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धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press

सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished98 पृष्ठ

पृष्ठ 33, कुल 98 में से

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पृष्ठ 33

३० बिनती
॥ शब्द ३ ॥
साहेब साहेबी तन हेरो ॥ टेक ॥
चंच पंख बिन जटा पखेरू, मम गति समझ सबेरो ।
अब जनि तजो मोहिँ यह खंडा, तुम सत लोक बसेरो ॥ १ ॥
निस बासर मोहिँ संसय ब्यापै, काम क्रोध मद घेरो ।
या से नाम लेन नहिँ पाऊँ, धृग जीवन जग मेरो ॥ २ ॥
प्रभु पद भिन्न भयो मैं जब से, देँह धरे बहुतेरो ।
त्रिबिधि ताप दुख सहे निरंतर, कबहुँ न भयो सुखेरो ॥ ३ ॥
मम हित जानि प्रान-पति सतगुरु, जुगन जुगन तुम टेरो ।
मैं अचेत प्रीति मोह बस, तुम तजि भयो अनेरो ॥ ४ ॥
मैं हौँ जीव तुम्हार दया-निधि, आदि अंत को चेरो ।
अब मोहिँ लेहु छुड़ाइ काल से, औगुन मेटो मेरो ॥ ५ ॥
बंदी-छोर सुनो करुना-मय, करो हिये बिच डेरो ।
धर्मदास पर दया कीजै, चौरासी से फेरो ॥ ६ ॥
॥ शब्द ४ ॥
साहेब दीनबंधु हितकारी ॥ टेक ॥
कोटिन ऐगुन बालक करई, मात पिता चित एक न धारी ॥१॥
तुम गुरु मात पिता जीवन के, मैं अति दीन दुखारी ॥ २ ॥
प्रनत-पाल करुना-निधान प्रभु, हमरी ओर निहारी ॥ ३ ॥
जुगन जुगन से तुम चलि आये, जीवन के हितकारी ॥ ४ ॥
सदा भरोसे रहूँ तुम्हारे, तुम प्रतिपाल हमारी ॥ ५ ॥
मोरे तुम हीँ सत्त सुकृत हौ, अंतर और न धारी ॥ ६ ॥
जानत हौ जन के तन मन की, अब कस मोहिँ बिसारी ॥ ७ ॥
को कहि सकै तुम्हारी महिमा, केहि न दिह्यो पद भारी ॥ ८ ॥
धरमदास पर दया कीन्हीँ, सेवक अहौँ तुम्हारी ॥ ९ ॥