ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहोते वे तप तेजके पुंज । एकायत-ज्ञान-निकुंज ।
पवित्रतामें हैं तीर्थराज । धनुर्धर ॥ ६२ ॥
सहजमें वे मद्भाव हुये । मेरे ही रूपमें एक भये ।
फिर मेरे उनमें न आये । बीच परदा ॥ ६३ ॥
जैसे पीतलके गंज कालिख । मिटे यदि वे दोनों निःशेष ।
सुवर्णत्व इससे अधिक । क्या रहा ? ॥ ६४ ॥
पूर्ण जो यम नियममें । शुद्ध है जो तपज्ञानमें ।
हुये वे मेरे ही रूपमें । निःसंदेह ॥ ६५ ॥
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥ ११ ॥
केवल भ्रमवश मुझ एकको अनेक देखते हैं —
मुझे जो जैसा भजता । उसको वैसा ही देखता ।
दोनोंमें आती एकता । जान यह् ॥ ६६ ॥
वैसे ही मनुष्य मात्र सकल । स्वभावसे ही है भजन-शील ।
हुए ऐस मुझमें ही केवल । पांडुकुमार ॥ ६७ ॥
किंतु ज्ञानाभावसे नाश होता । उससे ही बुद्धिभेद होता ।
उससे जगती है कल्पकता । अनेकत्वकी ॥ ६८ ॥
तभी अभेदमें भेद देखते । मुझे अनामको हैं नाम देते ।
देव देवीके रूपमें पूजते । है जो शब्दसे परे ॥ ६९ ॥
जहां जो सर्वत्र सदा सम । वहां विभाग अधमोत्तम ।
करते हैं मतिसे संभ्रम । विवेचन ॥ ७० ॥
काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः ।
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥ १२ ॥
भजते मुझ जो जैसे वैसे मैं भजता उन्हे ।
मेरे ही मार्गमें आते सभी हैं सब मार्गसे ॥ ११ ॥
देवोंको पूजते जो हैं चाहसे कर्म-सिद्धिकी ।
कर्मकी सिद्धि वे शीघ्र पाते हैं नर-लोकमें ॥ १२ ॥
(15) ११३ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग