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धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press

सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished98 पृष्ठ

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पृष्ठ 37

२४ विनती
मात पिता हित बंधु तुम, का से दुख रोई।
सब कछु तुम्हरे हाथ है, तुम्हरै मुख जोही ॥२॥
गुन तो मोरे है नहीं, औगुन बहुतेरे।
ओट लई तुम नाम की, राखो पत सोई ॥३॥
सतगुरु तुम चीन्हे बिना, मति बुधि सब खोई।
सब जीवन के एक तुम, दूजा नहिँ कोई ॥४॥
मैं गरजी अरजी करौँ, मरजी जस होई।
अरज बिपति लिखौँ आपनी, राखौँ नहिँ गोई ॥५॥
धरमदास सत साहेबी, घट घटहिँ समोई।
साहेब कबीर सतगुरु मिले, आवागवन न होई ॥६॥
॥ शब्द १३ ॥
साँईँ मैं असल गुलाम तिहारा ॥ टेक ॥
काया नगर बन्यो अति सुन्दर, मोह को लग्यो बजारा।
कुमति कलोल करै दसहोंँ दिसि, लोभ को ठुक्यो नगारा ॥१॥
मोह समुन्दर भरे अपरबल, भँवर भँवै¹ अति भारा।
काम क्रोध का लहर उठतु है, केहि बिधि होय निवारा ॥२॥
पाँच के ऊपर पचिस महतिया, इन परपंच पसारा।
मन अदली जहँ अदल चलावै, कहा करै जीव बिचारा ॥३॥
ना मोरे नाव नाहिँ खेवटिया, डर लागै मोहिँ भारी।
चौदह लोक मैं कोइ नहिँ दीसै, तुम गुरु पार उतारी ॥४॥
धरमदास की यही बीनती, उरझे को निर्वारो।
साहेब कबीर मिले गुरु समरथ, हम से अधम उबारो ॥५॥
(१) घूमैँ।