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सर्वकोश
धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press

सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished98 पृष्ठ

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पृष्ठ 31

१८ आरती
॥ शब्द ६ ॥
आरति बंदीछोर समरथ की । चरन कँवल चित राखु पुरुष की ॥१॥
आरति सौँ भूमी पग धारे । सतजुग मेंँ सत सब्द उचारे ॥२॥
आरति सौँ जग प्रगटे आई । त्रेता मंदर नाम कहाई ॥३॥
आरति सौँ मुख मंगल गाये । द्वापर करुनामय कहवाये ॥४॥
आरति सौँ जग बंधी आसा । कलजुग केवल नाम प्रकासा ॥५॥
चारो जुग धर प्रगट सरीरा । आरत गावै धर्मदास कबीरा ॥६॥
॥ शब्द ७ ॥
धरमदास आरती साजा । पाँच तत्त मुख बेद उचारा ॥१॥
पहिले तेज पवन अरु पानी । रहे निरंतर अंतरजामी ॥२॥
गगन जोति गरजै असमाना । देखो दृष्टि धुजा फहराना ॥३॥
कोटि ब्रह्म जहाँ पढ़त पुराना । कोटि संभु धरैं उर ध्याना ॥४॥
कोटि बिष्नु बिनवै कर जोरी । और देव सब तैँ तिस क्रोरी ॥५॥
सेस सहसमुख निसु दिन गावै । अस्तुति करत पार नहिँ पावै ॥६॥
सतगुरु मिलैं तो भेद बतावैँ । पाँच तत्त लै अगम लखावैँ ॥७॥
कहैँ कबीर हंस-पति राई । धरमदास आरति फल पाई ॥८॥
॥ शब्द ८ ॥
हंस उवारि अपन करि लीन्हा । संझा आरति सुकिरत कीन्हा ॥१॥
पहिले आरति अलख बिराजै । ओअं सोहं ध्यान लगावै ॥२॥
गगन मँदिल बिच फूल एक फूला । तरे भई डार उपर भयो मूला ॥३॥
अखंड बिराजै ता की छाया । लख चौरासी के फंद छुड़ाया ॥४॥
साख से उपजि सकल संसारा । लख चौरासी से होइ रहु न्यारा ॥५॥
धरमदास बिनवै कर जोरी । गुरु प्रताप से आरति जोरी ॥६॥
॥ शब्द ९ ॥
संझा आरति नाम तुम्हारा । अनहद धुनि गुरु ज्ञान बिचारा ॥
तत्त का तेल काया की बाती । ब्रह्म अगिन अंदर धधकारी ॥