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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 184

वैसे निष्कर्म्यके भ्रममें । पड़ते हैं कर्म-पाशमें ।
जो दूसरी सृष्टि मनमें । कर सकते ॥ ८७ ॥
मूर्खोंकी यहां कहें क्या बात । क्रांतदर्शी होते मोह-ग्रस्त ।
तभी कहता तुझसे बात । वही अब ॥ ८८ ॥
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः ।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ॥ १७ ॥
तभी कर्म जिसके स्वभावसे । विश्वाकार संभव हो उससे ।
जानना उसे संपूर्ण रूपसे । यहां सर्व प्रथम ॥ ८९ ॥
वर्णाश्रममें फिर उचित । तथा विशेष कर्म विहित ।
जानना उसको सुनिश्चित । उपयोगी जो ॥ ९० ॥
फिर जानना जो निषिद्ध । उसका भी रूप विशद ।
तभी न हो सकता बद्ध । सहज कर्ममें ॥ ९१ ॥
नहीं तो विश्व है कर्माधीन । उसका फैलाव है गहन ।
सुन लक्षण अब तू अर्जुन । बोध प्राप्तोंका ॥ ९२ ॥
कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ।
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥ १८ ॥
कर्मका तिरस्कार और कर्मफलोंमें आशा दोनों नहीं --
करते हुए सकल कर्ममें । अकर्म देखता जो अपनेमें ।
निरपेक्ष होता कर्म संगमें । फलाशासे ॥ ९३ ॥
तथा कर्त्तव्य करनेमें । अन्य न कोई जगतमें ।
ऐसेको बोध अकर्ममें । अच्छा होता है ॥ ९४ ॥
क्रिया कलापका वह संपूर्ण । करता है उत्तम आचरण ।
किंतु इन लक्षणके कारण । जानना ज्ञानी ॥ ९५ ॥
जानना कर्म सामान्य विकर्म भी विशेष जो ।
जानना अकर्ममें भी गूढ जो कर्मकी गति ॥ १७ ॥
अकर्म कर्ममें देखें तथा कर्म अकर्ममें ।
विज्ञ है वह लोगोंमें योगी वह कृतार्थ भी ॥१८॥
ज्ञानेश्वरी ११६