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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 182

फिर नाना हेतु प्रकारसे । यथोचित पूजोपचारसे ।
देवदेवान्तरोंको मान्यतासे । उपासते ॥ ७१ ॥
जो हैं ऐसे अपेक्षित । पाते हैं वैसे समस्त ।
कर्मफल वे निश्चित । जान ले तू ॥ ७२ ॥
बिन कर्मके लेना देना अधिक । निर्भ्रान्त ऐसा नहीं कुछ सम्यक ।
यहां है कर्म ही फल रूपक । मनुष्य लोकमें ॥ ७३ ॥
खेतमें जैसे जो कछु बोया जाता । उसके बिना अन्य न उपजता
अथवा जो देखता वही दीखता । देर्पणमें जैसे ॥ ७४ ॥
या गिरिकंदरामें जैसे । अपने ही शब्द वैसे ।
गूंजते हैं दश दिशासे । निमित्तयोग ॥ ७५ ॥
ऐसे ये सभी भजन । साक्षीभूत हूं अर्जुन ।
प्रति-फलती भावना । अपनी ही ॥ ७६ ॥
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥ १३ ॥
चातुर्वर्ण्य प्राकृतिक गुणोंके कारण—
इसी भांति तू जान । चार हैं ये वर्ण ।
रचे हैं मैंने गुण- । कर्म वि भागसे ॥ ७७ ॥
जो प्रकृतिके आधारसे । गुणोंके व्यभिचारसे ।
कर्मकी तदनुसारसे । योजना की ॥ ७८ ॥
है यहां यह एक अर्जुन । किंतु हुए हैं ये चार-वर्ण ।
ऐसे गुण कर्मके कारण । सहज हुआ ॥ ७९ ॥
तभी सुन तू पार्थ । ये वर्ण-भेद संस्था ।
कर्ता मैं न सर्वथा । इसीलिये ॥ ८० ॥
सृजे मैं ने वर्ण चार गुण-कर्म विभागसे ।
करके सब तू जान अकर्ता निर्विकार मैं ॥ १३ ॥
ज्ञानेश्वरी ११४