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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 178

वह है देव किस कालका । तू भीहरि है इस कालका ।
तभी दीखता तेरी बातका । असंगत पन ॥ ३८ ॥
किंतु तेरा चरित्र वैसे । हम उसको जाने कैसे ।
तभी वह असत्य ऐसे । नहीं कहता ॥ ३९ ॥
यह बात संपूर्ण ऐसे । कहना मैं समझूं वैसे ।
तूने उस सूर्यको कैसे । किया उपदेश ॥ ४० ॥
भगवान उवाच
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप ॥५॥
तेरे मेरे अनेक जन्म मैं जानता हूं—
कृष्ण कहे तब पांडुसुत । जब था वह विवस्वत ।
तब मैं नहीं था ऐसा चित्त- । भ्रम है तेरा ॥ ४१ ॥
अजी ! तू नहीं जानता सब । जन्म हमारे तुम्हारे अब ।
बीते हैं कितने कैसे कब । यह तू भूला है ॥ ४२ ॥
मैं जिस जिस अवसरमें । अवतरा हूं जिस रूपमें ।
वह सब अपने मनमें । स्मरता पार्थ ॥ ४३ ॥
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोपि सन् ।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया ॥६॥
धर्म रक्षणके लिये मेरा अवतार--
इसीलिये मुझे संपूर्ण । बीतेका होता है स्मरण ।
रहित मैं जन्म मरण । जन्मता प्रकृति योगसे ॥ ४४ ॥
श्रीभगवानने कहा
बीते मेरे कयी जन्म तेरे भी बहु अर्जुन ।
जानता मैं सभी बातें तू उन्हे जानता नहीं ॥ ५ ॥
होते हुये अजन्मा मैं निर्विकार जगत्प्रभु ।
जन्मता हूं स्वमायासे प्रकृति ओढके निज ॥ ६ ॥
ज्ञानेश्वरी ११०