धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)
Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press
सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६ बिनती
सीस चढ़ाय पाप की मोटरी, आयो तुम्हरे द्वारो।
को अस हमरे भार उतारै, तुम्हीं हेतु१ हमारो ॥ ४ ॥
धरमदास यह बिनती बिनवै, सतगुरु मो को तारो।
साहेब कबीर हंस के राजा, अमर लोक पहुँचावो ॥ ५ ॥
॥ शब्द १७ ॥
साहेब मोरी बहियाँ सम्हारि गही ॥ टेक ॥
गहिरी नदिया नाव झाँझरी, बोझा अधिक भई।
मोह लोभ की लहर उठत है, नदिया झकोर बही ॥ १ ॥
तुमहि बिगारो तुमहिं सँवारो, तुमहिं भंडार भरी।
जब चाहो तब पार लगावो, नहिँ तो जात बही ॥ २ ॥
कुमति काटि के सुमति बढ़ावो, बल बुधि ज्ञान दई।
मैं पापी बहु बेरी चूकूँ, तुम मेरी चूक सही ॥ ३ ॥
धरमदास सरन सतगुरु के, अब धुनि लाग रही।
अमर लोक में डेरा परिगै, समरथ नाम सही ॥ ४ ॥
॥ शब्द १८ ॥
साहेब कौन कमी घर तेरो ॥ टेक ॥
भूखे अन्न पियासे पानी, कपड़ा से तन घेरो।
जो कछु न्यामत सबै महल में, खरच खजाना ढेरो ॥ १ ॥
खाक से पाक कियो पल माहीं, हे समरथ बल तेरो।
भव सें काढ़ि कियो तरनी२ पर, खेइ लगावो सबेरो ॥ २ ॥
रहे न घाम छाँह दुनिया में, रहे न जम को चेरो।
राव से रंक रंक से राजा, छिन में बाजत तूरो ॥ ३ ॥
मानो सत्त झूठ जनि जानो, सत्त बचन है पूरो।
धर्मदास चरनन पर बिनवै, तुम गति सब भरपूरो ॥ ४ ॥
(१) हितकारी। (२) नाव।