धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)
Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press
सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबिनती १९
पाँचो बाती निरमल करि बारी । सुरति चँवर लै सन्मुख झारी ॥
प्रेम कै पुहुप धूप धरो ध्याना । चित चंदन घसि अंग लगाना ॥
अद्भुत जोति अधर परगासा । आरति करै कबीर धर्मदासा ॥
॥ बिनती का अंग ॥
॥ शब्द १ ॥
गुरु पैयाँ लागौँ नाम लखा दीजो रे ॥ टेक ॥
जनम जनम का सोया मनुवाँ, सब्दन मार जगा दीजो रे ॥१॥
घट अँधियार नैन नहिँ सूझै, ज्ञान का दीप जगा दीजो रे ॥२॥
बिष की लहर उठत घट अंतर, अमृते बूँद चुवा दीजो रे ॥३॥
गहिरी नदिया अगम बहै धरवा, खेय के पार लगा दीजो रे ॥४॥
धरमदास की अरज गुसाँईँ, अब के खेप निभा दीजो रे ॥५॥
॥ शब्द २ ॥
भक्ति दान गुरु दीजिये देवन के देवा हो ।
चरन कँवल बिसरौँ नहीँ करिहौँ पद सेवा हो ॥१॥
तिरथ बरत मैं ना करौँ ना देवल पूजा हो ।
तुमहिँ ओर निरखत रहौँ मेरे और न दूजा हो ॥२॥
आठ सिद्धि नौ सिद्धि हैं बैकुंठ निवासा हो ।
सो मैं ना कछु माँगहूँ मेरे समरथ दाता हो ॥३॥
सुख सम्पति परिवार धन सुन्दर बर नारी हो ।
सुपनेहु इच्छा ना उठै गुरु आन तुम्हारी हो ॥४॥
धरमदास की बीनती साहेब सुनि लीजै हो ।
दरसन देहु पट खोलि कै आपन करि लीजै हो ॥५॥