धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)
Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press
सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 45, कुल 98 में से
संदर्भ में पढ़ें३२ भेद
बिन सतगुरु कोइ पार न पावै, फिरि फिरि जोनी भूला हो ।
नौ सोहंग परे जिनहीँ से, सोई पुरुष निज मूला हो ॥६॥
तीन देँह उनहीँ से उपजी, कारेन सुछम स्थूला हो ।
कारन देँह मेँ सहज सुरति है, औ अंकूर पसारा हो ॥७॥
सुछम देँह मेँ ओहं सोहं, इनको ख्याल अपारा हो ।
स्थिर देँह मेँ अंस है अच्छर, इच्छा उनसे धारा हो ॥८॥
ते अच्छर तेँ जोति निरंजन, सबको करत अहारा हो ।
ते जोती मेँ तिन¹ देव लागे, जाकै सृष्टि पसारा हो ॥९॥
सात सुन्न दोइ बेसुन कहिये, दसवाँ धाम अखंडा हो ।
समरथ सब्द हमरो अस्थाना, और सकल ब्रह्मांडा हो ॥१०॥
सोरह सुत तेही के माहीं, तेहि बिच पाँचो अंडा हो ।
अमर लोक मेँ पुरुष बिदेही, निगम न पावै पारा हो ॥११॥
उनकी उपमा कहँ लगि बरनौँ, मुख तेँ होय न पारा हो ।
कोटिन सूर चन्द्र तारागन, एक रोम पर वारा हो ॥१२॥
सेत सिंघासन सेत छत्र सिर, सेतहि हंस पियारा हो ।
सेत भूमि जहँ सेत बृच्छ है, सेतहि कमल सुहेला हो ॥१३॥
पारस पान लेहु तुम सुकिरित, तब देखो दरबारा हो ।
कहैँ कबीर सुनो धर्मदासा, तुम सें होइ निरधारा हो ॥१४॥
॥ शब्द ४ ॥
गगन पिय बंसी फेरि बजावो ॥ टेक ॥
भँवर गुफा से उठत बुलबुला, सो अंजन पिय नैन लगावो ॥१॥
जो बंसी सुर नर मुनि मोहे, सो बंसी पिय मोहिँ सुनावा ॥२॥
आनो कुंजी खोलो ताला, मोहनि मूरति मोहिँ दिखावो ॥३॥
धरमदास बिनवै कर जोरी, चरन कँवल तरे मोहिँ लगावो ॥४॥
(१) तीन ।