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धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press

सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished98 पृष्ठ

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पृष्ठ 43

३० भेद
भूमी पर पग धरत हौ, सुनौ संत मतधीर ।
माथ नाय बिनती करूँ, दर्सन देव कबीर ॥२॥
घाट बाट औघट महीं, मोहिँ कबीर की आस ।
धर्मनि सुमिरै नाम गुरु, कभी न होय बिनास ॥३॥
॥ शब्द २९ ॥
अचवन कीजे गुरु कृपा निधान ॥ टेक ॥
सेवक लिये प्रेम जल भारी, खरिका ब्रह्म गियान ॥१॥
भाव भक्ति सौँ बीरा लीजे, संतन जीवन प्रान ॥२॥
अमी उगाल दास को दीजे, जन को परम कल्यान ॥३॥
हृदय कमल बिच पलँग बिछाऊँ, पौढ़ैं पुरुष पुरान ॥४॥
चरन कमल की सेवा करहूँ, दासा-तन परवान ॥५॥
सुरत की बेनियाँ डोलाऊँ ठाढ़ी, इक टक लाऊँ ध्यान ॥६॥
धरमदास पर दाया कीजे, पूरन पद निरबान ॥७॥
॥ भेद का अंग ॥
॥ शब्द १ ॥
धर्मनि वा देस हमारो बासा, जहँ हंसा करै बिलासा ॥टेक॥
सात सुन्न के ऊपर साहेब, सेतैं सेत निवासा ।
सदा अनंद रहै वा देसा, कबहुँ न जगै उदासा ॥१॥
सूरज चंद दिवस नहिँ रजनी, नाहीँ धरनि अकासा ।
ऐसा अमर लोक है अवधू, केवला फरै बारामासा ॥२॥
ब्रह्मा बिष्नु महेसुर कहिये, छके जोति के पासा ।
चौधा लोक बसै जम चौधा, ये सब काल तमासा ॥३॥
उहाँ के गये बहुरि ना अइहौ, आवागवन भय नासा ।
ब्रह्म अखंडित साहेब कहिये, आपु मेँ आपु प्रगासा ॥४॥