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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 168

अजी ! शर्करा तथा दूध । रुचिकर अति प्रसिद्ध ।
है क्रिमिरोगमें निषिद्ध । कैसे सेव्य ॥ २६ ॥
जानकर भी किया सेवन । होगा ही वह दुःख कारण ।
कुपथ्यसे होता है जीवन । अति कष्टकर ॥ २७ ॥
तभी औरोंको जो उचित । अपनेको है अनुचित ।
जो अंतिम हितके हित । अनाचरणीय ॥ २८ ॥
करनेमें स्वधर्मानुष्ठान । नष्ट होता है यदि जीवन ।
तो भी भला है वह अर्जुन । दोनों अर्थसे ॥ २९ ॥
ज्ञान पूर्वक स्वधर्माचरण नहीं करते उनका क्या—
ऐसा समस्त सुरशिरोमणि । बोले जहां श्रीशार्गपाणी ।
अर्जुन कहे वहां विनवणी । सुनो देव ॥ २३० ॥
यह है तेरा कहना । मैंने वह सारा सुना ।
किंतु अब कछु पूछना । मेरे मनकी ॥ ३१ ॥
अर्जुन उवाच
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः ।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥ ३६ ॥
तभी देव यह है कैसा । ज्ञानियोंका स्मृति-भ्रंश-सा ।
पथ-भ्रष्ट होके सहसा । चलते हैं ॥ ३२ ॥
सर्वज्ञ ही हैं वे होते । औ' उपाय भी जानते ।
अधर्ममें व्यभिचरते । वह किस गुणसे ॥ ३३ ॥
अजी ! बीज तथा है भूसा । अंध न जाने चुनना कैसा ।
क्षण भर चतुर भी वैसा । बहकता क्यों ? ॥ ३४ ॥
जो संसारका संग भी हैं छोड़ते । वे संग संसर्गसे गुप्त न होते ।
वनवास छोड़कर भी हैं आते । जन-पदमें ॥ ३५ ॥
अर्जुनने कहा
मनुष्य करता पाप किसकी प्रेरणा लिये ।
जुता हुवा व्यर्थका-सा स्वेच्छाके प्रतिकूल भी ॥ ३६ ॥
ज्ञानेश्वरी १००