धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)
Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press
सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 35, कुल 98 में से
संदर्भ में पढ़ें२२ बिनती
पाप पुन्न नहिँ जाँचन कीजै, काटि फंद अब दीजै ।
माँगूँ अपन सुभाव दयानिधि, सुनि अनुमान न कीजै ॥२॥
बिषे बिनास रहूँ निसु बासर, यह तन छिन छिन छीजै ।
साठ जन्म को हौँ अपराधी, अबकी छिमा प्रभु कीजै ॥३॥
सतगुरु नाम मुनींद्र कहाये, साहेब कबीर सुनि लीजै ।
धरमदास बिनवै कर जोरी, काटि चौरासी दीजै ॥४॥
॥ शब्द ८ ॥
कब तुम मिलिहौ कंथ कबीर ।
धर्मदास पर दाया कीजै, हंस लगावो तीर ॥१॥
भक्ति अचल औ दृढ़ बैरागा, पूरन ज्ञान गँभीर ।
जती सती संतोषी तुम्हीं, सब के दाता धीर ॥२॥
तुम प्रताप परवाह न केहु को, सागर सलिता नीर ।
एक बूंद दयाल मोहिँ दीजै, जाय जीव की पीर ॥३॥
महा कठोर कठिन मन मेरो, हरो ताहि की भीर ।
कामी क्रोधी भूठा लंपट, धारयो अधम सरीर ॥४॥
सुख करन और दुख हरन तुम, ऐसे मत के थीर ।
ज्ञानमंडन भर्मखंडन, दया सिन्धु कबीर ॥५॥
॥ शब्द ९ ॥
साहेब बूड़त नाव अब मोरी ॥ टेक ॥
काम क्रोध की लहर उठतु है, मोह पवन झकझोरी ।
लोभ मोरे हिरदे घुमरतु है, सागर वार न पारी ॥१॥
कपट की भँवर परतु है बहुतै, वा मेँ बेड़ा अटको ।
काल फाँस लिये है द्वारे, आया सरन तुम्हारी ॥२॥
धरमदास पर दाया कीन्ही, काटि फंद जिव तारी ।
कहैँ कबीर सुनो हो धर्मन, सतगुरु सरन उबारी ॥३॥