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धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press

सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished98 पृष्ठ

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पृष्ठ 48

भेद ३५
भादौं नदिया अगम बहै सजनी,
सूझै वार न पार हो।
अब की बेर साहेब पार उतारो,
फिर न आइब संसार हो॥ ३॥
डोलिया से उतरो साहेब घर सजनी,
बैठो घूँघुट टार हो।
कहैं कबीर सुनो धर्मदासा,
पाये पुरुष अपार१ हो॥ ४॥
॥ शब्द १० ॥
अचरज ख्याल हमारे देसवा॥ टेक॥
हमरे देसवा बादर उमड़ै, नान्हो परै फोहरिया।
बैठि रहौं चौगान चौक में, भीँजै हमरी देँहिया॥ १॥
हमरे देसवा उरधमुख कुँइया, साकर वा की खोरिया।
सुरत सुहागिनि जल भरि लावै, बिन रसरी बिन डोरिया॥ २॥
हमरे देसवा चूनरि उपजै, मँहगे मोल बिकइया।
की तो लेइहैँ सतगुरु साहेब, की कोइ साध सुजनिया॥ ३॥
हमरे देसवा बाजा बाजै, गैबी उठे अवजवा।
साहेब धरमदास मगन है, बैठे तखत परगसवा॥ ४॥
॥ शब्द ११ ॥
सबद् सिँहासन पाट मेँ, तुम हंसा बैठो जाई हो॥ टेक॥
कौन नाम मुक्तामनी हो, कौन नाम वे हंस।
कौन नाम वे पुरुष हैं हो, कौन नाम वे अंस॥ १॥
अपर नाम मुक्तामनी हो, अग्र नाम वे हंस।
ज्ञान नाम वे पुरुष हैं हो, सुरति नाम वे अंस॥ २॥
(१) एक लिपि में "अपार" की जगह "पुरान" है।