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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 166

वैसे तो सुन अर्जुन । शरीर है पराधीन ।
नाना भोग क्यों निर्माण । करें सब ॥ ५ ॥
आयास करके बहुत । सकल ही समृद्ध जात ।
इस देहको अनवरत । पाले क्यों ? ॥ ६ ॥
सर्वस्व तज कर । संपत्तिको पाकर ।
स्वधर्म छोड़कर । पालना देह ॥ ७ ॥
फिर है यह पंच मेलका । अनुसरेगा पंच तत्वका ।
तब अपने किये श्रमका । मूल्य क्या है ? ॥ ८ ॥
केवल शरीर पोषण । धोखा मान असाधारण ।
इस पर अतःकरण । न देना कभी ॥ ९ ॥
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ।
तयोर्न वशमागच्छेत् तो ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥ ३४ ॥
इसलिये स्वधर्माचरण ही करना—
वैसे इंद्रियोंके हितार्थ । विषय दिये नियमित ।
होगा संतोषित चित्त । यह है सच ॥ २१० ॥
किंतु जैसे सभ्य चोरका साथ । केवल समाजमें है विश्वस्थ ।
निश्चित ही है करता जो घात । एकांत आते ही ॥ ११ ॥
अजी विषकी है मधुरता । उपजाती चितमें ममता ।
परिणाममें भयंकरता । प्राणहारी ॥ १२ ॥
जैसे कंटियामें लगाया आमिष । भुलाता है मीनको दिखाके आस ।
वैसे भुलाते हैं विषय सुखाश । इंद्रियोंको ॥ १३ ॥
आमिषमें कांटिया होती । प्राणको वह हर लेती ।
आमिषमें वह छिपी होती । न जानता मीन ॥ १४ ॥
वैसे यहां अभिलाषामें होगा । यदि विषयकी आशा करेगा ।
अभिलाषासे है बलि जायेगा । क्रोधानलका ॥ १५ ॥
इंद्रियोंके स्व-अर्थोंमें रहते राग द्वेष हैं ।
उन्हें वश नहीं होना देहीके पथ-शत्रु वे ॥ ३४ ॥
ज्ञानेश्वरी ९८