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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 167

शिकारी जैसे घेरकर। देखता है सु-अवसर ।
मारनेमें रहे तत्पर । मृगको सदा ॥ १६ ॥
यहां ऐसा ही होता है । संग उचित नहीं है ।
पार्थ काम औ' क्रोध है । अति घातुक ॥ १७॥
उसका आश्रय नहीं करना । मनमें स्मरण भी न धरना ।
ल्लान नष्ट नहीं होने देना । स्वधर्मकी ॥ १८ ॥
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥ ३५ ॥
स्वधर्ममें मृत्यु भी श्रेष्ठ है—
अजी ! स्वधर्म जो है अर्जुन । यदि आचरणमें कठिन ।
किंतु उसीका है अनुष्ठान । शुभदायक ॥ १९॥
यदि पराया आचार । देखनेमें है सुंदर ।
किंतु करना स्वीकार । अपना ही ॥ २२० ॥
शूद्रके घरके मिष्टान्न । खाये कैसे वह ब्राह्मण ।
हुआ भी है अति उद्विग्न । भूखसे ॥ २१ ॥
करना कैसे अनुचित । अनुचित इच्छाको प्राप्त ।
इच्छा हुई तो अनुचित । वह साधना क्या ? ॥ २२ ॥
दूसरोंका घर सुंदर । देखके अपना कुटीर ।
करें गिरानेका व्यापार । उचित क्या ? ॥ २३ ॥
अजी ! है अपनी सती । यदि कुरूप भी होती ।
संसारमें वही गति । वैसे ही यह ॥ २४ ॥
चाहे जैसे असुविधा-जनक । आचरणमें कष्ट-दायक ।
फिर भी स्वधर्म ही है तारक । इह परमें ॥ २५ ॥
अल्प भी अपना धर्म सु-सेव्य पर-धर्मसे ।
स्वधर्ममें भला मृत्यु पर-धर्म भयंकर ॥ ३५ ॥
९९ कर्मयोग