धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६ ] धम्मपदं [ ६।४
(अववदेदनुशिष्याद् असभ्याच्च निवारयेत् ।
सतां हि स प्रियो भवति असतां भवत्यप्रियः ॥ २॥ )
अनुवाद—(जो) सदुपदेश देता है, अनुशासन करता है, नीच कर्म-
से निवारण करता है, वह सत्पुरुषोंको प्रिय होता है, और
असत्पुरुषोंको अप्रिय ।
जेतवन छन्न (थेर)
७८-न भजे पापके मित्ते न भजे पुरिसाधमे ।
भजेथ मित्ते कल्याणे भजेथ पुरिसुत्तमे ॥ ३ ॥
(न भजेत् पापानि मित्राणि न भजेत् पुरुषाधमान् ।
भजेत् मित्राणि कल्याणानि भजेत् पुरुषानुत्तमान् ॥३॥
अनुवाद—दुष्ट मित्रोंका सेवन न करे, न अधम पुरुषोंका सेवन करे ।
अच्छे मित्रोंका सेवन करे, उत्तम पुरुषोंका सेवन करे ।
जेतवन महाकप्पिन (थेर)
७६-धम्मपीती सुखं सेति विप्पसन्नेन चेतसा ।
अरियप्पवेदिते धम्मे सदा रमति पण्डितो ॥ ४ ॥
(धर्मपीतीः सुखं शेते विप्रसन्नेन चेतसा ।
आर्यप्रवेदिते धर्मे सदा रमते पंडितः ॥४॥ )
अनुवाद—धर्म(-रस) का पान करनेवाला प्रसन्न-चित्तहो सुखपूर्वक
सोता है; पंडित (जन) आर्योंके बतलाये धर्ममें सदा रमण
करते हैं ।