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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

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पृष्ठ 43

५२ ] धम्मपदं [ ५।१२
( मध्विव मन्यते बालो यावत् पापं न पच्यते ।
यदा च पच्यते पापं अथ दुःखं निगच्छति ॥१०॥ )
अनुवाद—अज्ञ ( जन ) जब तक पापका परिपाक नहीं होता, तब
तक उसे मधुके समान जानता है। जब पापका परिपाक
होता है, तो दुखी होता है।
राजगृह ( वेणुवन ) जम्बुक ( आजीवक साधु )
७०-मासे मासे कुसग्गेन बालो भुञ्जेथ भोजनं ।
न सो संखतधम्मानं कलं अग्घति सोळसिं ॥११॥
( मासे मासे कुशाग्रेण बालो भुंजीत भोजनम् ।
न स संख्यातधर्माणां कलामर्हति षोडशीम् ॥११॥)
अनुवाद—यदि अज्ञ ( पुरुष ) कुशकी नोकसे महीने महीनेपर
खाना खाये, तो भी धर्मके जानकारोके सोलहवें भागके
भी बराबर ( वह तप ) नहीं हो सकता ।
राजगृह ( वेणुवन ) अहिपेत
७१-न हि पापं कतं कम्मं सञ्जु खीरं 'व मुच्चति ।
डहन्तं बालमन्वेति भस्माच्छन्नो 'व पावको ॥१२॥
( नहि पापं कृतं कर्म सद्यः क्षीरमिव मुंचति ।
दहन् बालमन्वेति भस्माच्छन्न इव पावकः ॥१२॥)
अनुवाद—ताजे दूधकी भाँति किया पाप कर्म, ( तुरन्त ) विकार
नहीं लाता, वह भस्मसे ढँकी आगकी भाँति दग्ध करता
अज्ञजनका पीछा करता है।