धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)
Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press
सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८ बिनती
॥ शब्द २२ ॥
मोर मन लागा साहेब से, बंदी छोर कबीरा ॥ टेक ॥
सतगुरु सरनै मैं गई, सब दुख हरि लीन्हा।
करम भरम सब मेटि के, निरमल करि दीन्हा ॥१॥
तीन लोक के बीच में, जम कातर दीन्हा।
ता से मोहिँ छुड़ाइ के, आपन करि लीन्हा ॥२॥
सतगुरु सब्द सुनाइ के, पारस करि दीन्हा।
कागा बरन मिटाइ के, हंसा करि लीन्हा ॥३॥
काम क्रोध सब त्यागि के, बन हंस गंभीरा।
सब्द हमारा मानि ले, गुरु कहत कबीरा ॥४॥
धरमदास की बीनती, संतन महँ हेरा।
जाति बरन कुल त्यागि के, सत लोक बसेरा ॥५॥
॥ शब्द २३ ॥
साहेब कौन देस मोहिँ डारा ॥ टेक ॥
वह तो देस अमर हंसन को, येहि जग काल पसारा ॥१॥
देवहु सब्द अजर हंसन को, बहुरि न है अवतारा ॥२॥
निरगुन सरगुन दुंद पसारा, परि गये काल की धारा ॥३॥
जहाँ देस है सत्त पुरुष का, अजर अमी का अहारा ॥४॥
धरमदास बिनवै कर जोरी, अबकी अरज हमारा ॥५॥
॥ शब्द २४ ॥
साहेब लेइ चलो देस अपाना ॥ टेक ॥
जम की त्रास सही नहिँ जाई, केहि बिधि धरौँ मैं ध्याना ॥१॥
माया मोह भरम की मोटरी, यह सब काल कलपना ॥२॥
माया मोह भरम सब काटो, दीजै पद निरबाना ॥३॥
अमर लोक वह देस सुहेला, हंसा कीन्ह पयाना ॥४॥
धरमदास बिनवै कर जोरी, आवागवन नसाना ॥५॥