धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)
Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press
सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबिनती २७
॥ शब्द १९ ॥
साहेब खेइ लगावो पारा ॥ टेक ॥
असी कोस मैं भील अरु भाँकर, असी कोस अँधियारा ।
असी कोस बैतरनी नदिया, जहँवाँ हंस उतारा ॥ १ ॥
बड़े बड़े सीकारी जोधा, आगे पग है डारा ।
खाल खैँचि जम भुसा भरावै, ऐँचि लेहि जस आरा ॥ २ ॥
लेखा माँगै जम फुरमावै, तीन लोक लै डारा ।
उपजत बिनसत जनम बीतिगे, चौरासी की धारा ॥ ३ ॥
गगन मंदिल मैं सतगुरु बोलै, सुनि लै सब्द हमारा ।
धरमदास चरनन पर बिनवै, अब को अरज हमारा ॥ ४ ॥
॥ शब्द २० ॥
अब मोहिँ दरसन देहु कबीर ॥ टेक ॥
तुम्हरे दरस से पाप कटत हैं, निरमल होत सरीर ॥ १ ॥
अमृत भोजन हंसा पावै, सब्द धुनन की खीर ॥ २ ॥
जहँ देखौँ जहँ पाट पटंबर, ओढ़न अंबर चीर ॥ ३ ॥
धरमदास की अरज गोसाँईं, हंस लगावो तीर ॥ ४ ॥
॥ शब्द २१ ॥
साहेब मोहिँ दरसन दीजे हो । करुना-निधि मेहर करीजे हो ॥
पपिहा के चित स्वाँति बसै, भावै नहिँ जल दूजा हो ।
जैसे काग जहाज चढ़े, वा को और न सूझा हो ॥ १ ॥
बार बार बिनती करूँ, मेरी अरज सुनीजे हो ।
भवसागर से काढ़ि के, अपना करि लीजे हो ॥ २ ॥
सत्त लोक से सुरत करी, तब जग मेँ आये हो ।
जम से जीव छोड़ाइ के, धर्मनि मन भाये हो ॥ ३ ॥