धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)
Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press
सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनती २१
॥ शब्द ५ ॥
साहेब मेटो चूक हमारी ॥ टेक ॥
बार बार मोहिँ दंड भयो है, चूक भई अति भारी ।
अब हम आये निकट तुम्हारे, अब मो तनहिँ निहारी ॥१॥
करुनामय तुम नाम धराये, तुम समरथ अब मेरो ।
ऐसी बिपति भई मोहिँ ऊपर, कोई ना हीत१ हमारो ॥२॥
तरसत जीव रहै निस बासर, जानि जनहिँ तुम दौरो ।
अब की चूक छिमा कर साहेब, अब सन्मुख ह्वै हेरो ॥३॥
तुम सतगुरू सकल सुख-दाता, सब्द पान दे तारो ।
धरमदास बिनवै कर जोरी, करौँ बंदगी तेरो ॥४॥
॥ शब्द ६ ॥
सुरति पर सतगुर धरि दियो बाढ़ ॥ टेक ॥
घर माँ रहौँ रहन नहिँ पावौँ,
घर के लोग मोहिँ देहिँ निकार ॥१॥
बाहर जावँ डाइन इक लागै,
सुनि पावै जिय डाहै मार ॥२॥
ऐसी बाढ़ धरो मोरे साहेब,
जहँ मारौँ तहँ पल्ले पार ॥३॥
धरमदास पर दाया कीजै,
साहेब कबीर दुख मेटनहार ॥४॥
॥ शब्द ७॥
बंदी छोर बिनती सुनि लीजै ॥ टेक ॥
कपट कुटिल अपराधी द्रोही, ठहरावो मन निस्चै ।
नाम तुम्हारा अधम उधारन, ता की दिच्छा दीजै ॥१॥
(१) हितकारी।