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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

३. चित्तवग्गो (चित्त वर्ग)

२६ ] धम्मपदं [ ४।१४
अनुवाद—फूलकी सुगंध हवासे उलटी ओर नहीं जाती, न चन्दन,
तगर या चमेली (की गंध ही वैसा करती है);
किन्तु सज्जनोंकी सुगंध हवासे उलटी ओर जाती है,
सत्पुरुष सभी दिशाओंमें (सुगंध) बहाते हैं।
५५-चन्दनं तगरं वापि उप्पलं अथ वस्सिकी।
एतेसं गन्धजातानं सीलगन्धो अनुत्तरो ॥१२॥
(चन्दनं तगरं वापि उत्पलं अथ वार्षिकी।
एतेषां गन्धजातानां शीलगन्धोऽनुत्तरः ॥१२॥)
अनुवाद—चन्दन या तगर, कमल या जूही, इन सभी (की) सुगंधों-
से सदाचारकी सुगंध उत्तम है।
राजगृह (वेणुवन) महाकस्सप
५६—अप्पमत्तो अयं गन्धो या'यं तगरचन्दनी।
यो च सीलवतं गन्धो वाति देवेसु उत्तमो ॥१३॥
(अल्पमात्रोऽयं गन्धो योऽयं तगरचन्दनी।
यश्च शीलवतां गन्धो वाति देवेषु उत्तमः ॥१३॥)
अनुवाद—तगर और चन्दनकी जो यह गंध फैलती है, वह अल्प-
मात्र है; और जो यह सदाचारियोंकी गंध है, (वह) उत्तम
(गंध) देवताओंमें फैलती है।
राजगृह (वेणुवन) गोधिक (थेर)
५७-तेसं सम्पन्नसीलानं अप्पमादविहारिनं ।
सम्मदञ्ञाविमुत्तानं मारो मग्गं न विन्दति ॥१४॥

४।१६ ] पुप्फवग्गो [ २७
(तेषां सम्पन्नशीलानां अप्रमाद-विहारिणाम् ।
सम्यग्-ज्ञा-विमुक्तानां मारो मार्गं न विन्दति ॥१४॥ )
अनुवाद—( जो ) वे सदाचारी निरालस हो विहरनेवाले, यथार्थ
ज्ञान द्वारा मुक्त ( हो गये हैं ), ( उनके ) मार्गको मार
नहीं पकड सकता ।
जेतवन गरहादिन्न
५८-यथा संकारधानस्मिं उज्झितस्मिं महापथे ।
पदुमं तत्थ जायेथ सुचिगन्धं मनोरमं ॥१५॥
( यथा संकारधान उज्झिते महापथे ।
पद्म तत्र जायेत शुचिगन्धं मनोरमम् ॥१५॥ )
५६-एवं संकारभूतेसु अन्धभूते पृथुज्जने ।
अतिरोचति पञ्ञाय सम्मासम्बुद्धसावको ॥१६॥
( एवं संकारभूते अन्धभूते पृथग्जने ।
अतिरोचते प्रज्ञया सम्यक्-संबुद्ध-श्रावकः ॥१६॥ )
अनुवाद—जैसे महापथपर फेंके कूड़ेके ढेरपर मनोरम, शुचिगंध,
गुलाब ( =पद्म ) उत्पन्न होवे, इसी प्रकार कूड़े समान
अन्धे अज्ञजनों ( =पृथग्-जनों ) में सम्यक्-संबुद्ध ( =यथार्थ
ज्ञानी ) का अनुगामी ( अपनी ) प्रज्ञासे प्रकाशमान
होता है ।
४-पुष्पवर्ग समाप्त

५'—बालवग्गो
श्रावस्ती ( जेतवन ) दरिद्र सेवक
६०-दीघा जागरतो रत्ति दीघं सन्तस्स योजनं ।
दीघो बालानं संसारो सद्धम्मं अविजानतं ॥ १॥
( दीर्घा जाग्रतो रात्रिः दीर्घं श्रान्तस्य योजनम् ।
दीर्घो बालानां संसारः सद्धर्मं अविजानताम् ॥१॥ )
अनुवाद—जगतेको रात लम्बी होती है, थकेके लिये योजन लम्बा
होता है, सच्चे धर्मको न जाननेवाले मूढोंके लिये संसार
( = आवागमन ) लम्बा है।
राजगृह सार्द्धविहारी (=शिष्य )
६१-चरञ्चे नाधिगच्छेय्य सेय्यं सदिसमत्तनो ।
एकचरियं दळ्हं कयिरा नत्थि बाले सहायता ॥२॥
( चरन् चेत् नाधिगच्छेत् श्रेयांसं सदृशं आत्मनः ।
एकचर्यां दृढं कुर्यात् नास्ति बाले सहायता ॥२॥ )
२८ ]

५।२ ] बालवग्गो [ २९
अनुवाद—यदि विचरण करते अपने अनुरूप भलेमानुषको न पाये,
तो दृढ़ताके साथ अकेला ही विचरे, मूर्खसे मित्रता
नहीं निभ सकती ।
श्रावस्ती आनन्द ( सेठ )
६२—पुत्ता म'त्थि धनम्म'त्थि इति बालो विहञ्ञति ।
अत्ता हि अत्तनो नत्थि कुतो पुत्तो कुतो धनं ॥३॥
( पुत्रा मे सन्ति धनं मे ऽस्ति इति बालो विहन्यते ।
आत्मा हि आत्मनो नास्ति कुतः पुत्रः कुतो धनम् ॥३॥ )
अनुवाद—"पुत्र मेरा है", "धन मेरा है" ऐसा ( करके ) अज्ञ
( नर ) उत्पीड़ित होता है, जब आत्मा ( = शरीर ) ही
अपना नहीं, तो कहाँसे पुत्र और धन ( अपना होगा ) ।
जेतवन गिरहकट चोर
६३—यो बालो मञ्ञती बाल्यं पण्डितो चापि तेन सो ।
बालो च पण्डितमानी, स वे बालो'ति वुच्चति ॥४॥
( यो बालो मन्यते बाल्यं पण्डितश्चापि तेन स ।
बालश्च पंडितमानी स, वै बाल इत्युच्यते ॥४॥ )
अनुवाद—जो ( कि वह ) अज्ञ होकर ( अपनी ) अज्ञताको जानता
है, इस ( अंश ) से वह पंडित ( = जानकार ) है । वस्तुतः
अज्ञ होकर भी जो पंडित होनेका दम भरता है, वही अज्ञ
( =बाल ) कहा जाता है ।

३० ] धम्मपदं [ ५।७
श्रावस्ती ( जेतवन ) उदायी ( थेर )
६४-यावजीवम्पि चे बालो पण्डितं पयिरुपासति ।
न सो धम्मं विजानाति दब्बी सूपरसं यथा ॥ ५॥
( यावज्जीवमपि चेद् बालः पंडितं पर्युपास्ते ।
न स धर्मं विजानाति दर्वी सूपरसं यथा ॥५॥ )
अनुवाद—चाहे बाल ( = जड; अज्ञ ) जीवन भर पंडितकी सेवामें
रहे ( तो भी ) वह धर्मको ( वैसे ही ) नहीं जान सकता,
जैसे कि कलछी ( = दब्बी = दयली ) सूप ( = दाल
आदि ) के रसको ।
श्रावस्ती ( जेतवन ) भद्रवर्गीय ( भिक्षुलोग )
६५-मुहुत्तमपि चे विञ्ञू पण्डितं पयिरुपासति ।
खिप्पं धम्मं विजानाति जिह्वा सूपरसं यथा ॥६॥
( मुहूर्त्तमपि चेद् विज्ञः पंडितं पर्युपास्ते ।
क्षिप्रं धर्मं विजानाति जिह्वा सूपरसं यथा ॥६॥ )
अनुवाद—चाहे विज्ञ ( पुरुष ) एक मुहूर्त ही पंडितकी सेवामें
रहे, ( तो भी वह ) शीघ्र ही धर्मको जान सकता है, जैसे
कि जिह्वा सूपके रसको ।
राजगृह ( वेणुवन ) सुप्पबुद्ध ( कोढ़ी )
६६-चरन्ति बाला दुम्मेधा अमित्तेनेव अत्तना ।
करोन्तो पापकं कम्मं यं होति कटुकप्फलं ॥७॥
( चरन्ति बाला दुर्मेधसोऽमित्रेणेवात्मना ।
कुर्वन्तः पापकं कर्म यद् भवति कटुकफलम् ॥७॥ )

५।१० ] बालवग्गो [ ३१
अनुवाद—पाप कर्मको—जो कि कटु फल देनेवाला होता है—करते
दुष्ट बुद्धि अज्ञ ( जन ) अपने ही अपने शत्रु बनते हैं।
जेतवन कोई कस्सप
६७-न तं कम्मं कतं साधु यं कत्वा अनुतप्पति ।
यस्स अस्सुमुखो रोदं विपाकं पटिसेवति ॥८॥
( न तत् कर्म कृतं साधु यत् कृत्वाऽनुतप्यते ।
यस्याश्रुमुखो रुदन् विपाकं प्रतिसेवते ॥८॥ )
अनुवाद—उस कामका करना ठीक नहीं, जिसे करके ( पीछे )
अनुताप करना पड़े, और जिसके फलको अश्रुमुख रोते
भोगना पड़े।
( वेणुवन ) सुमन ( माली )
६८-तञ्च कम्मं कतं साधु यं कत्वा नानुतप्पति ।
यस्स प्रतीतो सुमनो विपाकं पटिसेवति ॥६॥
( तच्च कर्म कृतं साधु यत् कृत्वा नानुत्तप्यते ।
यस्य प्रतीतः सुमना विपाकं प्रतिसेवते ॥९॥ )
अनुवाद—उसी कामका करना ठीक है, जिसे करके अनुताप करना
( = पछताना ) न पड़े, और जिसके फलको प्रसन्न मनसे
भोग करे ।
जेतवन उप्पलवण्णा ( थेरी )
६६-मधू'व मञ्ञति बालो याव पापं न पच्चति ।
यदा च पच्चती पापं अथ दुक्खं निगच्छति ॥१०॥

४. पुप्फवग्गो (पुष्प वर्ग)

५२ ] धम्मपदं [ ५।१२
( मध्विव मन्यते बालो यावत् पापं न पच्यते ।
यदा च पच्यते पापं अथ दुःखं निगच्छति ॥१०॥ )
अनुवाद—अज्ञ ( जन ) जब तक पापका परिपाक नहीं होता, तब
तक उसे मधुके समान जानता है। जब पापका परिपाक
होता है, तो दुखी होता है।
राजगृह ( वेणुवन ) जम्बुक ( आजीवक साधु )
७०-मासे मासे कुसग्गेन बालो भुञ्जेथ भोजनं ।
न सो संखतधम्मानं कलं अग्घति सोळसिं ॥११॥
( मासे मासे कुशाग्रेण बालो भुंजीत भोजनम् ।
न स संख्यातधर्माणां कलामर्हति षोडशीम् ॥११॥)
अनुवाद—यदि अज्ञ ( पुरुष ) कुशकी नोकसे महीने महीनेपर
खाना खाये, तो भी धर्मके जानकारोके सोलहवें भागके
भी बराबर ( वह तप ) नहीं हो सकता ।
राजगृह ( वेणुवन ) अहिपेत
७१-न हि पापं कतं कम्मं सञ्जु खीरं 'व मुच्चति ।
डहन्तं बालमन्वेति भस्माच्छन्नो 'व पावको ॥१२॥
( नहि पापं कृतं कर्म सद्यः क्षीरमिव मुंचति ।
दहन् बालमन्वेति भस्माच्छन्न इव पावकः ॥१२॥)
अनुवाद—ताजे दूधकी भाँति किया पाप कर्म, ( तुरन्त ) विकार
नहीं लाता, वह भस्मसे ढँकी आगकी भाँति दग्ध करता
अज्ञजनका पीछा करता है।

५।१५ ] बालवग्गो [ ३३
राजगृह (वेणुवन) सट्ठिकूट (पेत)
७२-यावदेव अनत्थाय ञत्तं बालस्स जायति ।
हन्ति बालस्स सुक्कंसं मुद्धमस्स विपातयं ॥१३॥
(यावदेव अनर्थाय ज्ञातं बालस्य जायते ।
हन्ति बालस्य शुक्लांशं मूर्द्धानमस्य विपातयन् ॥१३॥)
अनुवाद—मूर्ख (=बाल) का जितना भी ज्ञान है, (वह उसके)
अनर्थके लिये होता है। वह उसकी मूर्धा (=शिर=प्रज्ञा)
को गिराकर उसके शुक्ल (=धवल=शुद्ध) अंशका विनाश
करता है।
जेतवन सुधम्म (थेर)
७३-असतं भावनमिच्छेय्य पुरक्खारञ्च भिक्खुसु ।
आवासेसु च इस्सरियं पूजा परकुलेसु च ॥१४॥
(असद् भावनमिच्छेत् पुरस्कारं च भिक्षुषु ।
आवासेषु चैश्वर्यं पूजा परकुलेषु च ॥१४॥)
७४-ममेव कतमञ्ञन्तु गिही पब्बजिता उभो ।
ममेवातिवसा अस्सु किच्चाकिच्चेसु किस्मिचि ।
इति बालस्स सङ्कप्पो इच्छा मानो च वड्ढति ॥१५॥
(ममैव कृतं मन्येतां गृहि-प्रव्रजितावुभौ ।
ममैवातिवशाः स्यातां कृत्याकृत्येषु केषु चित् ।
इति बालस्य संकल्प इच्छा मानश्च वर्द्धते ॥१५॥)
अनुवाद—अप्रस्तुत वस्तुकी चाह करता है, भिक्षुओंमें बडा बनना
३

३४ ] धम्मपदं [ ५।१६
( चाहता है ), मठो ( और निवासो ) में स्वामीपन
(=ऐश्वर्य ) और दूसरे कुलोंमें पूजा ( चाहता है )। गृहस्त
और संन्यासी दोनो मेरे ही कियेको मानें, किसी भी कृत्य-
अकृत्यमे मेरे ही वशवर्ती हो—ऐसा मूढ़का सकल्प होता
है, ( जिससे उसकी ) इच्छा और अभिमान बढ़ते हैं ।
श्रावस्ती ( जेतवन ) ( बनवासी ) तिस्स ( थेर )
७५-अञ्‍ञा हि लाभूपनिसा अञ्‍ञा निब्बान-गामिनी ।
एवमेतं अभिञ्‍ञाय भिक्खू बुद्धस्स सावको ॥
सकारं नाभिनन्देय्य विवेकमनुब्रूहये ॥ १६ ॥
( अन्या हि लाभोपनिषद् अन्या निर्वाणगामिनी ।
एवमेतद् अभिज्ञाय भिक्षुर्बुद्धस्य श्रावकः ।
सत्कारं नाभिनन्देत् विवेकमनुबृंहयेत् ॥१६॥)
अनुवाद—लाभका रास्ता दूसरा है, और निर्वाणको लेजानेवाला
दूसरा—इस प्रकार इसे जानकर बुद्धका अनुगामी भिक्षु
'सत्कारका अभिनन्दन न करे, और विवेक (=एकान्तचर्या)
को बढ़ावे ।
५—बालवर्ग समाप्त

६—पण्डितवग्गो
जेतवन राध (थेर)
७६—निधीनं'व पत्तारं यं पस्से वज्ज-दस्सिनं ।
निग्गय्हवादिं मेधाविं तादिसं पण्डितं भजे ।
तादिसं भजमानस्स सेय्यो होति न पापियो ॥ १ ॥
(निधीनामिव प्रवक्तारं यं पश्येत् वर्ज्यदर्शिनम् ।
निगृह्यवादिनं, मेधाविनं तादृशं पंडितं भजेत् ।
तादृशं भजमानस्य श्रेयो भवति न पापीयः ॥ १ ॥ )
अनुवाद—(भूमिमें गुप्त) निधियोंके बतलानेवालेकी तरह, बुराईको
दिखलानेवाले ऐसे संयमवादी, मेधावी पंडितकी सेवा
करे। ऐसेके सेवन करनेवालेका कल्याण होता है, अमंगल
नहीं (होता)।
जेतवन अस्सजी, पुनब्बसू
७७—ओवदेय्यानुसासेय्य असब्भा च निवारये ।
सतं हि सो पियो होति असतं होति अप्पियो ॥ २ ॥
[ २५

१६ ] धम्मपदं [ ६।४
(अववदेदनुशिष्याद् असभ्याच्च निवारयेत् ।
सतां हि स प्रियो भवति असतां भवत्यप्रियः ॥ २॥ )
अनुवाद—(जो) सदुपदेश देता है, अनुशासन करता है, नीच कर्म-
से निवारण करता है, वह सत्पुरुषोंको प्रिय होता है, और
असत्पुरुषोंको अप्रिय ।
जेतवन छन्न (थेर)
७८-न भजे पापके मित्ते न भजे पुरिसाधमे ।
भजेथ मित्ते कल्याणे भजेथ पुरिसुत्तमे ॥ ३ ॥
(न भजेत् पापानि मित्राणि न भजेत् पुरुषाधमान् ।
भजेत् मित्राणि कल्याणानि भजेत् पुरुषानुत्तमान् ॥३॥
अनुवाद—दुष्ट मित्रोंका सेवन न करे, न अधम पुरुषोंका सेवन करे ।
अच्छे मित्रोंका सेवन करे, उत्तम पुरुषोंका सेवन करे ।
जेतवन महाकप्पिन (थेर)
७६-धम्मपीती सुखं सेति विप्पसन्नेन चेतसा ।
अरियप्पवेदिते धम्मे सदा रमति पण्डितो ॥ ४ ॥
(धर्मपीतीः सुखं शेते विप्रसन्नेन चेतसा ।
आर्यप्रवेदिते धर्मे सदा रमते पंडितः ॥४॥ )
अनुवाद—धर्म(-रस) का पान करनेवाला प्रसन्न-चित्तहो सुखपूर्वक
सोता है; पंडित (जन) आर्योंके बतलाये धर्ममें सदा रमण
करते हैं ।

६।७ ] पण्डितवग्गो [ ३७
जेतवन पण्डित सामणेर
८०--उदकं हि नयन्ति नेत्तिका
उसुकारा नमयन्ति तेजनं ।
दारुं नमयन्ति तच्छका
अत्तानं दमयन्ति पण्डिता ॥५॥
( उदकं हि नयन्ति नेतृका इषुकारा नमयन्ति तेजनम् ।
दारु नमयन्ति, तक्षका आत्मानं दमयन्ति पण्डिताः ॥५॥ )
अनुवाद—नहरवाले पानीको लेजाते हैं, बाण बनानेवाले बाणको ठीक
करते हैं, बढ़ई लकड़ीको ठीक करते हैं; और पंडित ( जन )
अपना दमन करते हैं ।
जेतवन भद्दिय ( थेर )
८१-सेलो यथा एकघनो वातेन न समीरति ।
एवं निन्दापसंसासु न समिञ्जन्ति पण्डिता ॥६॥
( शैलो यथैकघनो वातेन न समीर्यते ।
एवं निन्दाप्रशंसासु न समीर्यन्ते पण्डिताः ॥६॥ )
अनुवाद—जैसे ठोस पहाड़ हवासे कंपायमान नहीं होता; ऐसे ही
पंडित निन्दा और प्रशंसासे विचलित नहीं होते ।
जेतवन काण-माता
८२-यथापि रहदो गम्भीरो विप्पसन्नो अनाविलो ।
एवं धम्मानि सुत्वान विप्पसीदन्ति पण्डिता ॥७॥

३८ ] धम्मपद [ ६।९
(यथापि ह्रदो गम्भीरो विप्रसन्नोऽनाविलः ।
एवं धर्मान् श्रुत्वा विप्रसीदन्ति पण्डिताः ॥७॥ )
अनुवाद—धर्मोंको सुनकर पण्डित ( जन ) अथाह, स्वच्छ, निर्मल
सरोवरकी भाँति स्वच्छ ( सन्तुष्ट ) होते हैं।
जेतवन पाँच सौ भिक्खु
८३—सब्बत वे सप्पुरिसा वजन्ति
न कामकामा लपयन्ति सन्तो ।
सुखेन फुट्ठा अथवा दुखेन
न उच्चावचं पण्डिता दस्सयन्ति ॥८॥
( सर्वत्र वै सत्पुरुषा व्रजन्ति न कामकामा लपन्ति सन्तः ।
सुखेन स्पृष्टा अथवा दुःखेन नोच्चावचं पण्डिता दर्शयन्ति॥८॥
अनुवाद—सत्पुरुष सभी जगह जाते हैं, ( वह ) भोगोंके लिए बात
नहीं चलाते; सुख मिले या दुःख, पण्डित (जन ) विकार
नहीं प्रदर्शन करते ।
जेतवन धम्मिक ( थेर )
८४—न अत्तहेतू न परस्स हेतु
न पुत्तमिच्छे न धनं न रट्ठं ।
न इच्छेय्य अधम्मेन समिद्धिमत्तनो
सीलवा पञ्ञवा धम्मिको सिया ॥६॥

६।११ ] पण्डितवग्गो [ ३९
( नात्महेतोः न परस्य हेतोः
न पुत्रमिच्छेत् न धनं न राष्ट्रम् ।
नेच्छेद् अधर्मेण समृद्धिमात्मनः
स शीलवान् प्रज्ञावान् धार्मिकः स्यात् ॥९॥ )
अनुवाद—जो अपने लिए या दूसरेके लिये पुत्र, धन, और राज्य
नहीं चाहते, न अधर्मसे अपनी उन्नति चाहते हैं; वही
सदाचारी ( शीलवान् ) प्रज्ञावान और धार्मिक हैं ।
जेतवन धर्मश्रवण
८५—अप्पका ते मनुस्सेसु ये जना पारगामिनो ।
अथायं इतरा पजा तीरमेवानुधावति ॥१०॥
( अल्पकास्ते मनुष्येषु ये जनाः पारगामिनः ।
अथेमा इतराः प्रजाः तीरमेवानुधावति ॥१०॥ )
८६—ये च खो सम्मदक्खाते धम्मे धम्मानुवत्तिनो ।
ते जना पारमेस्सन्ति मच्चुधेय्यं सुदुत्तरं ॥११॥
( ये च खलु सम्यगाख्याते धर्मे धर्मानुवर्तिनः ।
ते जनाः पारमेष्यन्ति मृत्युधेयं सुदुस्तरम् ॥११॥ )
अनुवाद—मनुष्योंमें पार जानेवाले जन विरले ही हैं, यह दूसरे
लोग तो तीरे ही तीरे दौड़नेवाले हैं। जो सुव्याख्यात धर्म-
का अनुगमन करते हैं, वह मृत्युगृहीत अतिदुस्तर (संसार-
सागर) को पार करेंगे।

५. बालवग्गो (बाल वर्ग)

४० ] धम्मपदं [ ६।१४ '
जेतवन पाँच सौ नवागत भिक्षु
८७-काण्हं धम्मं विप्पहाय सुक्कं भावेथ पण्डितो ।
ओका अनोकं आगम्म विवेके यत्थ दूरमं ॥१२॥
( कृष्णं धर्मं विप्रहाय शुक्लं भावयेत् पण्डितः ।
ओकात् अनोकं आगम्य विवेके यत्र दूरमम् ॥१२॥)
८८-तत्रामिरतिमिच्छेय्य हित्वा कामे अकिञ्चनो ।
परियोदपेय्य अत्तानं चित्तक्लेसेहि पण्डितो ॥१३॥
( तत्राभिरतिमिच्छेत् हित्वा कामान् अकिंचनः ।
पर्य्यवदापयेत् आत्मानं चित्तक्लेशैः पण्डितः ॥१३॥)
अनुवाद—काले धर्म (=पाप )को छोडकर, पण्डित (जन ) शुक्ल
(-धर्म ) का आचरण करें। घरसे बेघर हो दूर जा विवेक
( =एकान्त ) का सेवन करें। भोगोको छोड़, सर्वस्वत्यागी
हो वहीं रत रहनेकी इच्छा करें। पण्डित (जन ) चित्त-
के मलोंसे अपनेको परिशुद्ध करें।
८९-येसं सम्बोधि-अङ्गेसु सम्मा चित्तं सुभावितं ।
आदान-पटिनिस्सग्गे अनुपदाय ये रता ।
खीणासवा जुतीमन्तो ते लोके परिनिब्बुता ॥१४॥
( येषां सम्बोध्यंगेषु सम्यक् चित्तं सुभावितम् ।
आदानप्रतिनिःसर्गे अनुपदाय ये रताः ।
क्षीणास्रवा ज्योतिष्मन्तस्ते लोके परिनिर्वृताः ॥१४॥)
अनुवाद—सम्बोधि(=परम ज्ञान )के अंगों(=संयोध्यंगो )में जिनका
चित्त भली प्रकार परिभावित (=संस्कृत, ) हो गया है;

६।१४ ] पण्डितवग्गो [ ४१
जो परिग्रहके परित्यागपूर्वक अपरिग्रहमें रत हैं। ऐसे,
चित्तके मलोंसे निर्मुक्त (=क्षीणास्रव ), द्युतिमान् ( पुरुष )
लोकमें निर्वाणको प्राप्त हो गये हैं।
६-पण्डितवर्ग समाप्त

७—अरहन्तवग्गो
राजगह ( जीवकका आम्रवन ) जीवक
९०-गतद्धिनो विसोकस्स विप्पमुत्तस्स सब्बधि ।
सब्बगन्थप्पहीणस्स परिळाहो न विज्जति ॥१॥
( गताध्वनो विशोकस्य विप्रमुक्तस्य सर्वथा ।
सर्वग्रन्थप्रहीणस्य परिदाहो न विद्यते ॥१॥)
अनुवाद—जिसका मार्ग(-गमन ) समाप्त हो चुका है, जो शोक-
रहित तथा सर्वथा मुक्त है; जिसकी सभी ग्रंथियाँ क्षीण हो
गई हैं ; उसके लिये सन्ताप नहीं है ।
राजगह ( वेणुवन ) महाकस्सप
६१-उय्युञ्जन्ति सतीमन्तो न निकेते रमन्ति ते ।
हंसा 'व पल्ललं हित्वा ओकमोकं जहन्ति ते ॥२॥
( उद्युञ्जते स्मृतिमन्तो न निकेते रमन्ते ते ।
हंसा इव पल्वलं हित्वा ओकमोकं जहति ते ॥२॥)
७२ ]

७४ ] अरहन्तवग्गो [ ४३
अनुवाद—सचेत हो वह उद्योग करते हैं, (गृह-)सुख में रमण
नहीं करते, हंस जैसे क्षुद्र जलाशयको छोड़कर चले जाते
हैं, (वैसे ही यह अर्हद् ) गृहको छोड़ जाते हैं।
जेतवन बेलट्ठि सीस
६२–येसं सन्निचयो नत्थि ये परिञ्ञातभोजना ।
सुञ्ञतो अनिमित्तो च विमोक्खो यस्स गोचरो ।
आकासे 'व सकुन्तानं गति तेसं दुरन्नया ॥३॥
( येषां सञ्चियो नास्ति ये परिज्ञातभोजनाः ।
शून्यताऽनिमित्तश्च विमोक्षो यस्य गोचरः ।
आकाश इव शकुन्तानां गतिः तेषां दुरन्वया ॥३॥)
अनुवाद—जो (वस्तुओका) सचय नहीं करते, जिनका भोजन
नियत है, शून्यता-स्वरूप तथा कारण-रहित मोक्ष (=निर्वाण)
जिनको दिखाई पडता है; उनकी गति (=गन्तव्य स्थान)
आकाशमें पक्षियोकी (गतिकी) भांति अज्ञेय है ।
राजगृह (वेणुवन) अनुरुद्ध (थेर)
६३-यस्सा'सवा परिक्खीणा आहारे च अनिस्सितो ।
सुञ्ञतो अनिमित्तो च विमोक्खो यस्स गोचरो ।
आकासे 'व सकुन्तानं पदं तस्स दुरन्नयं ॥४॥
( यस्यास्रवाः परिक्षीणा आहारे च अनिःसृतः ।
शून्यताऽनिमित्तश्च विमोक्षो यस्य गोचरः ।
आकाश इव शकुन्तानां पदं तस्य दुरन्वयम् ॥४॥)

४४ ] धम्मपद [ ७।६
अनुवाद—जिसके आस्रव (=मल) क्षीण हो गये, जो आहारमें पर-
तंत्र नहीं, जो शून्यता रूप० ।
श्रावस्ती (पूर्वाराम) महाकच्चायन
६४-यस्सिन्द्रियाणि समथं गतानि,
अस्सा यथा सारथिना सुदन्ता ।
पहीनमानस्स अनासवस्स,
देवापि तस्स पिहयन्ति तादिनो ॥५॥
( यस्येन्द्रियाणि शमतां गतानि
अश्वा यथा सारथिना सुदान्ताः ।
प्रहीणमानस्य अनास्रवस्य देवा
अपि तस्य स्पृहयन्ति तादृशः ॥५॥ )
अनुवाद—सारथीद्वारा सुदान्त (=सुशिक्षित ) अश्वोंकी भाँति
जिसकी इन्द्रियाँ शान्त हैं, जिसका अभिमान नष्ट हो गया,
( और ) जो आस्रवरहित है, ऐसे उस ( पुरुष ) की देवता
भी स्पृहा करते हैं ।
जेतवन सारिपुत्त (थेर)
६५-पठवीसमो नो विरुज्झति
इन्दखीलूपमो तादि सुव्वतो ।
रहदो 'व अपेतकद्दमो
संसारा न भवन्ति तादिनो ॥६॥

७८ ] अरहन्तवग्गो [ ४५
( पृथिवीसमो न विरुध्यते इन्द्रकीलोपमस्तादृक् सुव्रतः ।
ह्रद इवापेतकर्दमः संसारा न भवन्ति तादृशः ॥६॥ )
अनुवाद—वैसा सुन्दर व्रतधारी इन्द्रकीलके समान ( अचल ) तथा
पृथिवीके समान जो क्षुब्ध नहीं होता; ऐसे ( पुरुष ) में
कर्दमरहित सरोवरकी भाँति संसार (-मल ) नहीं
रहता ।
जेतवन कोसम्बियासित तिस्स (थेर )
६६—सन्तं तस्स मनं होति सन्ता वाचा च कम्मञ्च ।
सम्मदञ्ञाविमुत्तस्स उपसन्तस्स तादिनो ॥७॥
( शान्तं तस्य मनो भवति शान्ता वाक् च कर्म च ।
सम्यगाज्ञाविमुक्तस्य उपशान्तस्य तादृशः ॥ ७ ॥ )
अनुवाद—उपशान्त और यथार्थ ज्ञानद्वारा मुक्त हुये उस ( अहत्
पुरुष ) का मन शान्त होता है, वाणी और कर्म शान्त
होते हैं ।
जेतवन सारिपुत्र (थेर )
६७—अस्सद्धो अकतञ्ञू च सन्धिच्छेदो च यो नरो ।
हतावकासो वन्तासो स वे उत्तमपोरिसो ॥८॥
( अश्रद्धोऽकृतज्ञश्च सन्धिच्छेदश्च यो नरः ।
हतावकाशो वान्ताशः स वै उत्तम पुरुषः ॥ ८ ॥ )
अनुवाद—जो ( मूढ-) श्रद्धारहित, अकृत (=बिना बनाये=निर्वाण )-
ज्ञ, ( संसारकी ) संधिका छेदन करनेवाला, अवकाशरहित,