही जीतते । हठयोगियोंको ॥ ६६ ॥
इंद्रिय दमन, इनको जीतनेका उपाय है—
किंतु इन्हे जीतनेमें एक । उपाय है बडा ही नेक ।
करना हो तो करके देख । कहता हूं तुझे ॥ ६७ ॥
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ ।
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ॥ ४१ ॥
इंद्रिय इनका पहला आसन । वहांसे ही होते हैं कर्म उत्पन्न ।
करना है इंद्रियोका निर्दलन । सर्वथैव ॥ ६८ ॥
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः ।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ॥ ४२ ॥
दौड रुकेगी मनकी । औ' मुक्ति होगी बुध्दिकी ।
नींव हिलेगी इनकी । ये जो पापी ॥ ६९ ॥
मिटे जब ये अंतरंगसे । तभी गये ये जड मूलसे ।
न रहता मग जल जैसे । सूर्य किरण बिन ॥ २७० ॥
एवं बुद्धे परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ॥ ४३ ॥
तभी जीवको ब्रह्म-स्वराज्य मिलेगा—
ऐसे रागद्वेष जब मिटता । ब्रह्मात्मका तब स्वराज्य आता ।
फिर वह् आनंद है भोगता । अपने आप ॥ ७१ ॥
इनका पहला स्थान जीतके इंद्रियां सब ।
टाल तू इस पापीको ज्ञान विज्ञान नाशक ॥ ४१ ॥
इंद्रियोंको कहा श्रेष्ठ उससे श्रेष्ठ है मन ।
मनसे बुद्धि है श्रेष्ठ श्रेष्ठ है उससे प्रभु ॥ ४२ ॥
जान ऐसा प्रभु श्रेष्ठ निजको जीत आप ही ।
काम रूपी महा-शत्रु इसका नाश तू कर ॥ ४३ ॥
ज्ञानेश्वरी १०४