धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)
Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press
सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
१८ आरती
॥ शब्द ६ ॥
आरति बंदीछोर समरथ की । चरन कँवल चित राखु पुरुष की ॥१॥
आरति सौँ भूमी पग धारे । सतजुग मेंँ सत सब्द उचारे ॥२॥
आरति सौँ जग प्रगटे आई । त्रेता मंदर नाम कहाई ॥३॥
आरति सौँ मुख मंगल गाये । द्वापर करुनामय कहवाये ॥४॥
आरति सौँ जग बंधी आसा । कलजुग केवल नाम प्रकासा ॥५॥
चारो जुग धर प्रगट सरीरा । आरत गावै धर्मदास कबीरा ॥६॥
॥ शब्द ७ ॥
धरमदास आरती साजा । पाँच तत्त मुख बेद उचारा ॥१॥
पहिले तेज पवन अरु पानी । रहे निरंतर अंतरजामी ॥२॥
गगन जोति गरजै असमाना । देखो दृष्टि धुजा फहराना ॥३॥
कोटि ब्रह्म जहाँ पढ़त पुराना । कोटि संभु धरैं उर ध्याना ॥४॥
कोटि बिष्नु बिनवै कर जोरी । और देव सब तैँ तिस क्रोरी ॥५॥
सेस सहसमुख निसु दिन गावै । अस्तुति करत पार नहिँ पावै ॥६॥
सतगुरु मिलैं तो भेद बतावैँ । पाँच तत्त लै अगम लखावैँ ॥७॥
कहैँ कबीर हंस-पति राई । धरमदास आरति फल पाई ॥८॥
॥ शब्द ८ ॥
हंस उवारि अपन करि लीन्हा । संझा आरति सुकिरत कीन्हा ॥१॥
पहिले आरति अलख बिराजै । ओअं सोहं ध्यान लगावै ॥२॥
गगन मँदिल बिच फूल एक फूला । तरे भई डार उपर भयो मूला ॥३॥
अखंड बिराजै ता की छाया । लख चौरासी के फंद छुड़ाया ॥४॥
साख से उपजि सकल संसारा । लख चौरासी से होइ रहु न्यारा ॥५॥
धरमदास बिनवै कर जोरी । गुरु प्रताप से आरति जोरी ॥६॥
॥ शब्द ९ ॥
संझा आरति नाम तुम्हारा । अनहद धुनि गुरु ज्ञान बिचारा ॥
तत्त का तेल काया की बाती । ब्रह्म अगिन अंदर धधकारी ॥
बिनती १९
पाँचो बाती निरमल करि बारी । सुरति चँवर लै सन्मुख झारी ॥
प्रेम कै पुहुप धूप धरो ध्याना । चित चंदन घसि अंग लगाना ॥
अद्भुत जोति अधर परगासा । आरति करै कबीर धर्मदासा ॥
॥ बिनती का अंग ॥
॥ शब्द १ ॥
गुरु पैयाँ लागौँ नाम लखा दीजो रे ॥ टेक ॥
जनम जनम का सोया मनुवाँ, सब्दन मार जगा दीजो रे ॥१॥
घट अँधियार नैन नहिँ सूझै, ज्ञान का दीप जगा दीजो रे ॥२॥
बिष की लहर उठत घट अंतर, अमृते बूँद चुवा दीजो रे ॥३॥
गहिरी नदिया अगम बहै धरवा, खेय के पार लगा दीजो रे ॥४॥
धरमदास की अरज गुसाँईँ, अब के खेप निभा दीजो रे ॥५॥
॥ शब्द २ ॥
भक्ति दान गुरु दीजिये देवन के देवा हो ।
चरन कँवल बिसरौँ नहीँ करिहौँ पद सेवा हो ॥१॥
तिरथ बरत मैं ना करौँ ना देवल पूजा हो ।
तुमहिँ ओर निरखत रहौँ मेरे और न दूजा हो ॥२॥
आठ सिद्धि नौ सिद्धि हैं बैकुंठ निवासा हो ।
सो मैं ना कछु माँगहूँ मेरे समरथ दाता हो ॥३॥
सुख सम्पति परिवार धन सुन्दर बर नारी हो ।
सुपनेहु इच्छा ना उठै गुरु आन तुम्हारी हो ॥४॥
धरमदास की बीनती साहेब सुनि लीजै हो ।
दरसन देहु पट खोलि कै आपन करि लीजै हो ॥५॥
३० बिनती
॥ शब्द ३ ॥
साहेब साहेबी तन हेरो ॥ टेक ॥
चंच पंख बिन जटा पखेरू, मम गति समझ सबेरो ।
अब जनि तजो मोहिँ यह खंडा, तुम सत लोक बसेरो ॥ १ ॥
निस बासर मोहिँ संसय ब्यापै, काम क्रोध मद घेरो ।
या से नाम लेन नहिँ पाऊँ, धृग जीवन जग मेरो ॥ २ ॥
प्रभु पद भिन्न भयो मैं जब से, देँह धरे बहुतेरो ।
त्रिबिधि ताप दुख सहे निरंतर, कबहुँ न भयो सुखेरो ॥ ३ ॥
मम हित जानि प्रान-पति सतगुरु, जुगन जुगन तुम टेरो ।
मैं अचेत प्रीति मोह बस, तुम तजि भयो अनेरो ॥ ४ ॥
मैं हौँ जीव तुम्हार दया-निधि, आदि अंत को चेरो ।
अब मोहिँ लेहु छुड़ाइ काल से, औगुन मेटो मेरो ॥ ५ ॥
बंदी-छोर सुनो करुना-मय, करो हिये बिच डेरो ।
धर्मदास पर दया कीजै, चौरासी से फेरो ॥ ६ ॥
॥ शब्द ४ ॥
साहेब दीनबंधु हितकारी ॥ टेक ॥
कोटिन ऐगुन बालक करई, मात पिता चित एक न धारी ॥१॥
तुम गुरु मात पिता जीवन के, मैं अति दीन दुखारी ॥ २ ॥
प्रनत-पाल करुना-निधान प्रभु, हमरी ओर निहारी ॥ ३ ॥
जुगन जुगन से तुम चलि आये, जीवन के हितकारी ॥ ४ ॥
सदा भरोसे रहूँ तुम्हारे, तुम प्रतिपाल हमारी ॥ ५ ॥
मोरे तुम हीँ सत्त सुकृत हौ, अंतर और न धारी ॥ ६ ॥
जानत हौ जन के तन मन की, अब कस मोहिँ बिसारी ॥ ७ ॥
को कहि सकै तुम्हारी महिमा, केहि न दिह्यो पद भारी ॥ ८ ॥
धरमदास पर दया कीन्हीँ, सेवक अहौँ तुम्हारी ॥ ९ ॥
विनती २१
॥ शब्द ५ ॥
साहेब मेटो चूक हमारी ॥ टेक ॥
बार बार मोहिँ दंड भयो है, चूक भई अति भारी ।
अब हम आये निकट तुम्हारे, अब मो तनहिँ निहारी ॥१॥
करुनामय तुम नाम धराये, तुम समरथ अब मेरो ।
ऐसी बिपति भई मोहिँ ऊपर, कोई ना हीत१ हमारो ॥२॥
तरसत जीव रहै निस बासर, जानि जनहिँ तुम दौरो ।
अब की चूक छिमा कर साहेब, अब सन्मुख ह्वै हेरो ॥३॥
तुम सतगुरू सकल सुख-दाता, सब्द पान दे तारो ।
धरमदास बिनवै कर जोरी, करौँ बंदगी तेरो ॥४॥
॥ शब्द ६ ॥
सुरति पर सतगुर धरि दियो बाढ़ ॥ टेक ॥
घर माँ रहौँ रहन नहिँ पावौँ,
घर के लोग मोहिँ देहिँ निकार ॥१॥
बाहर जावँ डाइन इक लागै,
सुनि पावै जिय डाहै मार ॥२॥
ऐसी बाढ़ धरो मोरे साहेब,
जहँ मारौँ तहँ पल्ले पार ॥३॥
धरमदास पर दाया कीजै,
साहेब कबीर दुख मेटनहार ॥४॥
॥ शब्द ७॥
बंदी छोर बिनती सुनि लीजै ॥ टेक ॥
कपट कुटिल अपराधी द्रोही, ठहरावो मन निस्चै ।
नाम तुम्हारा अधम उधारन, ता की दिच्छा दीजै ॥१॥
(१) हितकारी।
२२ बिनती
पाप पुन्न नहिँ जाँचन कीजै, काटि फंद अब दीजै ।
माँगूँ अपन सुभाव दयानिधि, सुनि अनुमान न कीजै ॥२॥
बिषे बिनास रहूँ निसु बासर, यह तन छिन छिन छीजै ।
साठ जन्म को हौँ अपराधी, अबकी छिमा प्रभु कीजै ॥३॥
सतगुरु नाम मुनींद्र कहाये, साहेब कबीर सुनि लीजै ।
धरमदास बिनवै कर जोरी, काटि चौरासी दीजै ॥४॥
॥ शब्द ८ ॥
कब तुम मिलिहौ कंथ कबीर ।
धर्मदास पर दाया कीजै, हंस लगावो तीर ॥१॥
भक्ति अचल औ दृढ़ बैरागा, पूरन ज्ञान गँभीर ।
जती सती संतोषी तुम्हीं, सब के दाता धीर ॥२॥
तुम प्रताप परवाह न केहु को, सागर सलिता नीर ।
एक बूंद दयाल मोहिँ दीजै, जाय जीव की पीर ॥३॥
महा कठोर कठिन मन मेरो, हरो ताहि की भीर ।
कामी क्रोधी भूठा लंपट, धारयो अधम सरीर ॥४॥
सुख करन और दुख हरन तुम, ऐसे मत के थीर ।
ज्ञानमंडन भर्मखंडन, दया सिन्धु कबीर ॥५॥
॥ शब्द ९ ॥
साहेब बूड़त नाव अब मोरी ॥ टेक ॥
काम क्रोध की लहर उठतु है, मोह पवन झकझोरी ।
लोभ मोरे हिरदे घुमरतु है, सागर वार न पारी ॥१॥
कपट की भँवर परतु है बहुतै, वा मेँ बेड़ा अटको ।
काल फाँस लिये है द्वारे, आया सरन तुम्हारी ॥२॥
धरमदास पर दाया कीन्ही, काटि फंद जिव तारी ।
कहैँ कबीर सुनो हो धर्मन, सतगुरु सरन उबारी ॥३॥
विनती २३
॥ शब्द १० ॥
बिन दरसन भइ बावरी, गुरु द्यो दीदार ॥ टेक ॥
ठाढ़ि जोहौँ तोरी बाट म, साहेब चलि आवो ।
इतनी दया हम पर करो, निज छबि दरसावो ॥ १ ॥
कोठरी रतन जड़ाव की, हीरा लागे किवार ।
ताला कुंजी प्रेम की, गुरु खोलि दिखावो ॥ २ ॥
बंदा भूला बंदगी, तुम बकसनहार ।
धर्मदास अरजी सुनो, भव पार करावो ॥ ३ ॥
॥ शब्द ११ ॥
दीना-नाथ दयाल, भक्त की पछ करौ ।
सरन आये की लाज, साहेब जन की करौ ॥ १ ॥
नौ दरवाजे विकार, धार नौका बगै१ ।
मेरि सुरत नहीं ठहराय, लगन कैसे लगै ॥ २ ॥
पाँच तत्त गुन तीन का, आदर साजिया ।
जम राखै बिलमाय, तो फंद न फंदिया ॥ ३ ॥
तिर्गुन फाँस का फंदा, माया मद जाल मेँ ।
भवसागर के बीच, महा जंजाल मेँ ॥ ४ ॥
भक्ति मुक्ति देव दान, दया जन पर करौ ।
नौका पार लगाय, दास अपनो करौ ॥ ५ ॥
साहेब कबीर बंदी-छोर, अरज एक मानिये ।
धर्मनि पतित उबारि, सरन मेँ आनिये ॥ ६ ॥
॥ शब्द १२ ॥
चरन छाँड़ि प्रभु जावँ कहाँ, मोरे और न कोई ।
जग मेँ आपन कोइ नहीं, देखा सब टोई ॥ १ ॥
(१) वगदै, बेठिकाने वहै ।
२४ विनती
मात पिता हित बंधु तुम, का से दुख रोई।
सब कछु तुम्हरे हाथ है, तुम्हरै मुख जोही ॥२॥
गुन तो मोरे है नहीं, औगुन बहुतेरे।
ओट लई तुम नाम की, राखो पत सोई ॥३॥
सतगुरु तुम चीन्हे बिना, मति बुधि सब खोई।
सब जीवन के एक तुम, दूजा नहिँ कोई ॥४॥
मैं गरजी अरजी करौँ, मरजी जस होई।
अरज बिपति लिखौँ आपनी, राखौँ नहिँ गोई ॥५॥
धरमदास सत साहेबी, घट घटहिँ समोई।
साहेब कबीर सतगुरु मिले, आवागवन न होई ॥६॥
॥ शब्द १३ ॥
साँईँ मैं असल गुलाम तिहारा ॥ टेक ॥
काया नगर बन्यो अति सुन्दर, मोह को लग्यो बजारा।
कुमति कलोल करै दसहोंँ दिसि, लोभ को ठुक्यो नगारा ॥१॥
मोह समुन्दर भरे अपरबल, भँवर भँवै¹ अति भारा।
काम क्रोध का लहर उठतु है, केहि बिधि होय निवारा ॥२॥
पाँच के ऊपर पचिस महतिया, इन परपंच पसारा।
मन अदली जहँ अदल चलावै, कहा करै जीव बिचारा ॥३॥
ना मोरे नाव नाहिँ खेवटिया, डर लागै मोहिँ भारी।
चौदह लोक मैं कोइ नहिँ दीसै, तुम गुरु पार उतारी ॥४॥
धरमदास की यही बीनती, उरझे को निर्वारो।
साहेब कबीर मिले गुरु समरथ, हम से अधम उबारो ॥५॥
(१) घूमैँ।
बिनती २५
॥ शब्द १४ ॥
मैँ तो तोरे भजन भरोसे अबिनासी ॥ टेक ॥
तीरथ बरत कछु नहिँ करहूँ, बेद पढ़ौँ नहिँ कासी ॥१॥
जंत्र मंत्र टोटका नहिँ जानौँ, निसु दिन फिरत उदासी ॥२॥
यहि घट भीतर बधिक बसत है, दिये लोभ की टाटी ॥३॥
धरमदास बिनवै कर जोरो, सतगुरु चरनन दासी ॥४॥
॥ शब्द १५ ॥
साहेब बंदी-छोर हमारे ॥ टेक ॥
ठाढ़े बैठे चलत निहारे, जागत साँझ सवारे ।
करुना-सिंधु दया के आगर, नैनन के उँजियारे ॥१॥
बोलत बचन मीठ बहु लागै, पूरन पुरुष पियारे ।
उनकी रहनि गहनि जब पैहौ, होइ रहु सब से न्यारे ॥२॥
है बहु ज्ञान ध्यान बहुतैरो, खोलो गगन किवारे ।
दया सरूप बसै सिंधू मेँ, हीरा लाल निकारे ॥३॥
साहेब कबीर सदा के सतगुरु, हंसन के रखवारे ।
धरमदास पर दाया कीन्हा, आया सरन तुम्हारे ॥४॥
॥ शब्द १६ ॥
साहेब मोरी ओर निहारो ।
परजा पुत्र अहौँ मैँ साहेब, बहुत बात मैँ टारो ॥१॥
हौँ मैँ कोटि जनम को पापी, मन बच करम असारो ।
एकौ कर्म छुटे ना कवहूँ, बहु बिधि बात बिगारो ॥२॥
हौँ अपराधी बहुत जुगन को, नइया मोर उवारो ।
बंदीछोर सकल सुख-दाता, करुनामय करत पुकारो ॥३॥
४
२६ बिनती
सीस चढ़ाय पाप की मोटरी, आयो तुम्हरे द्वारो।
को अस हमरे भार उतारै, तुम्हीं हेतु१ हमारो ॥ ४ ॥
धरमदास यह बिनती बिनवै, सतगुरु मो को तारो।
साहेब कबीर हंस के राजा, अमर लोक पहुँचावो ॥ ५ ॥
॥ शब्द १७ ॥
साहेब मोरी बहियाँ सम्हारि गही ॥ टेक ॥
गहिरी नदिया नाव झाँझरी, बोझा अधिक भई।
मोह लोभ की लहर उठत है, नदिया झकोर बही ॥ १ ॥
तुमहि बिगारो तुमहिं सँवारो, तुमहिं भंडार भरी।
जब चाहो तब पार लगावो, नहिँ तो जात बही ॥ २ ॥
कुमति काटि के सुमति बढ़ावो, बल बुधि ज्ञान दई।
मैं पापी बहु बेरी चूकूँ, तुम मेरी चूक सही ॥ ३ ॥
धरमदास सरन सतगुरु के, अब धुनि लाग रही।
अमर लोक में डेरा परिगै, समरथ नाम सही ॥ ४ ॥
॥ शब्द १८ ॥
साहेब कौन कमी घर तेरो ॥ टेक ॥
भूखे अन्न पियासे पानी, कपड़ा से तन घेरो।
जो कछु न्यामत सबै महल में, खरच खजाना ढेरो ॥ १ ॥
खाक से पाक कियो पल माहीं, हे समरथ बल तेरो।
भव सें काढ़ि कियो तरनी२ पर, खेइ लगावो सबेरो ॥ २ ॥
रहे न घाम छाँह दुनिया में, रहे न जम को चेरो।
राव से रंक रंक से राजा, छिन में बाजत तूरो ॥ ३ ॥
मानो सत्त झूठ जनि जानो, सत्त बचन है पूरो।
धर्मदास चरनन पर बिनवै, तुम गति सब भरपूरो ॥ ४ ॥
(१) हितकारी। (२) नाव।
बिनती २७
॥ शब्द १९ ॥
साहेब खेइ लगावो पारा ॥ टेक ॥
असी कोस मैं भील अरु भाँकर, असी कोस अँधियारा ।
असी कोस बैतरनी नदिया, जहँवाँ हंस उतारा ॥ १ ॥
बड़े बड़े सीकारी जोधा, आगे पग है डारा ।
खाल खैँचि जम भुसा भरावै, ऐँचि लेहि जस आरा ॥ २ ॥
लेखा माँगै जम फुरमावै, तीन लोक लै डारा ।
उपजत बिनसत जनम बीतिगे, चौरासी की धारा ॥ ३ ॥
गगन मंदिल मैं सतगुरु बोलै, सुनि लै सब्द हमारा ।
धरमदास चरनन पर बिनवै, अब को अरज हमारा ॥ ४ ॥
॥ शब्द २० ॥
अब मोहिँ दरसन देहु कबीर ॥ टेक ॥
तुम्हरे दरस से पाप कटत हैं, निरमल होत सरीर ॥ १ ॥
अमृत भोजन हंसा पावै, सब्द धुनन की खीर ॥ २ ॥
जहँ देखौँ जहँ पाट पटंबर, ओढ़न अंबर चीर ॥ ३ ॥
धरमदास की अरज गोसाँईं, हंस लगावो तीर ॥ ४ ॥
॥ शब्द २१ ॥
साहेब मोहिँ दरसन दीजे हो । करुना-निधि मेहर करीजे हो ॥
पपिहा के चित स्वाँति बसै, भावै नहिँ जल दूजा हो ।
जैसे काग जहाज चढ़े, वा को और न सूझा हो ॥ १ ॥
बार बार बिनती करूँ, मेरी अरज सुनीजे हो ।
भवसागर से काढ़ि के, अपना करि लीजे हो ॥ २ ॥
सत्त लोक से सुरत करी, तब जग मेँ आये हो ।
जम से जीव छोड़ाइ के, धर्मनि मन भाये हो ॥ ३ ॥
१८ बिनती
॥ शब्द २२ ॥
मोर मन लागा साहेब से, बंदी छोर कबीरा ॥ टेक ॥
सतगुरु सरनै मैं गई, सब दुख हरि लीन्हा।
करम भरम सब मेटि के, निरमल करि दीन्हा ॥१॥
तीन लोक के बीच में, जम कातर दीन्हा।
ता से मोहिँ छुड़ाइ के, आपन करि लीन्हा ॥२॥
सतगुरु सब्द सुनाइ के, पारस करि दीन्हा।
कागा बरन मिटाइ के, हंसा करि लीन्हा ॥३॥
काम क्रोध सब त्यागि के, बन हंस गंभीरा।
सब्द हमारा मानि ले, गुरु कहत कबीरा ॥४॥
धरमदास की बीनती, संतन महँ हेरा।
जाति बरन कुल त्यागि के, सत लोक बसेरा ॥५॥
॥ शब्द २३ ॥
साहेब कौन देस मोहिँ डारा ॥ टेक ॥
वह तो देस अमर हंसन को, येहि जग काल पसारा ॥१॥
देवहु सब्द अजर हंसन को, बहुरि न है अवतारा ॥२॥
निरगुन सरगुन दुंद पसारा, परि गये काल की धारा ॥३॥
जहाँ देस है सत्त पुरुष का, अजर अमी का अहारा ॥४॥
धरमदास बिनवै कर जोरी, अबकी अरज हमारा ॥५॥
॥ शब्द २४ ॥
साहेब लेइ चलो देस अपाना ॥ टेक ॥
जम की त्रास सही नहिँ जाई, केहि बिधि धरौँ मैं ध्याना ॥१॥
माया मोह भरम की मोटरी, यह सब काल कलपना ॥२॥
माया मोह भरम सब काटो, दीजै पद निरबाना ॥३॥
अमर लोक वह देस सुहेला, हंसा कीन्ह पयाना ॥४॥
धरमदास बिनवै कर जोरी, आवागवन नसाना ॥५॥
२९
विनती
॥ शब्द २५ ॥
तुम सतगुरु हम सेवक तुम्हरे ॥ टेक ॥
जो कोइ मारै औ गरियावै, दाद फिरियाद करब तुमहीं से ॥१॥
सोवत जागत के रखपाला, तुमहीं छाँड़ि भजौँ नहिँ औरै ॥२॥
तुम धरनीधर सब्द अनाहद, अमृत भाव करो प्रभु सगरै ॥३॥
तुम्हरी बिनय कहाँ लगि बरनौँ, धरमदास पद गहे हैं तुम्हरे ॥४॥
॥ शब्द २६ ॥
जमुनियाँ की डारि मोरी तोड़ देव हो ॥ टेक ॥
एक जमुनियाँ के चौदह डारि, सार सब्द लेके मोड़ देव हो ॥१॥
काया कंचन अजब पियाला, नाम बूटी रस घोर देव हो ॥२॥
सुरत सुहागिन गजब पियासी, अमृत रस मेँ बोर देव हो ॥३॥
सतगुरु हमरे ज्ञान जौहरी, रतन पदारथ जोरि देव हो ॥४॥
धरमदास की अरज गुसाँईँ, जीवन की बंदी छोर देव हो ॥५॥
॥ शब्द २७ ॥
मिहरबान हैं साहेब मेरा । दिल भर दरसन पाऊँ तेरा ॥१॥
तुम दाता मैं सदा भिखारी । देव दीदार जाउँ बलिहारी ॥२॥
करूँ बंदगी खिजमत दीजै । बकसो चूक दया बहु कीजै ॥३॥
सेवक तैँ बिगरै सौ बारा । सतगुरु साहेब लेव उबारा ॥४॥
औगुन सेवक साहेब जानै । साहेब मन मेँ ना गिल्हानै ॥५॥
धर्मदास लइ तुम्हरि पनाह । अगले पछिले बकस गुनाह ॥६॥
॥ शब्द २८ ॥
बाजा बाजा रहित¹ का, पड़ा नगर मेँ सोर ।
(मेरे) सतगुरु संत कबीर हैं, नजर न आवै और ॥१॥
(१) मुक्ति, उद्धार ।
३० भेद
भूमी पर पग धरत हौ, सुनौ संत मतधीर ।
माथ नाय बिनती करूँ, दर्सन देव कबीर ॥२॥
घाट बाट औघट महीं, मोहिँ कबीर की आस ।
धर्मनि सुमिरै नाम गुरु, कभी न होय बिनास ॥३॥
॥ शब्द २९ ॥
अचवन कीजे गुरु कृपा निधान ॥ टेक ॥
सेवक लिये प्रेम जल भारी, खरिका ब्रह्म गियान ॥१॥
भाव भक्ति सौँ बीरा लीजे, संतन जीवन प्रान ॥२॥
अमी उगाल दास को दीजे, जन को परम कल्यान ॥३॥
हृदय कमल बिच पलँग बिछाऊँ, पौढ़ैं पुरुष पुरान ॥४॥
चरन कमल की सेवा करहूँ, दासा-तन परवान ॥५॥
सुरत की बेनियाँ डोलाऊँ ठाढ़ी, इक टक लाऊँ ध्यान ॥६॥
धरमदास पर दाया कीजे, पूरन पद निरबान ॥७॥
॥ भेद का अंग ॥
॥ शब्द १ ॥
धर्मनि वा देस हमारो बासा, जहँ हंसा करै बिलासा ॥टेक॥
सात सुन्न के ऊपर साहेब, सेतैं सेत निवासा ।
सदा अनंद रहै वा देसा, कबहुँ न जगै उदासा ॥१॥
सूरज चंद दिवस नहिँ रजनी, नाहीँ धरनि अकासा ।
ऐसा अमर लोक है अवधू, केवला फरै बारामासा ॥२॥
ब्रह्मा बिष्नु महेसुर कहिये, छके जोति के पासा ।
चौधा लोक बसै जम चौधा, ये सब काल तमासा ॥३॥
उहाँ के गये बहुरि ना अइहौ, आवागवन भय नासा ।
ब्रह्म अखंडित साहेब कहिये, आपु मेँ आपु प्रगासा ॥४॥
भुलाई हो ॥ ५ ॥
(१) खिलावो।
Wait, in is it ॥ ५ or ॥ ५ ॥?
Look at line 2: there is a danda before 5, and after 5 there is a danda?
Wait, looking at line 2:
॥ ५ - there is a small vertical stroke, looks like ५ followed by a faint danda or nothing? It looks like ॥ ५. Wait, let's look at ॥ ५: there's a ॥ and then ५. Wait, above 5 there's nothing, to the right there is nothing. So ॥ ५.
Wait, in : बिहसावो¹ - superscript 1 is good, or बिहसावो१. The prompt says "Include all sakhis, padas... footnotes".
Everything looks solid and accurate.कहैं कबीर सुनो हो धर्मनि, छाँड़ो खल कै आसा।
अमृत भोजन हंसा पावै, बैठि पुरुष के पासा ॥ ५
॥ शब्द २ ॥
केहि बिधि प्रीतम पाइये, गुरु राह बताओ ॥ टेक ॥
अरध उरध बिच बागिया, तहँ सुरति लगावो।
अष्ट कँवल दल पाँखुरी, उन को बिहसावो
३२ भेद
बिन सतगुरु कोइ पार न पावै, फिरि फिरि जोनी भूला हो ।
नौ सोहंग परे जिनहीँ से, सोई पुरुष निज मूला हो ॥६॥
तीन देँह उनहीँ से उपजी, कारेन सुछम स्थूला हो ।
कारन देँह मेँ सहज सुरति है, औ अंकूर पसारा हो ॥७॥
सुछम देँह मेँ ओहं सोहं, इनको ख्याल अपारा हो ।
स्थिर देँह मेँ अंस है अच्छर, इच्छा उनसे धारा हो ॥८॥
ते अच्छर तेँ जोति निरंजन, सबको करत अहारा हो ।
ते जोती मेँ तिन¹ देव लागे, जाकै सृष्टि पसारा हो ॥९॥
सात सुन्न दोइ बेसुन कहिये, दसवाँ धाम अखंडा हो ।
समरथ सब्द हमरो अस्थाना, और सकल ब्रह्मांडा हो ॥१०॥
सोरह सुत तेही के माहीं, तेहि बिच पाँचो अंडा हो ।
अमर लोक मेँ पुरुष बिदेही, निगम न पावै पारा हो ॥११॥
उनकी उपमा कहँ लगि बरनौँ, मुख तेँ होय न पारा हो ।
कोटिन सूर चन्द्र तारागन, एक रोम पर वारा हो ॥१२॥
सेत सिंघासन सेत छत्र सिर, सेतहि हंस पियारा हो ।
सेत भूमि जहँ सेत बृच्छ है, सेतहि कमल सुहेला हो ॥१३॥
पारस पान लेहु तुम सुकिरित, तब देखो दरबारा हो ।
कहैँ कबीर सुनो धर्मदासा, तुम सें होइ निरधारा हो ॥१४॥
॥ शब्द ४ ॥
गगन पिय बंसी फेरि बजावो ॥ टेक ॥
भँवर गुफा से उठत बुलबुला, सो अंजन पिय नैन लगावो ॥१॥
जो बंसी सुर नर मुनि मोहे, सो बंसी पिय मोहिँ सुनावा ॥२॥
आनो कुंजी खोलो ताला, मोहनि मूरति मोहिँ दिखावो ॥३॥
धरमदास बिनवै कर जोरी, चरन कँवल तरे मोहिँ लगावो ॥४॥
(१) तीन ।
भेद ३३
॥ शब्द ५ ॥
झरि लागै महलिया, गगन गहराय ॥ टेक ॥
खन गरजै खन बिजुली चमकै,
छहर उठै सोभा बरनि न जाय ॥१॥
सुन्न महल से अमृत बरसै,
प्रेम अनँद होइ साध नहाय ॥२॥
खुली किवरिया मिटी अँधियरिया,
धन सतगुरु जिन दिया है लखाय ॥३॥
धरमदास बिनवै कर जोरी,
सतगुरु चरन मँ रहत समाय ॥४॥
॥ शब्द ६ ॥
हमैँ एक अचरज जानि पड़ै ॥ टेक ॥
जल भीतर इक बृच्छा उपजै, ता मैं अगिन जरै ।
ठाढ़ी साखा पवन झकोरै, दीपक जोति बरै ॥१॥
माथे पर तिरबेनी बहत है, चढ़ि ऊपर असनान करै ।
लरजै गरजै दामिनि दमकै, कामिनि कलस भरै ॥२॥
मट्टी का गढ़ कोट बना है, जा मैं फौज लड़ै ।
सूर बीर कोउ नजरि न आवै, नाहक रार करै ॥३॥
साहेब अमर मरै ना कबहुँ, नाहक सोच करै ।
धरमदास या पद को गावै, फिर कबहूँ न टरै ॥४॥
॥ शब्द ७ ॥
आठ चाम कै गुरिया रे, मन माला फेर सबेरिया ॥टेक॥
अमी रस निकसत राग, फाग तंत भनकरिया ।
नाम से और सौदा नहिँ भावै, पिय की मौज छहरिया ॥१॥
५
३४ भेद
मिलहु सत्त सुकृत रस भोगो, होवहु प्रेम पियरिया ।
मीच होहु तन मन धन जारो, जैसे सती सिँगरिया ॥ २ ॥
नव दिसि द्वार तपत तहँ देखो, दसवैँ खोल किवरिया ।
पाँच रागिनी झुमक पचीसो, छठएँ धरम नगरिया ॥ ३ ॥
अजपा लागि पागि रहै डोरी, निरखो सुरति सुँदरिया ।
धरमदास के साहेब कबीरा, लै पहुँचावो सत्त नगरिया ॥ ४ ॥
॥ शब्द ८ ॥
बिरले साधू पावै हो, रतनन कै माला ॥ टेक ॥
मुलुक मँडल चौकी बनी, पूरन धर्मसाला ।
वोहि में आपु बिराजै हो, प्रभु दीनदयाला ॥ १ ॥
चाँद सुरज मानिक भये, करु सुरति कै धागा ।
हर दम हर दम फेरो हो, अंतर गुरु माला ॥ २ ॥
पाँच तत्त कै पिंजरा हो, हीरा लागे आस ।
वोहि मँ साहेब रमि रह्यो, कोटिन भानु प्रकास ॥ ३ ॥
नर नारी मँ ढूँढ़ो हो, घट घट मँ माला ।
कहैं कबीर धर्मदास से, निज होत निहाला ॥ ४ ॥
॥ शब्द ६ ॥
खेलत रहलौँ बाबा चौबरिया,
आइ गये अनहार¹ हो ।
राँध परोसिन भेंटहूँ न पायाँ,
डोलिया फँदाय लिये जात हो ॥ १ ॥
डोलिया से उतरो उत्तर दिस धनि,
नैहर लागल आग हो ।
सब्दै छावल साहेब के नगरिया,
जहँवाँ लिआय लिये जात हो ॥ २ ॥
(१) ले जाने वाला ।
भेद ३५
भादौं नदिया अगम बहै सजनी,
सूझै वार न पार हो।
अब की बेर साहेब पार उतारो,
फिर न आइब संसार हो॥ ३॥
डोलिया से उतरो साहेब घर सजनी,
बैठो घूँघुट टार हो।
कहैं कबीर सुनो धर्मदासा,
पाये पुरुष अपार१ हो॥ ४॥
॥ शब्द १० ॥
अचरज ख्याल हमारे देसवा॥ टेक॥
हमरे देसवा बादर उमड़ै, नान्हो परै फोहरिया।
बैठि रहौं चौगान चौक में, भीँजै हमरी देँहिया॥ १॥
हमरे देसवा उरधमुख कुँइया, साकर वा की खोरिया।
सुरत सुहागिनि जल भरि लावै, बिन रसरी बिन डोरिया॥ २॥
हमरे देसवा चूनरि उपजै, मँहगे मोल बिकइया।
की तो लेइहैँ सतगुरु साहेब, की कोइ साध सुजनिया॥ ३॥
हमरे देसवा बाजा बाजै, गैबी उठे अवजवा।
साहेब धरमदास मगन है, बैठे तखत परगसवा॥ ४॥
॥ शब्द ११ ॥
सबद् सिँहासन पाट मेँ, तुम हंसा बैठो जाई हो॥ टेक॥
कौन नाम मुक्तामनी हो, कौन नाम वे हंस।
कौन नाम वे पुरुष हैं हो, कौन नाम वे अंस॥ १॥
अपर नाम मुक्तामनी हो, अग्र नाम वे हंस।
ज्ञान नाम वे पुरुष हैं हो, सुरति नाम वे अंस॥ २॥
(१) एक लिपि में "अपार" की जगह "पुरान" है।
३६ भेद
मूल दीप निज दीप है, हो, तुमहिँ सुनो हम पाँह ।
बैठि हंस उबारिये हो, सोहंगम के बाँह ॥ ३ ॥
जम्बू दीप के हंसा भाई, पाँजी बैठो आय । -
कहैँ कबीर धर्मदास से, तुम लावो बाँह चढ़ाय ॥ ४ ॥
॥ शब्द १२ ॥
बुढ़िया ने काता सूत, जोलहवा ने बीना हो ।
दरजी ने टुक टुक कीन्ह, दरद नहिँ जाना हो ॥ १ ॥
भेड़ी चरावत बाघ, मूस रखवारा हो ।
मेंगुची१ ने बाँधा ताल, सिंह के टाटा हो ॥ २ ॥
गोड़िया२ पसारा जाल, ऊँट एक बाझा हो ।
दुलहिनि के सिर मौर, बिलारी साजा हो ॥ ३ ॥
भाँड़ा गढ़त कौँहार, मास दस लागा हो ।
छिनहिँ में जात बिलाइ, बिलंब नहिँ लागा हो ॥ ४ ॥
यह मंगल सतलोक, हंस जन गावहिँ हो ।
कहैँ कबीर धर्मदास, अमर पद पावहिँ हो ॥ ५ ॥
॥ शब्द १३ ॥
मैं ब्योपारी नाम का, हाटे चल भाई ॥ टेक ॥
जस कुम्हरा कै चाक घुमै, वैसे नर घूमै ।
इँगल पिंगल के मद्ध मेँ, जिन पवन चलाई ॥ १ ॥
बिन रसना रटना करै, नहिँ जीभ डोलाई ।
कसि के बाँधो कामदेव, तब अलख लखाई ॥ २ ॥
पूरब दिस को जाइ कै, खिरकी खोलवावो ।
तिरबेनी के घाट पर, हंसा नहवावो ॥ ३ ॥
(१) मेंढकी । (२) कहार, धीमर ।
- भेद - ३७
तीन लोक दसवाँ दिसा, जम रोके द्वारा ।
कहैँ कबीर धर्मदास से, हंसा समुझावो ॥ ४ ॥
॥ शब्द १४ ॥
सुकृत फूल गुलाब को, सब घट रह्यो समाय ।
कहो कैसे कर पाइये, गुरु बिन लख्यो न जाय ॥ १ ॥
तीन त्रिकुट के ऊपर, फूल सोहंगम फूल ।
जहाँ रह्यो आसन धर्म को, बिन अच्छर निज मूल ॥ २ ॥
चार जोजन के ऊपर, पुरुष बिदेही पूर ।
जगर मगर वो नगर है, बाजै अनहद तूर ॥ ३ ॥
अपने ढिगे हम खड़े, सतगुरु दियो बताय ।
खिड़की खोल देखाइया, राह गगन की जाय ॥ ४ ॥
कहैँ कबीर धर्मदास से, परगट दियो अनाय ।
जो हंसा चढ़ि जावही, नहिँ पुनि आवै जाय ॥ ५ ॥
॥ शब्द १५ ॥
हीरा झलकै द्वार पर, निरखै कोइ सूरा हो ॥ टेक ॥
जिमीँ आसन है संत को, बैठे हहिँ धीरा हो ।
सुन्न समाधि लगाइ के, पहुँचे वहि तीरा हो ॥ १ ॥
बाजै बिरहिन बाँसुरी, सुनि के गइ पीरा हो ।
आठ पहर नौबत झरै, अति गरुअ गँभीरा हो ॥ २ ॥
गंग जमुन के बीच मेँ, एक झिरहिर नीरा हो ।
पूरब से पच्छिम भये, अति गगन गँभीरा हो ॥ ३ ॥
यह हीरा अनमोल है, सब के घट पूरा हो ।
कहहिँ कबीर धर्मदास से, पायो पद पूरा हो ॥ ४ ॥