धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)
Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press
सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबिनती २५
॥ शब्द १४ ॥
मैँ तो तोरे भजन भरोसे अबिनासी ॥ टेक ॥
तीरथ बरत कछु नहिँ करहूँ, बेद पढ़ौँ नहिँ कासी ॥१॥
जंत्र मंत्र टोटका नहिँ जानौँ, निसु दिन फिरत उदासी ॥२॥
यहि घट भीतर बधिक बसत है, दिये लोभ की टाटी ॥३॥
धरमदास बिनवै कर जोरो, सतगुरु चरनन दासी ॥४॥
॥ शब्द १५ ॥
साहेब बंदी-छोर हमारे ॥ टेक ॥
ठाढ़े बैठे चलत निहारे, जागत साँझ सवारे ।
करुना-सिंधु दया के आगर, नैनन के उँजियारे ॥१॥
बोलत बचन मीठ बहु लागै, पूरन पुरुष पियारे ।
उनकी रहनि गहनि जब पैहौ, होइ रहु सब से न्यारे ॥२॥
है बहु ज्ञान ध्यान बहुतैरो, खोलो गगन किवारे ।
दया सरूप बसै सिंधू मेँ, हीरा लाल निकारे ॥३॥
साहेब कबीर सदा के सतगुरु, हंसन के रखवारे ।
धरमदास पर दाया कीन्हा, आया सरन तुम्हारे ॥४॥
॥ शब्द १६ ॥
साहेब मोरी ओर निहारो ।
परजा पुत्र अहौँ मैँ साहेब, बहुत बात मैँ टारो ॥१॥
हौँ मैँ कोटि जनम को पापी, मन बच करम असारो ।
एकौ कर्म छुटे ना कवहूँ, बहु बिधि बात बिगारो ॥२॥
हौँ अपराधी बहुत जुगन को, नइया मोर उवारो ।
बंदीछोर सकल सुख-दाता, करुनामय करत पुकारो ॥३॥
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