धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४ ] धम्मपदं [ ५।१६
( चाहता है ), मठो ( और निवासो ) में स्वामीपन
(=ऐश्वर्य ) और दूसरे कुलोंमें पूजा ( चाहता है )। गृहस्त
और संन्यासी दोनो मेरे ही कियेको मानें, किसी भी कृत्य-
अकृत्यमे मेरे ही वशवर्ती हो—ऐसा मूढ़का सकल्प होता
है, ( जिससे उसकी ) इच्छा और अभिमान बढ़ते हैं ।
श्रावस्ती ( जेतवन ) ( बनवासी ) तिस्स ( थेर )
७५-अञ्ञा हि लाभूपनिसा अञ्ञा निब्बान-गामिनी ।
एवमेतं अभिञ्ञाय भिक्खू बुद्धस्स सावको ॥
सकारं नाभिनन्देय्य विवेकमनुब्रूहये ॥ १६ ॥
( अन्या हि लाभोपनिषद् अन्या निर्वाणगामिनी ।
एवमेतद् अभिज्ञाय भिक्षुर्बुद्धस्य श्रावकः ।
सत्कारं नाभिनन्देत् विवेकमनुबृंहयेत् ॥१६॥)
अनुवाद—लाभका रास्ता दूसरा है, और निर्वाणको लेजानेवाला
दूसरा—इस प्रकार इसे जानकर बुद्धका अनुगामी भिक्षु
'सत्कारका अभिनन्दन न करे, और विवेक (=एकान्तचर्या)
को बढ़ावे ।
५—बालवर्ग समाप्त