ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंया प्रकृतिमें रत हो कर । इंद्रियोंको दुलारकर ।
मेरे मतको ठुकरा कर । बरतते हैं ॥ ९४ ॥
तथा इसको तुच्छ मानते । इसकी जो अवज्ञा करते ।
इसे बेकार बात मानते । वाचालतासे ॥ ९५ ॥
हैं ये मोह मदिरासे अमित । विषय बिषमें रत सतत ।
अज्ञान कीचमें पतित नित । निःसंशय ॥ ९६ ॥
शवके हाथमें दिया रत्न । जैसे व्यर्थ जाता है अर्जुन ।
जन्मांधको उदयास्त दिन । अनुपयुक्त ॥ ९७ ॥
या हे चंद्रका उदय जैसा । कागको अनुपयुक्त वैसा ।
मूर्खको है विवेक भी वैसा । अरुचिकर ॥ ९८ ॥
वैसे ही जान तू पार्थ । विमुख जो परमार्थ ।
उनसे बात सर्वथा । न की जाती ॥ ९९ ॥
तभी वे कछु न मानते । निंदा भी करने लगते ।
पतंग कैसे क्या सहते । कभी प्रकाश ? ॥ २०० ॥
दीपसे पतंगका आलिंगन । उनका वहां निश्चित मरण ।
ऐसा होता है विषयाचरण । आत्मघातसा ॥ १ ॥
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि ।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥ ३३ ॥
शरीर नाशवान है—
तभी इंद्रियोंका दुलार । न करें कभी जानकर ।
मन रंजनके खातिर । त्याज्य मान ॥ २ ॥
अजी सापसे क्या खेल होगा । या बाघका साथ क्या निभेगा।
या हलाहल कभी पचेगा । खाया तो ॥ ३ ॥
जैसी खेलमें आग लगती । न संभलते बढ़ती जाती ।
वैसी स्थिति इंद्रियोंकी होती । दुलारनेसे ॥ ४ ॥
ज्ञानीकी कर्म-चेष्टा भी चलती निज भावसे ।
स्वभाव वश हैं प्राणी बलात्कार निरर्थक ॥ ३३ ॥
९७ कर्मयोग
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