धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)
Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press
सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४ भेद
मिलहु सत्त सुकृत रस भोगो, होवहु प्रेम पियरिया ।
मीच होहु तन मन धन जारो, जैसे सती सिँगरिया ॥ २ ॥
नव दिसि द्वार तपत तहँ देखो, दसवैँ खोल किवरिया ।
पाँच रागिनी झुमक पचीसो, छठएँ धरम नगरिया ॥ ३ ॥
अजपा लागि पागि रहै डोरी, निरखो सुरति सुँदरिया ।
धरमदास के साहेब कबीरा, लै पहुँचावो सत्त नगरिया ॥ ४ ॥
॥ शब्द ८ ॥
बिरले साधू पावै हो, रतनन कै माला ॥ टेक ॥
मुलुक मँडल चौकी बनी, पूरन धर्मसाला ।
वोहि में आपु बिराजै हो, प्रभु दीनदयाला ॥ १ ॥
चाँद सुरज मानिक भये, करु सुरति कै धागा ।
हर दम हर दम फेरो हो, अंतर गुरु माला ॥ २ ॥
पाँच तत्त कै पिंजरा हो, हीरा लागे आस ।
वोहि मँ साहेब रमि रह्यो, कोटिन भानु प्रकास ॥ ३ ॥
नर नारी मँ ढूँढ़ो हो, घट घट मँ माला ।
कहैं कबीर धर्मदास से, निज होत निहाला ॥ ४ ॥
॥ शब्द ६ ॥
खेलत रहलौँ बाबा चौबरिया,
आइ गये अनहार¹ हो ।
राँध परोसिन भेंटहूँ न पायाँ,
डोलिया फँदाय लिये जात हो ॥ १ ॥
डोलिया से उतरो उत्तर दिस धनि,
नैहर लागल आग हो ।
सब्दै छावल साहेब के नगरिया,
जहँवाँ लिआय लिये जात हो ॥ २ ॥
(१) ले जाने वाला ।