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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

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पृष्ठ 56

७८ ] अरहन्तवग्गो [ ४५
( पृथिवीसमो न विरुध्यते इन्द्रकीलोपमस्तादृक् सुव्रतः ।
ह्रद इवापेतकर्दमः संसारा न भवन्ति तादृशः ॥६॥ )
अनुवाद—वैसा सुन्दर व्रतधारी इन्द्रकीलके समान ( अचल ) तथा
पृथिवीके समान जो क्षुब्ध नहीं होता; ऐसे ( पुरुष ) में
कर्दमरहित सरोवरकी भाँति संसार (-मल ) नहीं
रहता ।
जेतवन कोसम्बियासित तिस्स (थेर )
६६—सन्तं तस्स मनं होति सन्ता वाचा च कम्मञ्च ।
सम्मदञ्ञाविमुत्तस्स उपसन्तस्स तादिनो ॥७॥
( शान्तं तस्य मनो भवति शान्ता वाक् च कर्म च ।
सम्यगाज्ञाविमुक्तस्य उपशान्तस्य तादृशः ॥ ७ ॥ )
अनुवाद—उपशान्त और यथार्थ ज्ञानद्वारा मुक्त हुये उस ( अहत्
पुरुष ) का मन शान्त होता है, वाणी और कर्म शान्त
होते हैं ।
जेतवन सारिपुत्र (थेर )
६७—अस्सद्धो अकतञ्ञू च सन्धिच्छेदो च यो नरो ।
हतावकासो वन्तासो स वे उत्तमपोरिसो ॥८॥
( अश्रद्धोऽकृतज्ञश्च सन्धिच्छेदश्च यो नरः ।
हतावकाशो वान्ताशः स वै उत्तम पुरुषः ॥ ८ ॥ )
अनुवाद—जो ( मूढ-) श्रद्धारहित, अकृत (=बिना बनाये=निर्वाण )-
ज्ञ, ( संसारकी ) संधिका छेदन करनेवाला, अवकाशरहित,