धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)
Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press
सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
२९
विनती
॥ शब्द २५ ॥
तुम सतगुरु हम सेवक तुम्हरे ॥ टेक ॥
जो कोइ मारै औ गरियावै, दाद फिरियाद करब तुमहीं से ॥१॥
सोवत जागत के रखपाला, तुमहीं छाँड़ि भजौँ नहिँ औरै ॥२॥
तुम धरनीधर सब्द अनाहद, अमृत भाव करो प्रभु सगरै ॥३॥
तुम्हरी बिनय कहाँ लगि बरनौँ, धरमदास पद गहे हैं तुम्हरे ॥४॥
॥ शब्द २६ ॥
जमुनियाँ की डारि मोरी तोड़ देव हो ॥ टेक ॥
एक जमुनियाँ के चौदह डारि, सार सब्द लेके मोड़ देव हो ॥१॥
काया कंचन अजब पियाला, नाम बूटी रस घोर देव हो ॥२॥
सुरत सुहागिन गजब पियासी, अमृत रस मेँ बोर देव हो ॥३॥
सतगुरु हमरे ज्ञान जौहरी, रतन पदारथ जोरि देव हो ॥४॥
धरमदास की अरज गुसाँईँ, जीवन की बंदी छोर देव हो ॥५॥
॥ शब्द २७ ॥
मिहरबान हैं साहेब मेरा । दिल भर दरसन पाऊँ तेरा ॥१॥
तुम दाता मैं सदा भिखारी । देव दीदार जाउँ बलिहारी ॥२॥
करूँ बंदगी खिजमत दीजै । बकसो चूक दया बहु कीजै ॥३॥
सेवक तैँ बिगरै सौ बारा । सतगुरु साहेब लेव उबारा ॥४॥
औगुन सेवक साहेब जानै । साहेब मन मेँ ना गिल्हानै ॥५॥
धर्मदास लइ तुम्हरि पनाह । अगले पछिले बकस गुनाह ॥६॥
॥ शब्द २८ ॥
बाजा बाजा रहित¹ का, पड़ा नगर मेँ सोर ।
(मेरे) सतगुरु संत कबीर हैं, नजर न आवै और ॥१॥
(१) मुक्ति, उद्धार ।
३० भेद
भूमी पर पग धरत हौ, सुनौ संत मतधीर ।
माथ नाय बिनती करूँ, दर्सन देव कबीर ॥२॥
घाट बाट औघट महीं, मोहिँ कबीर की आस ।
धर्मनि सुमिरै नाम गुरु, कभी न होय बिनास ॥३॥
॥ शब्द २९ ॥
अचवन कीजे गुरु कृपा निधान ॥ टेक ॥
सेवक लिये प्रेम जल भारी, खरिका ब्रह्म गियान ॥१॥
भाव भक्ति सौँ बीरा लीजे, संतन जीवन प्रान ॥२॥
अमी उगाल दास को दीजे, जन को परम कल्यान ॥३॥
हृदय कमल बिच पलँग बिछाऊँ, पौढ़ैं पुरुष पुरान ॥४॥
चरन कमल की सेवा करहूँ, दासा-तन परवान ॥५॥
सुरत की बेनियाँ डोलाऊँ ठाढ़ी, इक टक लाऊँ ध्यान ॥६॥
धरमदास पर दाया कीजे, पूरन पद निरबान ॥७॥
॥ भेद का अंग ॥
॥ शब्द १ ॥
धर्मनि वा देस हमारो बासा, जहँ हंसा करै बिलासा ॥टेक॥
सात सुन्न के ऊपर साहेब, सेतैं सेत निवासा ।
सदा अनंद रहै वा देसा, कबहुँ न जगै उदासा ॥१॥
सूरज चंद दिवस नहिँ रजनी, नाहीँ धरनि अकासा ।
ऐसा अमर लोक है अवधू, केवला फरै बारामासा ॥२॥
ब्रह्मा बिष्नु महेसुर कहिये, छके जोति के पासा ।
चौधा लोक बसै जम चौधा, ये सब काल तमासा ॥३॥
उहाँ के गये बहुरि ना अइहौ, आवागवन भय नासा ।
ब्रह्म अखंडित साहेब कहिये, आपु मेँ आपु प्रगासा ॥४॥
भुलाई हो ॥ ५ ॥
(१) खिलावो।
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Everything looks solid and accurate.कहैं कबीर सुनो हो धर्मनि, छाँड़ो खल कै आसा।
अमृत भोजन हंसा पावै, बैठि पुरुष के पासा ॥ ५
॥ शब्द २ ॥
केहि बिधि प्रीतम पाइये, गुरु राह बताओ ॥ टेक ॥
अरध उरध बिच बागिया, तहँ सुरति लगावो।
अष्ट कँवल दल पाँखुरी, उन को बिहसावो
३२ भेद
बिन सतगुरु कोइ पार न पावै, फिरि फिरि जोनी भूला हो ।
नौ सोहंग परे जिनहीँ से, सोई पुरुष निज मूला हो ॥६॥
तीन देँह उनहीँ से उपजी, कारेन सुछम स्थूला हो ।
कारन देँह मेँ सहज सुरति है, औ अंकूर पसारा हो ॥७॥
सुछम देँह मेँ ओहं सोहं, इनको ख्याल अपारा हो ।
स्थिर देँह मेँ अंस है अच्छर, इच्छा उनसे धारा हो ॥८॥
ते अच्छर तेँ जोति निरंजन, सबको करत अहारा हो ।
ते जोती मेँ तिन¹ देव लागे, जाकै सृष्टि पसारा हो ॥९॥
सात सुन्न दोइ बेसुन कहिये, दसवाँ धाम अखंडा हो ।
समरथ सब्द हमरो अस्थाना, और सकल ब्रह्मांडा हो ॥१०॥
सोरह सुत तेही के माहीं, तेहि बिच पाँचो अंडा हो ।
अमर लोक मेँ पुरुष बिदेही, निगम न पावै पारा हो ॥११॥
उनकी उपमा कहँ लगि बरनौँ, मुख तेँ होय न पारा हो ।
कोटिन सूर चन्द्र तारागन, एक रोम पर वारा हो ॥१२॥
सेत सिंघासन सेत छत्र सिर, सेतहि हंस पियारा हो ।
सेत भूमि जहँ सेत बृच्छ है, सेतहि कमल सुहेला हो ॥१३॥
पारस पान लेहु तुम सुकिरित, तब देखो दरबारा हो ।
कहैँ कबीर सुनो धर्मदासा, तुम सें होइ निरधारा हो ॥१४॥
॥ शब्द ४ ॥
गगन पिय बंसी फेरि बजावो ॥ टेक ॥
भँवर गुफा से उठत बुलबुला, सो अंजन पिय नैन लगावो ॥१॥
जो बंसी सुर नर मुनि मोहे, सो बंसी पिय मोहिँ सुनावा ॥२॥
आनो कुंजी खोलो ताला, मोहनि मूरति मोहिँ दिखावो ॥३॥
धरमदास बिनवै कर जोरी, चरन कँवल तरे मोहिँ लगावो ॥४॥
(१) तीन ।
भेद ३३
॥ शब्द ५ ॥
झरि लागै महलिया, गगन गहराय ॥ टेक ॥
खन गरजै खन बिजुली चमकै,
छहर उठै सोभा बरनि न जाय ॥१॥
सुन्न महल से अमृत बरसै,
प्रेम अनँद होइ साध नहाय ॥२॥
खुली किवरिया मिटी अँधियरिया,
धन सतगुरु जिन दिया है लखाय ॥३॥
धरमदास बिनवै कर जोरी,
सतगुरु चरन मँ रहत समाय ॥४॥
॥ शब्द ६ ॥
हमैँ एक अचरज जानि पड़ै ॥ टेक ॥
जल भीतर इक बृच्छा उपजै, ता मैं अगिन जरै ।
ठाढ़ी साखा पवन झकोरै, दीपक जोति बरै ॥१॥
माथे पर तिरबेनी बहत है, चढ़ि ऊपर असनान करै ।
लरजै गरजै दामिनि दमकै, कामिनि कलस भरै ॥२॥
मट्टी का गढ़ कोट बना है, जा मैं फौज लड़ै ।
सूर बीर कोउ नजरि न आवै, नाहक रार करै ॥३॥
साहेब अमर मरै ना कबहुँ, नाहक सोच करै ।
धरमदास या पद को गावै, फिर कबहूँ न टरै ॥४॥
॥ शब्द ७ ॥
आठ चाम कै गुरिया रे, मन माला फेर सबेरिया ॥टेक॥
अमी रस निकसत राग, फाग तंत भनकरिया ।
नाम से और सौदा नहिँ भावै, पिय की मौज छहरिया ॥१॥
५
३४ भेद
मिलहु सत्त सुकृत रस भोगो, होवहु प्रेम पियरिया ।
मीच होहु तन मन धन जारो, जैसे सती सिँगरिया ॥ २ ॥
नव दिसि द्वार तपत तहँ देखो, दसवैँ खोल किवरिया ।
पाँच रागिनी झुमक पचीसो, छठएँ धरम नगरिया ॥ ३ ॥
अजपा लागि पागि रहै डोरी, निरखो सुरति सुँदरिया ।
धरमदास के साहेब कबीरा, लै पहुँचावो सत्त नगरिया ॥ ४ ॥
॥ शब्द ८ ॥
बिरले साधू पावै हो, रतनन कै माला ॥ टेक ॥
मुलुक मँडल चौकी बनी, पूरन धर्मसाला ।
वोहि में आपु बिराजै हो, प्रभु दीनदयाला ॥ १ ॥
चाँद सुरज मानिक भये, करु सुरति कै धागा ।
हर दम हर दम फेरो हो, अंतर गुरु माला ॥ २ ॥
पाँच तत्त कै पिंजरा हो, हीरा लागे आस ।
वोहि मँ साहेब रमि रह्यो, कोटिन भानु प्रकास ॥ ३ ॥
नर नारी मँ ढूँढ़ो हो, घट घट मँ माला ।
कहैं कबीर धर्मदास से, निज होत निहाला ॥ ४ ॥
॥ शब्द ६ ॥
खेलत रहलौँ बाबा चौबरिया,
आइ गये अनहार¹ हो ।
राँध परोसिन भेंटहूँ न पायाँ,
डोलिया फँदाय लिये जात हो ॥ १ ॥
डोलिया से उतरो उत्तर दिस धनि,
नैहर लागल आग हो ।
सब्दै छावल साहेब के नगरिया,
जहँवाँ लिआय लिये जात हो ॥ २ ॥
(१) ले जाने वाला ।
भेद ३५
भादौं नदिया अगम बहै सजनी,
सूझै वार न पार हो।
अब की बेर साहेब पार उतारो,
फिर न आइब संसार हो॥ ३॥
डोलिया से उतरो साहेब घर सजनी,
बैठो घूँघुट टार हो।
कहैं कबीर सुनो धर्मदासा,
पाये पुरुष अपार१ हो॥ ४॥
॥ शब्द १० ॥
अचरज ख्याल हमारे देसवा॥ टेक॥
हमरे देसवा बादर उमड़ै, नान्हो परै फोहरिया।
बैठि रहौं चौगान चौक में, भीँजै हमरी देँहिया॥ १॥
हमरे देसवा उरधमुख कुँइया, साकर वा की खोरिया।
सुरत सुहागिनि जल भरि लावै, बिन रसरी बिन डोरिया॥ २॥
हमरे देसवा चूनरि उपजै, मँहगे मोल बिकइया।
की तो लेइहैँ सतगुरु साहेब, की कोइ साध सुजनिया॥ ३॥
हमरे देसवा बाजा बाजै, गैबी उठे अवजवा।
साहेब धरमदास मगन है, बैठे तखत परगसवा॥ ४॥
॥ शब्द ११ ॥
सबद् सिँहासन पाट मेँ, तुम हंसा बैठो जाई हो॥ टेक॥
कौन नाम मुक्तामनी हो, कौन नाम वे हंस।
कौन नाम वे पुरुष हैं हो, कौन नाम वे अंस॥ १॥
अपर नाम मुक्तामनी हो, अग्र नाम वे हंस।
ज्ञान नाम वे पुरुष हैं हो, सुरति नाम वे अंस॥ २॥
(१) एक लिपि में "अपार" की जगह "पुरान" है।
३६ भेद
मूल दीप निज दीप है, हो, तुमहिँ सुनो हम पाँह ।
बैठि हंस उबारिये हो, सोहंगम के बाँह ॥ ३ ॥
जम्बू दीप के हंसा भाई, पाँजी बैठो आय । -
कहैँ कबीर धर्मदास से, तुम लावो बाँह चढ़ाय ॥ ४ ॥
॥ शब्द १२ ॥
बुढ़िया ने काता सूत, जोलहवा ने बीना हो ।
दरजी ने टुक टुक कीन्ह, दरद नहिँ जाना हो ॥ १ ॥
भेड़ी चरावत बाघ, मूस रखवारा हो ।
मेंगुची१ ने बाँधा ताल, सिंह के टाटा हो ॥ २ ॥
गोड़िया२ पसारा जाल, ऊँट एक बाझा हो ।
दुलहिनि के सिर मौर, बिलारी साजा हो ॥ ३ ॥
भाँड़ा गढ़त कौँहार, मास दस लागा हो ।
छिनहिँ में जात बिलाइ, बिलंब नहिँ लागा हो ॥ ४ ॥
यह मंगल सतलोक, हंस जन गावहिँ हो ।
कहैँ कबीर धर्मदास, अमर पद पावहिँ हो ॥ ५ ॥
॥ शब्द १३ ॥
मैं ब्योपारी नाम का, हाटे चल भाई ॥ टेक ॥
जस कुम्हरा कै चाक घुमै, वैसे नर घूमै ।
इँगल पिंगल के मद्ध मेँ, जिन पवन चलाई ॥ १ ॥
बिन रसना रटना करै, नहिँ जीभ डोलाई ।
कसि के बाँधो कामदेव, तब अलख लखाई ॥ २ ॥
पूरब दिस को जाइ कै, खिरकी खोलवावो ।
तिरबेनी के घाट पर, हंसा नहवावो ॥ ३ ॥
(१) मेंढकी । (२) कहार, धीमर ।
- भेद - ३७
तीन लोक दसवाँ दिसा, जम रोके द्वारा ।
कहैँ कबीर धर्मदास से, हंसा समुझावो ॥ ४ ॥
॥ शब्द १४ ॥
सुकृत फूल गुलाब को, सब घट रह्यो समाय ।
कहो कैसे कर पाइये, गुरु बिन लख्यो न जाय ॥ १ ॥
तीन त्रिकुट के ऊपर, फूल सोहंगम फूल ।
जहाँ रह्यो आसन धर्म को, बिन अच्छर निज मूल ॥ २ ॥
चार जोजन के ऊपर, पुरुष बिदेही पूर ।
जगर मगर वो नगर है, बाजै अनहद तूर ॥ ३ ॥
अपने ढिगे हम खड़े, सतगुरु दियो बताय ।
खिड़की खोल देखाइया, राह गगन की जाय ॥ ४ ॥
कहैँ कबीर धर्मदास से, परगट दियो अनाय ।
जो हंसा चढ़ि जावही, नहिँ पुनि आवै जाय ॥ ५ ॥
॥ शब्द १५ ॥
हीरा झलकै द्वार पर, निरखै कोइ सूरा हो ॥ टेक ॥
जिमीँ आसन है संत को, बैठे हहिँ धीरा हो ।
सुन्न समाधि लगाइ के, पहुँचे वहि तीरा हो ॥ १ ॥
बाजै बिरहिन बाँसुरी, सुनि के गइ पीरा हो ।
आठ पहर नौबत झरै, अति गरुअ गँभीरा हो ॥ २ ॥
गंग जमुन के बीच मेँ, एक झिरहिर नीरा हो ।
पूरब से पच्छिम भये, अति गगन गँभीरा हो ॥ ३ ॥
यह हीरा अनमोल है, सब के घट पूरा हो ।
कहहिँ कबीर धर्मदास से, पायो पद पूरा हो ॥ ४ ॥
३८ मंगल
॥ मंगल ॥
॥ शब्द १ ॥
सतगुरु के उपदेस, फिरो धन बावरी ।
उठि चलो आपन देस, इहै भल दाव री ॥१॥
हम कहि दिया है सनेस, तुम्हारे पीव का ।
बिनु समुझे नहिँ काज, आपने जीव का ॥२॥
जुगन जुगन हम आइ, कहा समुझाइ कै ।
बिनु समुझे धनि परिहौ, काल मुख जाइ कै ॥३॥
काम क्रोध मद लोभ, छाँडु सब दुंद रे ।
का सोवै दिन रैन, बिरहिनी जागु रे ॥४॥
भव सागर की आस, छाँडु सब फंद रे ।
फिरि चलु आपन देस, यहीँ भल रंग रे ॥५॥
सुन सखि पिय कै रूप, तो बरनत ना बने ।
अजर अमर तो देस, सुगंध सागर भरे ॥६॥
फूलन सेज सँवार, पुरष बैठे जहाँ ।
ढुरै अग्र कै चँवर, हंस राजै जहाँ ॥७॥
कोटिन भानु अँजोर, रोम एक मेँ कहा ।
ऊगे चन्द्र अपार, भूमि सोभा जहाँ ॥८॥
सेत बरन वह देस, सिँहासन सेत है ।
सेत छत्र सिर धरे, अभय पद देत है ॥६॥
करो अजपा कै जाप, प्रेम उर लाइये ।
मिलो सखी सत पीव, तो मंगल गाइये ॥१०॥
जुगन जुगन अहिवात१, अखंड सो राज है ।
पिय मिले प्रेमानन्द, तो हंस समाज है ॥११॥
(१) सोहाग ।
मंगल ३९
कहैँ कबीर पुकार, सुनो धर्मदास हो ।
हंस चले सतलोक, पुरुष के पास हो ॥१२॥
॥ शब्द २ ॥
खोजहु संत सुजान सो मारग पीव को ।
समुझि सब्द देहु स्रवन, मूल जहँ जीव को ॥१॥
भव सागर अगम अथाह, लहर बिकरार है ।
कठिन है पाँचो¹ मार्ग, बिचे जम धार है ॥२॥
सिव संकर, औ ब्रह्मा, पार न पावहीँ ।
यह बहिया बलजोर, संत पार लगावहीं ॥३॥
देहिँ नाम निज डोरि, तो दुख बिसरावहीँ ।
बिन जल लहर अनूप, मोती झलकावहीं ॥४॥
मारग पंथ सिधार, तो आरति साजहीँ ।
देहिँ छत्र उँजियार, तो लोक सिधावहीं ॥५॥
बैठे अनहद महल, प्रेम गुन गावहीं ।
संग मेँ सुमति सयानी, तो नेह लगावहीँ ॥६॥
सतगुरु जग मेँ आइ, तो जीव चेताइया ।
सार सब्द लखवाइ, तो लोक पठाइया ॥७॥
का लै पान खियाउँ, तो तिनका तोरही ।
कवन सब्द की ओट, सो नरियर मोरही ॥८॥
संत अंक लिखि दीन्ह, तो पान खियावही ।
सार सब्द की ओट सो, नरियर मोरही ॥६॥
नरियर भेद अगम्म, बंस जन मोरही ।-
कहैँ कबीर धर्मदास, जिवन बँदि छोरही ॥१०॥
(१) पंच दूत ।
" -> "गावहीँ" / "पावहीँ".
Wait, let's look at line 20:
"संग नहिँ जाइया।" -> 'नहिँ' has a candrabindu over 'हि'!
Line 21:
"नहीं ठहराइया" -> look over 'हीं': yes, there is a candrabindu: "नहीँ"!
Wait, in line 21, let's look closely at "नहीं":
It has a candrabindu: "नहीँ".
Let's check line 15:
"गावहीँ ।"
Line 16:
"पावहीँ ॥७॥"
Wait, let's look at line 7:
"चंदन अँगना लिपाइ के, चौक पुराइये।"
Wait, is there a chandrabindu on 'अँगना'?
Yes, 'अँगना'.
Let's check line 22:
"पाँच चोर बड़ जोर, कुसँगि एते घने।"
"पाँच" has candrabindu: 'पाँच'.
"कुसँगि" has candrabindu: 'कुसँगि' or anusvara? It looks like candrabindu: 'कुसँँगि' or 'कुसँगि'. In Unicode, 'कुसँगि' with anusvara or candrabindu? Let's check: it has a crescent with dot: 'कुसँकि' or 'कुसँगि'. It's 'कुसँगि
मंगल ४१
इन ठगियन को पकरि, जो कोई लीजिये ।
जोर करैँ तब हाथ, छोड़ि नहिँ दीजिये ॥५॥
चार कोस लै गाँव, ठाँव एकौ नहीं ।
द्वादस नगर मँझार, जो पुरुष बिराजहीँ ॥६॥
सोभा अगम अपार, पुरुष को ध्याइये ।
द्वादस नगर सँझार, दरस सुख पाइये ॥७॥
कहैँ कबीर धर्मदास, सोई पिय चीन्हिये ।
सुरति निरति लै, गैल बहुरि नहिँ फेरिये ॥८॥
॥ शब्द ५ ॥
यह जिव रहत भुलाइ, घने दिन चार को ।
बाँह पकरि सतगुरु की, चलो भव पार को ॥१॥
तेजि१ कुमति बेकार, सुमति गहि लीजिये ।
सतगुरु सरन सम्हार, चरन चित दीजिये ॥२॥
गहि सतगुरु के चरन, चलो भव पार को ।
बहुरि न मिलना होय, पीर हरो जीव को ॥३॥
चलहु आपने देस, पुरुष बल जोर लइ ।
लाँघो अवघट घाट, कँवल छवि छाजई ॥४॥
गगन गुफा के घाट, निरंजन भेंटिये ।
चीन्हो कलसा जाइ, अगम तहँ गम किये ॥५॥
निरंकार निज रूप, सो हिरदे देखिये ।
अगम महल मेँ जाइ, पिया जहँ भेंटिये ॥६॥
पुहुप दीप के मद्ध, पुरुष का नूर है ।
कहैँ कबीर धर्मदास, सोई भरपूर है ॥७॥
(१) तजि कर ।
६
४२ मंगल
॥ शब्द ६ ॥
चलो हंसा सतलोक हमारे, छाँड़ो यह संसारा हो ।
यह संसार काल जम फंदा, कर्म का जाल पसारा हो ॥१॥
चौदह लोक बसत वा के मुख में, सब को करत अहारा हो ।
जारि भूँजि कोइला करि डारै, फिर फिरि दै औतारा हो ॥२॥
ब्रह्मा बिष्नु सिव देंह धरि आये, उन कै कौन बिचारा हो ।
सुर नर मुनि सब छल बल मारे, लै चौरासी डारा हो ॥३॥
मद्ध अकास आपु जहाँ बैठे, सेत सरूप अकारा हो ।
उन कै रूप कहाँ लगि बरनौं, संख आन उँजियारा हो ॥४॥
नौ मुकाम दसएँ अस्थाना, जहाँ बसै पुरुष पुराना हो ।
कोटि चाँद सूरज छिपि जैहै, एक रोम परगासा हो ॥५॥
सेत सरूप सब्द जहाँ फूले, हंसा करत बिहारा हो ।
जो जो सरनि गहे सतगुरु के, उन कै होत उबारा हो ॥६॥
वोहि देसवा एक अजर बस्तु है, बरसत अमृत धारा हो ।
कहैं कबीर सुनो धर्मदासा, लखो पुरुष दरबारा हो ॥७॥
॥ शब्द ७ ॥
सतगुरु सरन में आइ, तो तामस त्यागिये ।
ऊँच नीच कहि जाय, तो उठि नहिं लागिये ॥१॥
उठि बोलै रारै रार, सो जानो धीँच१ है ।
जेहि घट उपजै क्रोध, अधम अरु नीच है ॥२॥
माला वा के हाथ, कतरनी काँख में ।
सूझै नाहीं आगि, दबी है राख में ॥३॥
अमृत वा के पास, रुचै नहिं राँड़ को ।
स्वान को यही सुभाव, गहै निज हाड़ को ॥४॥
(१) टँटी, झगड़ा बढ़ाने वाला ।
द्वितीय भाग: मंगल, बसंत, चांचर, हिंडोला एवं अमर आरती उपसंहार
मंगल ४३
का भे बात बनाये, परचे नहिँ पीव सोँ।
अंतर का बदफैल, फैल गै जीव सोँ ॥५॥
कहैँ कबीर पुकारि, सुनो धर्म आगरा।
बहुत हंस लै साथ, उतरो भव सागरा ॥६॥
॥ शब्द ८ ॥
पढ़ सुगना सत नाम, बैठ तन ताख में।
चार दिना का रंग, मिलै तन खाक में ॥१॥
लावहु तेल फुलेल, काया है चाम की।
अ्र्द गर्द मिलि जाय, दोहाई सत नाम की ॥२॥
नीब न मीठी होय, सींचे गुड़ घीव से।
जा कर जौन सुभाव, छुटै नहिँ जीव से ॥३॥
जहाँ सौदागर होय, तहाँ कछु भाखिये।
बिन गाहक बिन मोल, बस्तु ना खोलिये ॥४॥
चौमुख दीपक बारि, महल बिच सोइये।
नौ नारी से नेह, अकि छिन रोइये ॥५॥
चेतहु संत सुजान, तो जम से रड़ि है।
काल के हाथ गुलेल, तड़ाका मारिहै ॥६॥
धरती है मस्तूल, तंबु असमान है।
नौ लख जरत मसाल, सीढ़ी बंकनाल है ॥७॥
आगम कहैँ कबीर, सुनो धर्म आगरा।
बहुत हंस लेइ साथ, उतरो भव सागरा ॥८॥
॥ शब्द ९ ॥
चढ़ि अमवा की डारि, अकेली धन का रे खड़ी।
चले जाव मुरुख गँवार, मोरी तोहि का रे पड़ी।
४४ मंगल
की तोरी सासू दारुनिया, की नैहर दूर बसै ।
की तोरे पिय परदेस, जोहत वा की बाट खड़ी ॥२॥
ना मोरी सासू दारुनिया, न नैहर दूर बसै ।
हमरे बलम परदेस, जोहत वा की बाट खड़ी ॥३॥
पचरँग पहिरु चुनरिया, ऊपर धरो आरसी ।
सतगुरु संग सुजान, समुझै मोर पारसी ॥४॥
यह मंगल सतलोक, हंस जन गावहीँ ।
कहैं कबीर धर्मदास, प्रेम पद पावहीँ ॥५॥
॥ शब्द १० ॥
चढ़ि नौरँगिया की डार, कोइलिया बोलै हो ।
अगम महल चढ़ि चलो, जहाँ पिय से मिलो ॥१॥
मिलि चलो आपन देस, जहाँ छबि छाजई ।
`त सब्द जहाँ खिले, हंस होइ आवही ॥२॥
्य बस्तु मिलि जाय, सब्द टकसार हो ।
हुँ दिस लागी झलरिया, तो लोक असंख हो ॥३॥
ंबु दीप एक देस, पुरुष जहँ रहहि हो ।
हैं कबीर धर्मदास, बिछुरन नहिँ होइ हो ॥४॥
॥ शब्द ११ ॥
साहेब पतिया पठाये, सो हंसा बाँचे हो ।
पाती बाँचि घर जावो, पुरुष के पासे हो ॥१॥
मन रंग पालान, सुरति की काठी हो ।
अनहद सब्द सवार, अनँत कला सोभा हो ॥२॥
कामिनि करहि सिंगार, हंसा सुनु बानी हो ।
आवो पलँग चढ़ि बैठो, तो दरसन देहु हो ॥३॥
हंसा सब्द बिदेह, रूप नहिँ रेखा हो ।
कामिनि रहत लजाय, सोभा निजु देखा हो ॥४॥
धर्मराय उठि बोले, हंसा सुनि लेहु हो ।
कहँ को कियो है पयान, सो कहो समुझाइ हो ॥५॥
तब हंसा अस बोले, सुनो धर्मराय हो ।
पाये पुरुष के पान, तौ लोक के जाइब हो ॥६॥
तब धर्मराय पुनि बोले, हंसा सुनि लेहु हो ।
जाहु पुरुष के पास, सीस पगु देहु हो ॥७॥
मानसरोवर ताल, जहाँ अमी सागर हो ।
हंसा करै बिसराम, तो अग उजागर हो ॥८॥
अमर लोक एक दीप, तो सोभा सुहेल हो ।
तहँ हंसन कै बास, सुरति मिलि खेलै हो ॥६॥
अनहद धाम अचिंत, पुरुष जहँ छाजै हो ।
अमर लोक निज धाम, हंसन कै देसा हो ॥१०॥
कहैं कबीर पुकारि, सुनो धर्मदासा हो ।
वह तो अगम अगाध, पहुँचे कोइ हंसा हो ॥११॥
॥ शब्द १२ ॥
सूतल रहलौँ मैं सखियाँ, तो बिष कर आगर हो ।
सतगुरु दिहलैँ जगाइ, पायौँ सुख सागर हो ॥१॥
जब रहली जननी के ओदर१, परन सम्हारल हो ।
जब लौं तन में प्रान, न तोहि बिसराइब हो ॥२॥
एक बुंद से साहेब, मँदिल बनावल हो ।
बिना नैंव कै मंदिल, बहु कल लागल हो ॥३॥
(१) मा के पेट यानी गर्भ में ।
४६ मंगल
इहवाँ गाँव न ठाँव, नहीँ पुर पाटन हो।
नाहिन बाट बटोही, नहीँ हित आपन हो ॥४॥
सेमर है संसार, सुवा उधराइल हो।
सुंदर भक्ति अनूप, चले पछिताइल हो ॥५॥
नदी बहै अगम अपार, पार कस पाइब हो।
सतगुरु बैठे मुख मोरि, काहि गोहराइब हो ॥६॥
सत्तनाम गुन गाइब, सत ना डोलाइब हो।
कहैँ कबीर धर्मदास, अमर घर पाइब हो ॥७॥
॥ शब्द १३ ॥
धनुष बान लिये ठाढ़, जोगिनि एक माया हो।
छिनहिं में करत बिगार, तनिक नहिं दाया हो ॥१॥
फिर फिर बहै बयार, प्रेम रस डोलै हो।
चढ़ि नौरँगिया की डार, कोइलिया बोलै हो ॥२॥
पिया पिया करत पुकार, पिया नहिँ आया हो।
पिय बिनु सून मँदिलवा, बोलन लागे कागा हो ॥३॥
कागा हो तुम का रे, कियो बटवारा१ हो।
पिया मिलने की आस, बहुरि ना छूटहि हो ॥४॥
कहैँ कबीर धर्मदास, गुरू सँग चेला हो।
हिलि मिलि करो सतसंग, उतरि चलो पारा हो ॥५॥
॥ शब्द १४ ॥
सखि अनहद धाम निवास, सो देखो ये घड़ी।
तहँ पहुँचे कोइ दास, सो देखो० ॥ १ ॥
सुख कोइ एक सर हंस, सो देखो० ।
परखि गहो निज नाम, सो देखो० ॥ २ ॥
१) चारह बाट यानी बेठिकाने या इधर उधर।
मंगल ४७
जन्म जन्म दुख मिटे, सो देखो०।
लइ राखो निज धाम, सो देखो० ॥ ३ ॥
अक्षय वृक्ष के डहर समाय, सो देखो० ।
सत्त नाम परताप, सो देखो० ॥ ४ ॥
हंसा निज घर चले, सो देखो० ।
काल रहा मुरझाय, सो देखो० ॥ ५ ॥
अधर दुलीचा अमर पद, सो देखो० ।
सतगुरु दिया बिछाय, सो देखो० ॥ ६ ॥
धर्मनि मिले कबीर, सो देखो० ।
हिलि मिलि करहि कलोल, सो देखो० ॥ ७ ॥
॥ शब्द १५ ॥
गुन कर बौरी, जब लौं नैहर माहिँ हो ।
फिरि जैहौ ससुरारि, पिया के पास हो ॥ १ ॥
जब लगि राज पिया कर, तू सुख करि ले हो ।
सासु ननदिया दारुन, उत्तर जनि देहु हो ॥ २ ॥
सतगुरु डोलिया फँदावल, लगे चार कहार हो ।
आगे चलै मोर साहेब, पाछे चालनहार हो ॥ ३ ॥
जाइ उतारे वोहि देसवाँ, जहँ दिस न दुवार हो ।
मोतियन चुनि घर बने, हीरा लगे किवार हो ॥ ४ ॥
चंद्र लगन मोर अँचरा, सुरज लगन मोर देँह हो ।
हद्दे लगन मोरा साहेब, जहँ लगि फैले दृष्टि हो ॥ ५ ॥
मन मन बिहसै दुलहिनि, अमर बर पाये हो ।
साहेब कबीर कै दिहल, सुनि ले धर्मदास हो ॥ ६ ॥
हो ॥ १ ॥
Line 4: घटहि में मानसरोवर, घाट बँधावो हो ।
Line 5: घटहि में पाँच कहार, दूलह नहवावहिँ हो ॥ २ ॥
Line 6: घटहि में नेह नउनिया, तो चरन पखारहिँ हो ।
Line 7: प्रेम प्रीत के ललना, तो पलना झुलावहिँ हो ॥ ३ ॥
Line 8: घटहि में दया के दरजी, तो दरज मिलावहिँ हो ।
Line 9: पाँच तत्त के जामा, दुलह पहिरावहिँ हो ॥ ४ ॥
Line 10: घटहि में लोह लोहार, तो कँगना डावहिँ१ हो ।
Line 11: तीन गुनन के सेहरा, दुलह पहिरावहिँ हो ॥ ५ ॥
Line 12: घटहि में चंदन चौक, तो चौक पुरावहिँ हो ।
Line 13: सत्त सुकृत को कलसा, तहाँ धरावहिँ हो ॥ ६ ॥
Line 14: घटहि में मन सत माली, तो मौर ले आवहि हो ।
Line 15: घटहि में जुगति कै जौहरि, जोत पहिरावहि हो ॥ ७ ॥
Line 16: घटहि सोहंगम नारि, तो पिय को रिझावहि हो ।
Line 17: बार बार गुरु झगरि, तो अरज सुनावहि हो ॥ ८ ॥
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