धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
१४—बुद्धवग्गो
उरुवेला (बोधिमण्ड) मागन्दिय् (ब्राह्मण)
१७६—यस्स जितं नावजीयति
जितमस्स नो याति कोचि लोके ।
तं बुद्धमनन्तगोचरं अपदं केन पदेन' नेस्सथ ? ॥१॥ ,
(यस्य जितं नावजीयते
जितमस्य न याति कश्चिल्लोके ।
तं बुद्धमनन्तगोचरं अपदं केन पदेन नेष्यथ ? ॥१॥ )
१८०-यस्स जालिनी विसत्तिका
तण्हा नत्थि कुहिञ्चि नेतवे ।
तं बुद्धमनन्तगोचरं अपदं केन पदेन नेस्सथ ? ॥२॥
(यस्य जालिनी विषात्मिका तृष्णा
नास्ति कुत्रचित् नेतुम् ।
तं बुद्धमनन्तगोचरं अपदं केन पदेन नेष्यथ ? ॥२॥)
८२]
११. जरावग्गो (जरा वर्ग)
१४।४ ] बुद्धवग्गो [ ८३
अनुवाद—जिसका जीता वेजीता नहीं किया जा सकता, जिसके जीते
( राग, द्वेष, मोह फिर ) नहीं लौटते; उस अपद (=स्थान-
रहित ), अनन्तगोचर (=अनन्तको देखनेवाले ) बुद्धको
किस पथसे प्राप्त करोगे ? जिसकी जाल फैलानेवाली विष-
रूपी तृष्णा कहीं भी लेजाने लायक नहीं रही; उस अपद् ०।
संकाश्य नगर देव, मनुष्य
१८१—ये झाणपसुता धीरा नेक्खम्मूपसमे रता ।
देवापि तेसं पिहयन्ति सम्बुद्धानं सतीमतं ॥३॥
( ये ध्यानप्रसिता धीरा नैष्कर्म्योपशमे रताः।
देवा अपि तेषां स्पृहयन्ति संबुद्धानां स्मृतिमत्ताम् ॥३॥ )
अनुवाद—जो धीर ध्यानमें लग्न, निष्कर्मता और उपशममें रत हैं,
उन स्मृतिमान् (=सचेत ) बुद्धोंकी देवता भी स्पृहा
(=होड ) करते हैं ।
वाराणसी ऐरकपत्त ( नागराज )
१८२-किच्छो मनुस्सपटिलाभो किच्छं मच्चानं जीवितं ।
किच्छं सद्धम्मसवणं किच्छो बुद्धानं उप्पादो ॥४॥
( कृच्छ्रो मनुष्यप्रतिलाभः कृच्छ्रं मर्त्यानां जीवितम्।
कृच्छ्रं सद्धर्मश्रवणं कृच्छ्रो बुद्धानां उत्पादः ॥४॥ )
अनुवाद—मनुष्य( योनि ) का लाभ कठिन है, मनुष्यका जीवन
( मिलना ) कठिन है, सच्चा धर्म सुननेको मिलना कठिन है,
बुद्धों (=परम ज्ञानियों ) का जन्म कठिन है ।
८४ ] धम्मपदं [ १४।७
जेतवन आनन्द (थेर) का प्रश्न
१८३-सब्बपापस्स अकरणं कुसलस्स उपसम्पदा ।
स-चित्तपरियोदपनं, एतं बुद्धान 'सासनं ॥५॥
(सर्वपापस्याकरणं कुशलस्योपसम्पदा ।
स्वचित्तपर्यवदापनं पतद् बुद्धानां शासनम् ॥५॥ )
अनुवाद—सारे पापोंका न करना, पुण्योंका संचय करना, अपने
चित्तको परिशुद्ध करना, यह है बुद्धोंकी शिक्षा ।
जेतवन आनन्द (थेर)
१८४-खन्ती परमं तपो तितिक्खा ,
निब्बाणं परमं वदन्ति बुद्धा ।
नहि पब्बजितो परूपघाती ,
समणो होति परं विहेठयन्तो ॥६॥
( क्षान्तिः परमं तपः तितिक्षा निर्वाणं परमं वदन्ति बुद्धाः ।
नहि प्रव्रजितः परोपघाती श्रमणो भवति परं विहेठयन् ॥६॥)
१८५-अनुपवादो अनुपघातो पातिमोक्खे च संवरो ।
मत्तञ्ञुता च भत्तस्मिं पन्तञ्च सयनासनं ।
अधिचित्ते च आयोगो एतं बुद्धान सासनं ॥७॥
( अनुपवादोऽनुपघातः प्रातिमोक्षे च संवरः ।
मात्राज्ञता च भक्ते प्रान्तं च शयनासनम् ।
अधिचित्ते चायोग एतद् बुद्धानां शासनम् ॥७॥ )
१४।९ ] बुद्धवग्गो [ ८५
अनुवाद--क्षमा है परम तप, और तितिक्षा बुद्ध निर्वाणको परम
(=उत्तम ) बतलाते हैं; दूसरेका घात करनेवाला, दूसरे-
को पीडित करनेवाला प्रव्रजित (=गृहत्यागी ), श्रमण
(=संन्यासी ) नहीं हो सकता । निन्दा न करना, घात न
करना, प्रातिमोक्ष (=भिक्षु-नियम, आचार-नियम ) द्वारा
अपनेको सुरक्षित रखना, परिमाण जानकर भोजन करना,
एकान्तमें सोना-बैठना (=शयनासन=निवासगृह ), चित्तको
योगमें लगाना, यह बुद्धोंकी शिक्षा है ।
जेतवन ( उदास भिक्षु )
१८६-न कहापणवस्सेन तित्ति कामेसु विज्जति ।
अप्पस्सादा दुखा कामा इति विञ्ञाय पण्डितो ॥८॥
( न कार्षापणवर्षेण तृप्तिः कामेषु विद्यते ।
अल्पास्वादा दुःखाः कामा इति विज्ञाय पण्डितः ॥८॥ )
१८७-अपि दिब्बेसु कामेसु रतिं सो नाधिगच्छति ।
तण्हक्खयरतो होति सम्मासम्बुद्धसावको ॥६॥
( अपि दिव्येषु कामेषु रतिं स नाऽधिगच्छति ।
तृष्णाक्षयरतो भवति सम्यक्संबुद्धश्रावकः ॥९॥ )
अनुवाद-यदि रुपयों (=कहापण ) की वर्षा हो, तो भी (मनुष्य की)
कामो( =भोगों ) से तृप्ति नहीं हो सकती । ( सभी ) काम
(=भोग ) अल्प-स्वाद, ( और ) दुःखद हैं, ऐसा जानकर
पंडित देवताओंके भोगोंमें भी रति नहीं करता; और
सम्यक्संबुद्ध (=बुद्ध )का श्रावक (=अनुयायी ) तृष्णा-
को नाश करनेमें लगता है ।
८६ ] धम्मपदं [ १४।१३
जेतवन अग्गिदत्त (ब्राह्मण)
१८८-बहुं वे सरणं यन्ति पब्बतानि वनानि च ।
आरामरुक्खचेत्यानि मनुस्सा भयतज्जिता ॥ १० ॥
( बहु वै शरणं यान्ति पर्वतान् वनानि च ।
आरामवृक्षचैत्यानि मनुष्या भयतर्जिताः ॥१०॥ )
१८९-नेतं खो सरणं खेमं नेतं सरणमुत्तमं ।
नेतं सरणमागम्म सब्बदुक्खा पमुच्चति ॥ ११॥
( नैतत् खलु शरणं क्षेमं नैतत् शरणमुत्तमम् ।
नैतत् शरणमागम्य सर्वदुःखात्प्रमुच्यते ॥११॥ )
अनुवाद—मनुष्य भयके मारे पर्वत, वन, आराम ( = उद्यान ), वृक्ष,
चैत्य ( = चौरा ) ( आदिको देवता मान उनकी ) शरणमें
जाते हैं; किन्तु ये शरण मंगलदायक नहीं, ये शरण
उत्तम नहीं; (क्योंकि) इन शरणोंमें जाकर सब दुःखोंसे
छुटकारा नहीं मिलता ।
जेतवन अग्गिदत्त (ब्राह्मण)
१९०-यो च बुद्धञ्च धम्मञ्च सङ्घञ्च सरणं गतो ।
चत्तारि अरियसच्चानि सम्मप्पञ्ञाय पस्सति ॥ १२॥
( यश्च बुद्धं च धर्मं च संघं च शरणं गतः ।
चत्वार्यार्यसत्यानि सम्यक् प्रज्ञया पश्यति ॥१२॥ )
१९१-दुक्खं दुक्खसमुप्पादं दुक्खस्स च अतिक्कमं ।
अरियञ्च'ट्ठङ्गिकं मग्गं दुक्खूपसमगामिनं ॥ १३॥
१४।१५] बुद्धवग्गो [ ८७
(दुःखं दुःखसमुत्पादं दुःखस्य चातिक्रमम् ।
आर्याष्टांगिकं मार्गं दुःखोपशमगामिनम् ॥१३॥ )
१६२-एतं खो सरणं खेमं एतं सरणमुत्तमं ।
एतं सरणमासम्म सव्वदुक्खा पमुच्चति ॥१४॥
( एतत् खलु शरणं क्षेमं पतत् शरणमुत्तमम् ।
पतत् शरणमागम्य सर्वदुःखात् प्रमुच्यते ॥ १४ ॥ )
अनुवाद-जो बुद्ध (=परमज्ञानी), धर्म (=सत्यज्ञान) और संघ
(=परमज्ञानियोंके अनुयायियोंके समुदाय) की शरण
गया, जो चारों आर्यसत्यों* को प्रज्ञासे भलीप्रकार देखता
है। (वह चार सत्य हैं-) (१) दुःख, (२) दुःखकी उत्पत्ति,
(३) दुःखका अतिक्रमण, और (४, दुःख नाशक)
आर्य-अष्टांगिक मार्ग†-जो कि दुःखको शमनकरनेकी ओर
ले जाता है; ये हैं मंगलप्रद शरण, ये हैं उत्तम शरण, इन
शरणोंको पाकर (मनुष्य) सारे दुःखोंसे छूट जाता है।
जेतवन आनन्द (थेर) का प्रश्न
१९३-दुल्लभो पुरिसानञ्ञो न सो सव्वत्थ जायति ।
यत्थ सो जायती धीरो तं कुलं सुखमेधति ॥१५॥
- दुःख, उसका कारण, उसका नाश, और नाशका उपाय-यह बुद्ध
द्वारा आविष्कृत चार उत्तम सच्चाइयाँ हैं।
† आर्य-अष्टांगिक मार्ग है-ठीक धारणा, ठीक संकल्प, ठीक वचन, ठीक
कर्म, ठीक जीविका, ठीक उद्योग, ठीक स्मृति, और ठीक ध्यान ।
धम्मपदं [ १४।१८
(दुर्लभः पुरुषाजानेयो न स सर्वत्र जायते।
यत्र स जायते धीरः तत् कुलं सुखमेधते ॥ १५ ॥)
अनुवाद—उत्तम पुरुष दुर्लभ है, वह सर्वत्र उत्पन्न नहीं होता, वह
धीर (पुरुष) जहाँ उत्पन्न होता है, उस कुलमें सुखकी
वृद्धि होती है।
जेतवन बहुतसे भिक्षु
१६४—सुखो बुद्धानं उप्पादो सुखा सद्धम्मदेसना ।
सुखा संघस्स सामग्गी समग्गानं तपो सुखो ॥ १६॥
(सुखो बुद्धानां उत्पादः सुखा सद्धर्म-देशना।
सुखा संघस्य सामग्री समग्राणां तपः सुखम् ॥ १६॥)
अनुवाद—सुखदायक है बुद्धोंका जन्म, सुखदायक है सच्चे धर्मका
उपदेश, संघमें एकता सुखदायक है; और सुखदायक है,
एकतायुक्त हो तप करना ।
चारिकाके समय कस्सप बुद्धका सुवर्ण चैत्य
१६५-पूजारहे पूजयतो बुद्धे यदि व सावके ।
पपञ्चसमतिक्कन्ते तिण्णसोकपरिद्दवे ॥१७॥
(पूजार्हान् पूजयतो बुद्धान् यदि वा श्रावकान् ।
प्रपंचसमतिक्रान्तान् तीर्णशोकपरिद्ववान् ॥ १७ ॥)
१६६-ते तादिसे पूजयतो निब्बुते अकुतोभये ।
न सक्का पुञ्ञं संख्यातुं इमेत्तमपि केनचि ॥१८॥
१२. अत्तवग्गो (आत्म वर्ग)
१४।१८ ] बुद्धवग्गो [ ८९
( तान् तादृशान् पूजयतो निर्वृतान् अकुतोभयान् ।
न शक्यं पुण्यं संख्यातुं एवम्मात्रमपि केनचित् ॥ १८ ॥)
अनुवाद—पूजनीय बुद्धों, अथवा ( उनके ) अनुगामियों—जो संसार
को अतिक्रमणकर गये हैं, जो शोक भयको पारकर गये
हैं—की पूजाके, ( या ) उन ऐसे मुक्त और निर्भय (पुरुषों)
की पूजाके, पुण्यका परिमाण "इतना है"—यह नहीं कहा
जा सकता ।
१४-बुद्धवर्ग समाप्त
१५—सुखवग्गो
शाक्य नगर जाति कलहके उपशमनार्थ
१६७-सुसुखं वत ! जीवाम वेरिनेसु अवेरिनो ।
वेरिनेसु मनुस्सेसु विहराम अवेरिनो ॥ १॥
( सुसुखं बत ! जीवामो वैरिष्ववैरिणः ।
वरिषु मनुष्येषु विहरामोऽवैरिणः ॥१॥ )
१६८-सुसुखं वत ! जीवाम आतरेसु अनातुरा ।
आतरेसु मनुस्सेसु विहराम अनातुरा ॥२॥
( सुसुखं बत ! जीवाम आतुरेष्वनातुराः ।
आतुरेषु मनुष्येषु विहरामोऽनातुराः ॥२॥ )
१६६-सुसुखं वत ! जीवाम उस्सुकेसु अनुस्सुका ।
उस्सुकेसु मनुस्सेसु विहराम अनुस्सुका ॥३॥
( सुसुखं बत ! जीवाम उत्सुकेष्वनुत्सुकाः ।
उत्सुकेषु मनुष्येषु विहराम अनुत्सुकाः ॥३॥ )
९० ]
१५।५ ] सुखवग्गो [ ९१
अनुवाद—वैरियोंके प्रति ( भी ) अवैरी हो, अहो ! हम ( कैसा )
सुखपूर्वक जीवन बिता रहे हैं; वैरी मनुष्योंके बीच अवैरी
होकर हम विहार करते हैं। भयभीत मनुष्योंमें अभय हो,
अहो ! हम सुखपूर्वक जीवन बिता रहे हैं; भयभीत मनुष्यों
के बीच निर्भय होकर हम विहार करते हैं । उत्सुकौं
(=आसक्तों) में उत्सुकता-रहित हो० ।
पंचसाला ( ब्राह्मणग्राम, मगध ) मार -
२००-सुसुखं वत ! जीवाम येसं नो नत्थि किञ्चनं ।
पीतिमक्खा भविस्साम देवा आभस्सरा यथा ॥४॥
( सुसुखं वत ! जीवामो येषां नो नास्ति किंचन ।
प्रीतिभक्ष्या भविष्यामो देवा आभास्वरा यथा ॥४॥ )
अनुवाद—जिन हम ( लोगों ) के पास कुछ नहीं, अहो ! वह हम
कितना सुखसे जीवन बिता रहे हैं। हम आभास्वर देवताओं
की भाँति प्रीतिभक्ष्य (=प्रीति ही भोजन है जिनका ) हैं ।
जेतवन कोसलराज
२०१-जयं वेरं पसवति दुक्खं सेति पराजितो ।
उपसन्तो सुखं सेति हित्वा जयपराजयं ॥५॥
( जयो वैरं प्रसूते दुःखं शेते पराजितः ।
उपशान्तः सुखं शेते हित्वा जयपराजयौ ॥५॥ )
अनुवाद—विजय वैरको उत्पन्न करती है, पराजित ( पुरुष ) दुःखकी
( नींद ) सोता है; ( राग आदि दोष जिसके ) शान्त ( हैं,
१२ ] धम्मपदं [ १५/७
वह पुरुष ) जय ओर पराजयको छोड़ सुखकी (नींद)
सोता है।
जेतवन कोई कुलकन्या
२०२—नत्थि रागसमो अग्गि, नत्थि दोससमो कलि ।
नत्थि खन्धसमा दुक्खा नत्थि सन्तिपरं सुखं ॥६॥
( नास्ति रागसमोऽग्निः, नास्ति द्वेषसमः कलिः ।
नास्ति स्कन्धसमा दुःखाः, नास्ति शान्तिपरं सुखम् ॥६॥ )
अनुवाद—रागके समान अग्नि नहीं, द्वेषके समान मल नहीं, (पाँच)
स्कन्धो* के (=समुदाय) समान दुःख नहीं, शान्तिसे
बढ़कर सुख नहीं।
आलवी एक उपासक
२०३—जिघच्छा परमा रोगा, सङ्घारा परमा दुखा ।
एतं ञत्वा यथाभूतं निब्बाणं परमं सुखं ॥७॥
( जिघत्सा परमो रोगः, संस्काराः परमं दुःखम् ।
एतद् ज्ञात्वा यथाभूतं निर्वाणं परमं सुखम् ॥७॥ )
अनुवाद—भूख सबसे बड़ा रोग है, संस्कार सबसे बड़े दुःख हैं,
- रूप, वेदना, सञ्ञा, सस्कार, विञ्ञान यह पाँच स्कन्ध हैं। वेदना, सञ्ञा,
सस्कार विञ्ञानके अन्दर हैं । पृथिवी, जल, अग्नि, वायु ही रूप स्कध
है। जिसमें न भारीपन है, और जो न जगह घेरता है, वह विञ्ञान स्कध
है। रूप (=Matter) और विञ्ञान (=Mind) इन्हींके मेळसे सारा
ससार बना है।
१५।१० ] सुखवग्गो [ ९३
यह जान, यथार्थ निर्वाणको सबसे बड़ा सुख (कहा
जाता है)।
जेतवन ( पसेनदि कोसलराज )
२०४-आरोग्यपरमा लाभा सन्तुट्ठी परमं धनं ।
विस्सासपरमा ञाती निब्बाणं परमं सुखं ॥८॥
( आरोग्यं परमो लाभः, सन्तुष्टिः परमं धनम् ।
विश्वासः परमा ज्ञातिः, निर्वाणं परमं सुखम् ॥८॥ )
अनुवाद—निरोग होना परम लाभ है, सन्तोष परम धन है, विश्वास
सबसे बड़ा बन्धु है, निर्वाण परम (=सबसे बड़ा) सुख है।
वैशाली तिस्स (थेर)
२०५-पविवेकरसं पीत्वा रसं उपसमस्स च ।
निद्दरो होति निष्पापो धम्मपीतिरसं पिवं ॥६॥
( प्रविवेकरसं पीत्वा रसं उपशमस्य च ।
निर्दरो भवति निष्पापो धर्म प्रीतिरसं पिवन् ॥९॥ )
अनुवाद—एकान्त (चिन्तन)के रस, तथा उपशम (=शान्ति)के
रसको पीकर (पुरुष), निडर होता है, (और) धर्मका
प्रेमरस पानकर निष्पाप होता है।
बेल्लुवग्राम (वेणुग्राम, वैशालीके पास) सक्क (देवराज)
२०६-साधु दस्सनमरियानं सन्निवासो सदा सुखो ।
अदस्सनेन बालानं निच्चमेव सुखी सिया ॥१०॥
९४ ] धम्मपदं [ १५।१२
( साधु दर्शनमार्याणां सन्निवासः सदा सुखः ।
अदर्शनेन बालानां नित्यमेव सुखी स्यात् ॥१०)
२०७-बालसंगतिचारी हि दीघमद्धानं सोचति ।
दुक्खो बालेहि संवासो अमित्तेनेव सब्बदा ।
धीरो च सुखसंवासो ञातीनं 'व समागमो ॥११॥
( बालसंगतिचारी हि दीर्घमध्वानं शोचति ।
दुःखो बालैः संवासोऽमित्रेणैव सर्वदा ।
धीरश्च सुखसंवासो ज्ञातीनामिव समागमः ॥११॥)
अनुवाद—आर्यों* (=सत्पुरुषों) का दर्शन सुन्दर है, सन्तोंके साथ
निवास सदा सुखदायक होता है; मूढ़ोंके न दर्शन होनेसे
(मनुष्य) सदा सुखी रहता है। मूढ़ोंकी संगतिमें रहने-
वाला दीर्घ काल तक शोक करता है, मूढ़ोंका सहवास
शत्रु की तरह सदा दुःखदायक होता है, बन्धुओंके समागम-
की भाँति धीरोंका सहवास सुखद होता है।
वेलुवगाम सक्क (देवराज)
२०८-तस्मा हि धीरं च पञ्ञञ्च बहुस्सुतं च
धोरय्हसीलं वतवन्तमरियं ।
तं तादिसं सप्पुरिसं सुमेधं
भजेथ नक्खत्तपथं 'व चन्दिमा ॥१२॥
*निर्वाणके पथपर अविचल रूपसे आरूढ़ स्रोतआपन्न, सकृदागामी,
अनागामी तथा निर्वाण-प्राप्त=अर्हत् इन चार प्रकारके पुरुषोंको आर्य कहते हैं।
१३. लोकवग्गो (लोक वर्ग)
१५।१२ ] सुखवग्गो [ ९५
( तस्माद्धि धीरं च प्राज्ञं च बहुश्रुतं च
धुर्यशीलं व्रतवन्तमार्यम् ।
तं तादृशं सत्पुरुषं सुमेधसं
भजेत नक्षत्रपथमिव चन्द्रमा ॥१२॥)
अनुवाद—इसलिये धीर, प्राज्ञ, बहुश्रुत, उद्योगी, व्रती, आर्य एवं
सुबुद्धि सत्पुरुषका वैसेही सेवन करे, जैसे चन्द्रमा नक्षत्र-
पथका ( सेवन करता है ) ।
१५—सुखवर्ग समाप्त
१६—पियवग्गो
जेतवन तीन भिक्षु
२०९-अयोगे युञ्जमत्तानं योगस्मिञ्च अयोजयं ।
अत्थं हित्वा पियग्गाही पिहेत'त्तानुयोगिनं ॥१॥
(अयोगे युंजन्नात्मानं योगे चायोजयन् ।
अर्थं हित्वा प्रिय-ग्राही स्पृहयेदात्मानुयोगिनम् ॥१॥)
२१०-मा पियेहि समागच्छि अप्पियेहि कदाचनं ।
पियानं अदस्सनं दुक्खं अप्पियानञ्च दस्सनं ॥२॥
(मा प्रियैः समागच्छ, अप्रियैः कदाचन ।
प्रियाणां अदर्शनं दुःखं, अप्रियाणां च दर्शनम् ॥२॥)
२११-तस्मा पियं न कयिराथ पियापायो हि पापको ।
गन्था तेसं न विज्जन्ति येसं नत्थि पियाप्पियं ॥३॥
(तस्मात् प्रियं न कुर्यात्, प्रियापायो हि पापकः ।
ग्रन्थाः तेषां न विद्यन्ते येषां नास्ति प्रियाप्रियम् ॥३॥)
९६]
१६।५ ] पियवग्गो [ ९७
अनुवाद—अयोग(=अनासक्ति) में अपनेको लगानेवाले, योग
(=आसक्ति) में न योग देनेवाले, अर्थ (=स्वार्थ) छोड
प्रियका ग्रहण करनेवाले आत्माऽनुयोगी (पुरुष) की स्पृहा
करे । प्रियोंका संग मत करो, और न कभी अप्रियों ही
(का संग करो), प्रियोका न देखना दुःखद् होता है,
और अप्रियोंका देखना (भी)। इसलिये प्रिय न बनावे,
प्रियका नाश बुरा (लगता है); उनके (दिलमें) गाँठ
नहीं पडती, जिनके प्रिय अप्रिय नहीं होते ।
जेतवन कोई कुटुम्बी
२१२-पियतो जायते सोको पियतो जायते भयं ।
पियतो विप्पमुत्तस्स नत्थि सोको कुतो भयं ? ॥४॥
(प्रियतो जायते शोकः प्रियतो जायते भयम् ।
प्रियतो विप्रमुक्तस्य नास्ति शोकः कुतो भयम् ?॥४॥)
अनुवाद—प्रिय (वस्तु) से शोक उत्पन्न होता है, प्रियसे भय उत्पन्न
होता है; प्रिय(के बन्धन) से जो मुक्त है, उसे शोक
नहीं है, फिर भय कहाँसे (हो) ?
जेतवन विशाखा (उपासिका)
२१३-पेमतो जायते सोको पेमतो जायते भयं ।
पेमतो विप्पमुत्तस्स नत्थि सोको कुतो भयं ? ॥५॥
(प्रेम्तो जायते शोकः प्रेम्तो जायते भयम् ।
प्रेम्तो विप्रमुक्तस्य नाऽस्ति शोकः कुतो भयम् ?॥५॥
७
९८ ] धम्मपदं [ १६।८
अनुवाद—प्रेमसे शोक उत्पन्न होता है, प्रेमसे भय उत्पन्न होता है,
प्रेमसे मुक्तको शोक नहीं, फिर भय कहाँसे ?
वैशाली (कूटागारशाला) लिच्छवि लोग
२१४-रतिया जायते सोको रतिया जायते भयं ।
रतिया विप्पमुत्तस्स नत्थि सोको कुतो भयं ॥६॥
(रत्या जायते शोको रत्या जायते भयम् ।
रत्या विप्रमुक्तस्य नाऽस्ति शोकः कुतो भयम् ॥६॥)
अनुवाद—रति(=राग) से शोक उत्पन्न होता है, रतिसे भय उत्पन्न
होता है० ।
जेतवन अनित्यगन्धकुमार
२१५-कामतो जायते सोको कामतो जायते भयं ।
कामतो विप्पमुत्तस्स नत्थि सोको कुतो भयं ॥७॥
(कामतो जायते शोकः कामतो जायते भयम् ।
कामतो विप्रमुक्तस्य नाऽस्ति शोकः कुतो भयम् ? ॥७॥)
अनुवाद—कामसे शोक उत्पन्न होता है० ।
जेतवन कोई ब्राह्मण
२१६-तणहाय जायते सोको तणहाय जायते भयं ।
तणहाय विप्पमुत्तस्स नत्थि सोको कुतो भयं ?॥८॥
(तृष्णाया जायते शोकः तृष्णाया जायते भयम् ।
तृष्णाया विप्रमुक्तस्य नाऽस्ति शोकः कुतो भयम् ? ॥८॥)
१६।११ ] पियवग्गो [ ९९
अनुवाद—तृष्णासे शोक उत्पन्न होता है० ।
राजगृह (वेणुवन) पाँच सौ बालक
२१७–सीलदस्सनसम्पन्नं धम्मट्ठं सच्चवादिनं ।
अत्तनो कम्म कुब्बानं तं जनो कुरुते पियं ॥६॥
( शीलदर्शनसम्पन्नं धर्मिष्ठं सत्यवादिनम् ।
आत्मनः कर्म कुर्वाणं तं जनः कुरुते प्रियम् ॥९॥ )
अनुवाद—जो शील (=आचरण) और दर्शन (=विद्या) से सम्पन्न,
धर्ममें स्थित, सत्यवादी और अपने कामको करनेवाला है,
उस (पुरुष) को लोग प्रेम करते हैं ।
जेतवन (अनागामी)
२१८–छन्दजातो अनक्खाते मनसा च फुटो सिया ।
कामेसु च अप्पटिबद्धचित्तो उद्धंसोतो 'ति वुच्चति ॥१०॥
( छन्दजातोऽनाख्याते मनसा च स्फुरितः स्यात् ।
कामेषु चाऽप्रतिबद्धचित्त ऊर्ध्वस्रोता इत्युच्यते ॥१०॥ )
अनुवाद—जो अकथ्य (-वस्तु=निर्वाण) का अभिलाषी है, (उसमें)
जिसका मन लगा है, कामो(=भोगों) में जिसका चित्त बद्ध
नहीं, वह ऊर्ध्वस्र्रोत कहा जाता है ।
ऋषिपत्तन नन्दियपुत्त
२१६–चिरप्पवासिं पुरिसं दूरतो सोत्थिमागतं ।
ञातिमित्ता सुहज्जा च अभिनन्दन्ति आगतं ॥११॥
१०० ] धम्मपदं [ १६।१२
( चिरप्रवासिनं पुरुषं दूरतो स्वस्त्यागतम् ।
ज्ञातिमित्राणि सुहृदश्चाऽभिनन्दन्त्यागतम् ॥११॥ )
२२०--तथेव कतपुञ्ञम्पि अस्मा लोका परं गतं ।
पुञ्ञानि पतिगण्हन्ति पियं ञातीव आगतं ॥१२॥
( तथैव कृतपुण्यमप्यस्मात् लोकात् परं गतम् ।
पुण्यानि प्रतिगृह्णन्ति प्रियं ज्ञातिमिवागतम् ॥१२॥ )
अनुवाद--चिर-प्रवासी (=चिर काल तक परदेशमें रहे) दूर (देश)
से सानन्द लौटे पुरुषका, जातिवाले, मित्र और सुहृद् अभि-
नन्दन करते हैं; इसी प्रकार पुण्यकर्मा (पुरुष) को इस
लोकसे पर(लोक) में जानेपर, (उसके) पुण्य (कर्म)
प्रिय जाति(वालों) की भाँति स्वीकार करते हैं।
१६-प्रियवर्ग समाप्त
१४. बुद्धवग्गो (बुद्ध वर्ग)
१७—कोधवग्गो
कपिलवस्तु ( न्यग्रोधाराम ) रोहिणी
२२१-कोधं जहे विप्पजहेय्य मानं
संयोजनं सब्बमतिकम्मेय्य ।
तं नाम-रूपस्मिं असज्जमानं
अकिञ्चनं नानुपतन्ति दुक्खा ॥ १॥
(क्रोधं जह्याद् विप्रजह्यात् मानं
संयोजनं सर्वमतिक्रामेत् ।
तं नाम-रूपयोरसज्यमानं
अकिंचनं नाऽनुपतन्ति दुःखानि ॥१॥)
अनुवाद—क्रोधको छोड़े, अभिमानका त्याग करे, सारे संयोजनों
(=बंधनों) से पार हो जाये, ऐसे नाम-रूपमें आसक्त न
होनेवाले, तथा परिग्रहरहित (पुरुष)को दुःख संताप
नहीं देते।