ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 174, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ें४
ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग
श्रोताओंको ज्ञानेश्वर महाराजका उद्बोधन-
सुकाल हुआ श्रवणेंद्रियोंका । दर्शन हुआ गीता-निधानका ।
अजी ! साकार ही हुआ स्वप्नका । उनको यहां ॥ १ ॥
मूलमें है विवेककी गोष्ठि । कहनेवाला श्रीकृष्ण श्रेष्ठी ।
भक्तराज जो स्वयं किरीटी । सुनते हैं ॥ २ ॥
पंचमालाप है सुगंध । तथा परिमल सुस्वाद ।
वहां है भलासा विनोद । कथानकका ॥ ३ ॥
श्री हरिकी कृपा हुई । अमृतकी गंगा बही ।
तपस्या सफल हुई । श्रोताओंकी ॥ ४ ॥
इंद्रियोंको अब संपूर्ण । बनकर स्वयं श्रवण ।
अनुभवना गीताख्यान । संवाद सुखका ॥ ५ ॥
अब यह अप्रासंगिक । विस्तार छोडके अधिक ।
कहो कृष्णार्जुन हो एक । बोले क्या हैं ॥ ६ ॥
तब संजय बोले राजासे । सुदैव जुड़ा है अर्जुनसे ।
तभी अति प्रीति है उनसे । नारायणकी ॥ ७ ॥
जो न कहा पिता वसुदेवसे । औ' न जो कहा माता देवकीसे ।
या न कहा गुह्य बलभद्रसे । कहा वह पार्थसे ॥ ८ ॥