ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 179, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंअव्ययत्व मेरा नहीं मिटता । किंतु जन्म मरण हे दीखता ।
यह सब प्रकृतिसे भासता । मुझमें नहीं ॥ ४५ ॥
मिटती नहीं मेरी स्वतंत्रता । दीखती मुझमें कर्माधीनता ।
यह हे भ्रम-बुद्धिसे घड़ता । अन्यथा नहीं ॥ ४६ ॥
एक ही दीखता दूसरा । जो दर्पणका ले आधार ।
किंतु वहां वस्तु विचार । एक मात्र ॥ ४७ ॥
निराकार हूं मैं धनुर्धर । लेकर प्रकृतिका आधार ।
नटता हूं लेकर आकार । कार्यके लिये ॥ ४८ ॥
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥७॥
धर्ममात्र जो संपूर्ण । युगयुगमें रक्षण ।
करना मेरा लक्षण । आदिकालसे ॥ ४९ ॥
भूलता हूं तब अजत्व । छोड़ता हूं निराकारत्व ।
गिरता जब धर्म तत्त्व । अधर्मसे ॥ ५० ॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥८॥
हितार्थ अपने भक्तोंके । आता हूं अवतार लेके ।
मिटाता तब अज्ञानके । अंधकारको ॥ ५१ ॥
अधर्मकी सीमा तोड़ता । पापकी सनद फाड़ता ।
सुखका ध्वज उभारता । सज्जनोंसे ॥ ५२ ॥
दैत्य कुलका संहार करता । साधु जनोंका सम्मान करता ।
धर्म नीतिका मेल बिठाता । धनुर्धर ॥ ५३ ॥
जब है गिरता धर्म जगमें तब अर्जुन !
अधर्म उठता भारी लेता हूं जन्म मैं स्वयं ॥ ७ ॥
रक्षण कर संतोंका दुष्टोंका नाश करने ।
स्थापना करने धर्म जन्मता मैं पुनः पुनः ॥ ८ ॥
१११ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग