धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)
Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press
सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभेद ३३
॥ शब्द ५ ॥
झरि लागै महलिया, गगन गहराय ॥ टेक ॥
खन गरजै खन बिजुली चमकै,
छहर उठै सोभा बरनि न जाय ॥१॥
सुन्न महल से अमृत बरसै,
प्रेम अनँद होइ साध नहाय ॥२॥
खुली किवरिया मिटी अँधियरिया,
धन सतगुरु जिन दिया है लखाय ॥३॥
धरमदास बिनवै कर जोरी,
सतगुरु चरन मँ रहत समाय ॥४॥
॥ शब्द ६ ॥
हमैँ एक अचरज जानि पड़ै ॥ टेक ॥
जल भीतर इक बृच्छा उपजै, ता मैं अगिन जरै ।
ठाढ़ी साखा पवन झकोरै, दीपक जोति बरै ॥१॥
माथे पर तिरबेनी बहत है, चढ़ि ऊपर असनान करै ।
लरजै गरजै दामिनि दमकै, कामिनि कलस भरै ॥२॥
मट्टी का गढ़ कोट बना है, जा मैं फौज लड़ै ।
सूर बीर कोउ नजरि न आवै, नाहक रार करै ॥३॥
साहेब अमर मरै ना कबहुँ, नाहक सोच करै ।
धरमदास या पद को गावै, फिर कबहूँ न टरै ॥४॥
॥ शब्द ७ ॥
आठ चाम कै गुरिया रे, मन माला फेर सबेरिया ॥टेक॥
अमी रस निकसत राग, फाग तंत भनकरिया ।
नाम से और सौदा नहिँ भावै, पिय की मौज छहरिया ॥१॥
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