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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1
दादू कहै, सो गुरु किस काम का, गहि भ्रमावै आन।
तत्त बतावै निर्मला, सो गुरु साध सुजान ॥ 121 ॥
तूं मेरा, हूं तेरा, गुरु सिष किया मंत।
दोनों भूले जात हैं, दादू बिसऱ्या कंत ॥ 122 ॥
दुहि दुहि पीवै ग्वाल गुरु, सिष है छेली गाइ।
यह औसर योंही गया, दादू कहि समझाइ ॥ 123 ॥
शिष गोरु, गुरु ग्वाल है, रक्षा कर कर लेइ ।
दादू राखै जतन कर, आनि धणी को देय ॥ 124 ॥
झूठे अंधे गुरु घणे, भरम दिढ़ावैं आइ।
दादू साचा गुरु मिलै, जीव ब्रह्म है जाइ ॥ 125 ॥
झूठे अंधे गुरु घणे, बँधे विषय विकार ।
दादू साचा गुरु मिल्या, सन्मुख सिरजनहार ॥ 126 ॥
झूठे अंधे गुरु घणे, भरम दिढ़ावैं काम।
बँधे माया मोह सौं, दादू मुख सौं राम ॥ 127 ॥
झूठे अँधे गुरु घणे, भटकैं घर घर बार।
कारज को सीझै नहीं, दादू माथै मार ॥ 128 ॥
बेखर्च व्यवसनी
दादू भक्त कहावैं आपको, भक्ति न जानैं भेव।
सुपनै ही समझैं नहीं, कहाँ बसै गुरुदेव ॥ 129 ॥
भ्रम विध्वंस
भ्रम कर्म जग बंधिया, पंडित दिया भुलाइ।
दादू सतगुरु ना मिले, मारग देइ दिखाइ ॥ 130 ॥
दादू पंथ बतावैं पाप का, भ्रम कर्म विश्वास।
निकट निरंजन जे रहै, क्यों न बतावैं तास ॥ 131 ॥

  • 37 -

श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1
विचार
दादू आपा उरझे उरझिया, दीसे सब संसार।
आपा सुरझे सुरझिया, यह गुरु ज्ञान विचार ॥ 132 ॥
गुरुमुख कसौटी
साधु अंग का निर्मला, तामें मल न समाइ।
परम गुरु प्रकट कहै, ताथैं दादू ताइ ॥ 133 ॥
सुमिरण नाम चितावणी
राम नाम गुरु सबद सौं, रे मन पेलि भरम।
निहकर्मी सौं मन मिल्या, दादू काटि करम ॥ 134 ॥
सूक्ष्म मार्ग
दादू बिन पाइन का पंथ, क्यों करि पहुँचे प्राण।
विकट घाट औघट खरे, मांहि शिखर असमान ॥ 135 ॥
मन ताजी चेतन चढै, ल्यौ की करै लगाम।
शब्द गुरु का ताजणां, कोइ पहुंचे साधु सुजाण ॥ 136 ॥
पारख लक्षण
साधौं सुमिरण सो कह्या, जिहि सुमिरण आपा भूल।
दादू गहि गंभीर गुरु, चेतन आनन्द मूल ॥ 137 ॥
स्वार्थी परमार्थी
दादू आप स्वारथ सब सगे, प्राण सनेही नांहि।
प्राण सनेही राम है, कै साधु कलि मांहि ॥ 138 ॥
सुख का साथी जगत सब, दुख का नाहीं कोइ।
दुख का साथी सांइयाँ, दादू सतगुरु होइ ॥ 139 ॥
सगे हमारे साध हैं, सिर पर सिरजनहार।
दादू सतगुरु सो सगा, दूजा धंध विकार ॥ 140 ॥

  • 38 -

श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1
दया निर्वैरता
दादू के दूजा नहीं, एकै आत्मराम।
सतगुर सिर पर साध सब, प्रेम भक्ति विश्राम ॥141॥
दादू सुध बुध आत्मा, सतगुरु परसे आइ।
दादू भृंगी कीट ज्यों, देखत ही ह्वै जाइ ॥142॥
दादू भृंगी कीट ज्यूं, सतगुरु सेती होइ।
आप सरीखे कर लिये, दूजा नाहीं कोइ ॥143॥
दादू कच्छब राखै दृष्टि में, कुँजों के मन माहिं।
सतगुरु राखै आपणां, दूजा कोई नाहिं ॥144॥
बच्चों के माता पिता, दूजा नाहीं कोइ ।
दादू निपजै भाव सूं, सतगुरु के घट होइ ॥145॥
सतगुरु बेपरवाही
एकै शब्द अनन्त शिष, जब सतगुरु बोले।
दादू जड़े कपाट सब, दे कूँची खोले ॥146॥
बिन ही किया होइ सब, सन्मुख सिरजनहार।
दादू करि करि को मरै, शिष शाखां शिर भार ॥147॥
सूरज सन्मुख आरसी, पावक किया प्रकास।
दादू सांई साधु बिच, सहजैं निपजै दास ॥148॥
मन इन्द्रिय निग्रह
दादू पंचों ये परमोधि ले, इन्हीं को उपदेश।
यहु मन अपणा हाथ कर, तो चेला सब देश ॥149॥
अमर भये गुरु ज्ञान सौं, केते इहि कलि माहिं।
दादू गुरू के ज्ञान बिन, केते मरि मरि जाहिं ॥150॥
औषध खाइ न पथ्य रहै, विषम व्याधि क्यों जाइ ।
दादू रोगी बावरा, दोष बैद को लाइ ॥151॥

  • 39 -

श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1
बैद बिथा कहै देखि करि, रोगी रहै रिसाइ।
मन मांहै लीये रहै, दादू व्याधि न जाइ ॥ 152 ॥
दादू बैद बिचारा क्या करै, रोगी रहै न साच।
खाटा मीठा चरपरा, मांगै मेरा वाच ॥ 153 ॥
गुरु उपदेश
दुर्लभ दर्शन साध का, दुर्लभ गुरु उपदेश ।
दुर्लभ करबा कठिन है, दुर्लभ परस अलेख ॥ 154 ॥
गुरु मन्त्र (गायत्री मन्त्र)
दादू अविचल मंत्र, अमर मंत्र, अखै मंत्र,
अभै मंत्र, राम मंत्र, निजसार ।
संजीवन मंत्र, सवीरज मंत्र, सुन्दर मंत्र,
शिरोमणि मंत्र, निर्मल मंत्र, निराकार ॥
अलख मंत्र, अकल मंत्र, अगाध मंत्र, अपार मंत्र, अनन्त मंत्र राया।
नूर मंत्र, तेज मंत्र, ज्योति मंत्र, प्रकाश मंत्र, परम मंत्र, पाया ॥
उपदेश दीक्षा दादू गुरु राया ॥ 155 ॥
दादू सब ही गुरु किए, पशु पंखी बनराइ।
तीन लोक गुण पंच सौं, सबही मांहिं खुद आइ ॥ 156 ॥
जे पहली सतगुरु कह्या, सो नैनहुँ देख्या आइ।
अरस परस मिलि एक रस, दादू रहे समाइ ॥ 157 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
प्रथमो श्री गुरुदेव का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 1 ॥ साखी 157 ॥

  • 40 -

स्मरण का अंग
अथ स्मरण का अंग-२
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ।। 1 ।।
एकै अक्षर पीव का, सोई सत्य करि जाण।
राम नाम सतगुरु कह्या, दादू सो परवाण ।। 2 ।।
पहली श्रवण द्वितीय रसना, तृतीय हिरदै गाइ।
चतुर्दशी चेतन भया, तब रोम रोम ल्यौ लाइ ।। 3 ।।
मन प्रबोध
दादू नीका नांव है, तीन लोक तत सार।
रात दिवस रटबो करो, रे मन इहै विचार ।। 4 ।।

  • 41 -

श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
दादू नीका नांव है, हरि हिरदै न बिसारि ।
मूरति मन मांहैं बसै, सांसैं सांस संभारि ॥ 5 ॥
सांसैं सांस संभालतां, इक दिन मिलि है आइ ।
सुमिरण पैंडा सहज का, सतगुरु दिया बताइ ॥ 6 ॥
दादू नीका नांव है, सौ तू हिरदय राखि ।
पाखंड प्रपंच दूर करि, सुन साधुजन की साखि ॥ 7 ॥
दादू नीका नांव है, आप कहै समझाइ ।
और आरम्भ सब छाड़ दे, राम नाम ल्यौ लाइ ॥ 8 ॥
राम भजन का सोच क्या, करता होइ सो होइ ।
दादू राम संभालिये, फिर बुझिये न कोइ ॥ 9 ॥
नाम चेतावनी
राम तुम्हारे नांव बिन, जे मुख निकसै और ।
तो इस अपराधी जीव को, तीन लोक कित ठौर ॥ 10 ॥
छिन-छिन राम संभालतां, जे जीव जाइ तो जाय ।
आतम के आधार को, नाहीं आन उपाय ॥ 11 ॥
स्मरण माहात्म्य
एक मुहूर्त्त मन रहै, नांव निरंजन पास ।
दादू तब ही देखतां, सकल कर्म का नास ॥ 12 ॥
सहजैं ही सब होइगा, गुण इन्द्रिय का नास ।
दादू राम संभालतां, कटैं कर्म के पास ॥ 13 ॥
स्मरण नाम चितावनी
राम नाम गुरु शब्द सों, रे मन पेलि भरम ।
निहकर्मी सौं मन मिल्या, दादू काट करम ॥ 14 ॥
एक राम के नाम बिन, जीव की जलन न जाइ ।
दादू केते पचि मुए, करि-करि बहुत उपाइ ॥ 15 ॥

  • 42 -

श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
दादू एक राम ही टेक गहि, दूजा सहज सुभाइ ।
राम नाम छाडै नहीं, दूजा आवै जाइ ॥ 16 ॥
दादू राम अगाध है, परिमित नाहीं पार ।
अवर्ण वर्ण न जाणिये, दादू नाम अधार ॥ 17 ॥
दादू राम अगाध है, अविगत लखै न कोइ ।
निर्गुण सगुण का कहै, नाम विलम्ब न होइ ॥ 18 ॥
दादू राम अगाध है, बेहद लख्या न जाइ ।
आदि अंत नहि जाणिये, नाम निरन्तर गाइ ॥ 19 ॥
अद्वैत ब्रह्म
दादू राम अगाध है, अकल अगोचर एक।
दादू राम विलम्बिए, साधू कहैं अनेक ॥ 20 ॥
दादू एकै अलह राम है, समर्थ सांई सोइ ।
मैदे के पकवान सब, खातां होइ सु होइ ॥ 21 ॥
निर्गुण सगुण विवाद की निवृत्ति
सगुण निर्गुण ह्वै रहै, जैसा है तैसा लीन ।
हरि सुमिरण ल्यौ लाइए, का जाणों का कीन ॥ 22 ॥
नाम चित्त आवै सो लेय
दादू सिरजनहार के, केते नाम अनन्त ।
चित आवै सो लीजिये, यों साधु सुमरैं संत ॥ 23 ॥
दादू जिन प्राण पिण्ड हमकौ दिया, अंतर सेवैं ताहि ।
जे आवै ओसण सिर, सोई नांव संवाहि ॥ 24 ॥
चितावणी
दादू ऐसा कौण अभागिया, कछु दिढावै और ।
नाम बिना पग धरन को, कहो कहाँ है ठौर ॥ 25 ॥

  • 43 -

श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
सुमिरण नाम महिमा
दादू निमिष न न्यारा कीजिये, अंतर थैं उर नाम।
कोटि पतित पावन भये, केवल कहतां राम ॥ 26 ॥
मन प्रबोध
दादू जे तैं अब जाण्या नहीं, राम नाम निज सार।
फिर पीछै पछिताहिगा, रे मन मूढ गँवार ॥ 27 ॥
दादू राम संभाल ले, जब लग सुखी सरीर।
फिरि पीछै पछिताहिगा, जब तन मन धरै न धीर ॥ 28 ॥
दुख दरिया संसार है, सुख का सागर राम।
सुख सागर चलि जाइए, दादू तज बेकाम ॥ 29 ॥
दादू दरिया यहु संसार है, तामें राम नाम निज नाव।
दादू ढील न कीजिये, यहु औसर यहु डाव ॥ 30 ॥
स्मरण नाम निःसंशय
मेरा संसा को नहीं, जीवण मरण का राम।
सुपिनैं ही जनि बीसरै, मुख हिरदै हरि नाम ॥ 31 ॥
स्मरण नाम विरह
दादू दुखिया तब लगै, जब लग नाम न लेहि।
तब ही पावन परम सुख, मेरी जीवनि येहि ॥ 32 ॥
स्मरण नाम पारख लक्षण
कछु न कहावे आप को, सांई को सेवे।
दादू दूजा छाड़ि सब, नाम निज लेवे ॥ 33 ॥
नाम स्मरण से जीवों के संशय की निवृत्ति
जे चित्त चहुँटै राम सौं, सुमिरण मन लागै।
दादू आत्मा जीव का, संसा सब भागै ॥ 34 ॥
स्मरण नाम चितावणी
दादू पीव का नाम ले, तो मिटै सिर साल।
घड़ी मुहूरत चालनां, कैसी आवै काल ॥ 35 ॥

  • 44 -

श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
स्मरण बिना सांस न ले
दादू औसर जीव तैं, कह्या न केवल राम ।
अंत काल हम कहेंगे, जम बैरी सौं काम ॥ 36 ॥
दादू ऐसे महँगे मोल का, एक सांस जे जाइ ।
चौदह लोक समान सो, काहे रेत मिलाइ ॥ 37 ॥
अमूल्य श्वास
सोई सांस सुजाण नर, सांईं सेती लाइ ।
कर साटा सिरजनहार सौं, महँगे मोल बिकाइ ॥ 38 ॥
व्यर्थ जीवन
जतन करै नहीं जीव का, तन मन पवना फेर।
दादू महँगे मोल का, द्वै दोवटी इक सेर ॥ 39 ॥
सफल जीवन
दादू रावत राजा राम का, कदे न बिसारै नांव ।
आत्मराम संभालिये, तो सुबस काया गांव ॥ 40 ॥
स्मरण चितावणी
दादू अहर्निशि सदा शरीर में, हरि चिंतत दिन जाइ ।
प्रेम मगनलै लीन मन, अन्तरगति ल्यौ लाइ ॥ 41 ॥
निमिष एक न्यारा नहीं, तन मन मंझि समाइ ।
एक अंगि लागा रहै, ताको काल न खाइ ॥ 42 ॥
दादू पिंजर पिंड शरीर का, सुवटा सहज समाइ ।
रमता सेती रमि रहै, विमल विमल जस गाइ ॥ 43 ॥
अविनाशी सौं एक ह्रै, निमिष न इत उत जाइ ।
बहुत बिलाई क्या करै, जे हरि हरि शब्द सुणाइ ॥ 44 ॥
दादू जहाँ रहूँ तहँ राम सौं, भावै कंदलि जाइ ।
भावै गिरि परवत रहूँ, भावै गृह बसाइ ॥ 45 ॥

  • 45 -

श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
मन परमोध
दादू राम कहे सब रहत है, नखसिख सकल सरीर।
राम कहे बिन जात है, समझि मनवां वीर ॥ 47 ॥
दादू राम कहै सब रहत है, लाहा मूल सहेत ।
राम कहे बिन जात है, मूरख मनवां चेत ॥ 48 ॥
दादू राम कहे सब रहत है, आदि अंति लौं सोइ।
राम कहे बिन जात है, यहु मन बहुरि न होइ ॥ 49 ॥
दादू राम कहे सब रहत है, जीव ब्रह्म की लार ।
राम कहे बिन जात है, रे मन हो होशियार ॥ 50 ॥
परमार्थी
हरि भज साफिल जीवना, पर उपकार समाइ।
दादू मरणा तहाँ भला, जहाँ पशु पंखी खाइ ॥ 51 ॥
स्मरण
दादू राम शब्द मुख ले रहै, पीछे लगा जाइ।
मनसा वाचा कर्मना, तिहि तत सहज समाइ ॥ 52 ॥
अब 'तिही तत्त' में समाने की विधि का वर्णन
दादू रचि मचि लागे नाम सौं, राते माते होइ।
देखेंगे दीदार को, सुख पावेंगे सोइ ॥ 53 ॥
चेतावनी
दादू सांई सेवैं सब भले, बुरा न कहिये कोइ ।
सारों मांही सो बुरा, जिस घटि नाम न होइ ॥ 54 ॥
ईश्वर विमुख प्राणी की दुर्गति
दादू जियरा राम बिन, दुखिया इहि संसार ।
उपजै विनसै खप मरै, सुख दुख बारम्बार ॥ 55 ॥
स्मरण नाम महिमा माहात्मय
राम नाम रुचि उपजै, लेवे हित चित लाइ।
दादू सोई जीयरा, काहे जमपुरि जाइ ॥ 56 ॥

  • 46 -

श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
दादू नीकी बरियां आय कर, राम जप लीन्हां ।
आत्म साधन सोधि कर, कारज भल कीन्हां ।। 57 ।।
दादू अगम वस्तु पानैं पड़ी, राखि मंझि छिपाइ ।
छिन छिन सोई संभालिए, मत वै बीसर जाइ ।। 58 ।।
स्मरण नाम महिमा माहात्म्य
दादू उज्जवल निर्मला, हरि रंग राता होइ ।
काहे दादू पचि मरै, पानी सेती धोइ ।। 59 ।।
शरीर सरोवर राम जल, माहीं संजम सार ।
दादू सहजैं सब गए, मन के मैल विकार ।। 60 ।।
दादू रामनाम जलं कृत्वां, स्नानं सदा जितः।
तन मन आत्म निर्मलं, पंच-भू पापं गतः ।। 61 ।।
दादू उत्तम इन्द्री निग्रहं, मुच्यते माया मनः।
परम पुरुष पुरातनं, चिंतते सदा तन ।। 62 ।।
दादू सब जग विष भय्या, निर्विष बिरला कोइ ।
सोई निर्विष होइगा, जाके नाम निरंजन होइ ।। 63 ।।
दादू निर्विष नाम सौं, तन मन सहजैं होइ ।
राम निरोगा करेगा, दूजा नांही कोइ ।। 64 ।।
ब्रह्म भक्ति जब उपजै, तब माया भक्ति बिलाइ ।
दादू निर्मल मल गया, ज्यूँ रवि तिमिर नसाइ ।। 65 ।।
मनहर भाँवरि
दादू विषय विकार सौं, जब लग मन राता ।
तब लग चित्त न आवई, त्रिभुवनपति दाता ।। 66 ।।
विरह जिज्ञासा
दादू क्या जाणों कब होइगा, हरि सुमिरण इक तार ।
क्या जाणों कब छाड़ि है, यहु मन विषै विकार ।। 67 ।।

  • 47 -

श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
है सो सुमिरण होत नहीं, नहीं सो कीजै काम ।
दादू यहु तन यूँ गया, क्यूँ कर पड्ये राम ॥ 68 ॥
स्मरण नाम महिमा माहात्म्य
दादू राम नाम निज मोहनी, जिन मोहे करतार ।
सुर नर शंकर मुनि जना, ब्रह्मा सृष्टि विचार ॥ 69 ॥
दादू राम नाम निज औषधि, काटै कोटि विकार ।
विषम व्याधि थैं ऊबरै, काया कंचन सार ॥ 70 ॥
दादू निर्विकार निज नांव ले, जीवन इहै उपाय ।
दादू कृत्रिम काल है, ताके निकट न जाय ॥ 71 ॥
स्मरण
मन पवना गहि सुरति सौं, दादू पावै स्वाद ।
सुमिरण माहिं सुख घणा, छाड़ि देहु बकवाद ॥ 72 ॥
माया प्रपंच का त्याग
नाम सपीड़ा लीजिए, प्रेम भगति गुण गाइ ।
दादू सुमिरण प्रीति सौं, हेत सहित ल्यौ लाइ ॥ 73 ॥
लय लगाने की विधि
प्राण कवल मुख राम कहि, मन पवना मुख राम ।
दादू सुरति मुख राम कहि, ब्रह्म शून्य निज ठाम ॥ 74 ॥
दादू कहतां सुणातां राम कह, लेतां देतां राम ।
खातां पीतां राम कह, आत्म कवल विश्राम ॥ 75 ॥
ज्यूं जल पैसे दूध में, ज्यूं पाणी में लौण ।
ऐसे आत्माराम सौं, मन हठ साधै कौण ॥ 76 ॥
दादू राम नाम में पैस कर, राम नाम ल्यौ जाइ ।
यहु इंकत त्रिय लोक में, अनत काहे को जाइ ॥ 77 ॥

  • 48 -

श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
मध्य मार्ग
ना घर भला न वन भला, जहाँ नहीं निज नाँव।
दादू उनमनी मन रहै, भला तो सोई ठाँव ॥ 78 ॥
निर्गुण नाम महिमा महात्तम
दादू निर्गुणं नामं मई, हृदय भाव प्रवर्तितम्।
भ्रमं कर्म किल्विषं, माया मोहं कंपितम् ॥ 79 ॥
कालं जालं सोचितं, भयानक यम किंकरम्।
हर्षं मुदितं सदगुरुं, दादू अविगत दर्शनम् ॥ 80 ॥
भगवद् दर्शन का अनुपम माहात्म्य
दादू सब सुख स्वर्ग पयाल के, तोल तराजू बाहि।
हरि सुख एक पलक का, ता सम कह्या न जाहि ॥ 81 ॥
स्मरण नाम पारिख लक्षण
दादू राम नाम सब को कहै, कहिबे बहुत विवेक।
एक अनेकों फिर मिले, एक समाना एक ॥ 82 ॥
स्थूल रीति से राम-नाम स्मरण में भेद
दादू अपणी अपणी हद में, सब कोई लेवे नाउँ।
जे लागे बेहद सौं, तिन की मैं बलि जाउँ ॥ 83 ॥
स्मरण नाम अगाधता
कौण पटंतर दीजिये, दूजा नाहीं कोइ।
राम सरीखा राम है, सुमिऱ्यां ही सुख होइ ॥ 84 ॥
अपणी जाणै आप गति, और न जाणै कोइ।
सुमरि सुमरि रस पीजिये, दादू आनन्द होइ ॥ 85 ॥
करणी बिना कथणी
दादू सबही वेद पुराण पढ़ि, नेटि नाम निर्धार।
सब कुछ इन ही मांहि है, क्या करिये विस्तार ॥ 86 ॥

  • 49 -

श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
नाम अगाधता
पढ़ि पढ़ि थाके पंडिता, किनहुँ न पाया पार ।
कथि कथि थाके मुनिजना, दादू नाम आधार ॥ 87 ॥
निगम हि अगम विचारिये, तऊ पार न आवै ।
ताथैं सेवग क्या करै, सुमिरण ल्यौ लावै ॥ 88 ॥
कथनी बिना करणी
दादू अलिफ एक अल्लाह का, जे पढ़ि जाणै कोइ ।
कुरान कतेबां इल्म सब, पढकर पूरा होइ ॥ 89 ॥
दादू यहु तन पिंजरा, मांहीं मन सूवा ।
एक नाम अल्लाह का, पढ़ि हाफिज हूवा ॥ 90 ॥
स्मरण नाम पारख लक्षण
नाम लिया तब जानिए, जे तन मन रहै समाइ ।
आदि अंत मधि एक रस, कबहूँ भूल न जाइ ॥ 91 ॥
विरह पतिव्रत
दादू एकै दशा अनन्य की, दूजी दशा न जाइ ।
आपा भूलै आन सब, एकै रहै समाइ ॥ 92 ॥
दादू पीवै एक रस, बिसरि जाइ सब और ।
अविगत यहु गति कीजिये, मन राखो इहि ठौर ॥ 93 ॥
आत्म चेतन कीजिए, प्रेम रस पीवै ।
दादू भूलै देह गुण, ऐसैं जन जीवै ॥ 94 ॥
स्मरण नाम अगाधता
कहि कहि केते थाके दादू, सुणि सुणि कहु क्या लेइ ।
लौंण मिलै गलि पाणियां, ता सम चित यों देइ ॥ 95 ॥
दादू हरि रस पीवतां, रती विलम्ब न लाइ ।
बारम्बार संभालिये, मति वै बीसरि जाइ ॥ 96 ॥

  • 50 -

श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
स्मरण नाम विरह
दादू जगत सुपना है गया, चिंतामणि जब जाइ ।
तब ही साचा होत है, आदि अंत उर लाइ ॥ 97 ॥
नांव न आवै तब दुखी, आवै सुख संतोष ।
दादू सेवक राम का, दूजा हर्ष न शोक ॥ 98 ॥
मिले तो सब सुख पाइये, बिछुरे बहु दुःख होइ ।
दादू सुख दुःख राम का, दूजा नाहीं कोइ ॥ 99 ॥
दादू हरि का नाम जल, मैं मीन ता माहिं ।
संगि सदा आनन्द करै, बिछुरत ही मर जाहिं ॥ 100 ॥
दादू राम बिसार कर, जीवैं किहिं आधार ।
ज्यूं चातक जल बूँद को, करै पुकार पुकार ॥ 101 ॥
हम जीवैं इहि आसरे, सुमिरण के आधार ।
दादू छिटके हाथ थैं, तो हमको वार न पार ॥ 102 ॥
पतिव्रत निष्काम स्मरण
दादू नाम निमित रामहि भजै, भक्ति निमित भजि सोइ ।
सेवा निमित सांई भजै, सदा सजीवन होइ ॥ 103 ॥
नाम सम्पूर्णता
दादू राम रसाइन नित चवै, हरि है हीरा साथ ।
सो धन मेरे साइयां, अलख खजाना हाथ ॥ 104 ॥
हिरदै राम रहै जा जन के, ताको ऊरा कौण कहै ।
अठ सिधि, नौ निधि ताके आगे, सनमुख सदा रहै ॥ 105 ॥
वंदित तीनों लोक बापुरा, कैसे दर्श लहै ।
नाम निसान सकल जग ऊपर, दादू देखत है ॥ 106 ॥
दादू सब जग नीधना, धनवंता नहीं कोइ ।
सो धनवंता जाणिये, जाके राम पदार्थ होइ ॥ 107 ॥

  • 51 -

श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
संगहि लागा सब फिरै, राम नाम के साथ।
चिंतामणि हिरदै बसै, तो सकल पदार्थ हाथ ॥ 108 ॥
दादू आनन्द आत्मा, अविनाशी के साथ।
प्राणनाथ हिरदै बसै, तो सकल पदार्थ हाथ ॥ 109 ॥
पुरुष प्रकाशित
दादू भावै तहाँ छिपाइए, साच न छाना होइ।
शेष रसातल गगन धू, प्रगट कहिये सोइ ॥ 110 ॥
दादू कहाँ था नारद मुनिजना, कहाँ भक्त प्रहलाद।
परगट तीनों लोक में, सकल पुकारैं साध ॥ 111 ॥
दादू कहाँ शिव बैठा ध्यान धरै, कहाँ कबीरा नाम।
सो क्यों छाना होइगा, जेरु कहैगा राम ॥ 112 ॥
दादू कहाँ लीन शुकदेव था, कहाँ पीपा, रैदास।
दादू साचा क्यों छिपै, सकल लोक प्रकास ॥ 113 ॥
दादू कहाँ था, गोरख, भरथरी, अनंत सिधों का मंत।
परगट गोपीचन्द है, दत्त कहैं सब संत ॥ 114 ॥
अगम अगोचर राखिये, कर कर कोटि जतन।
दादू छाना क्यों रहै, जिस घट राम रतन ॥ 115 ॥
दादू स्वर्ग पयाल में, साचा लेवे नाम।
सकल लोक सिर देखिये, प्रकट सब ही ठाम ॥ 116 ॥
स्मरण लाम्बी रस
सुमिरण का शंसा रह्या, पछितावा मन मांहि।
दादू मीठा राम रस, सगला पिया नांहि ॥ 117 ॥
दादू जैसा नाम था, तैसा लीया नांहि।
हौंस रही यहु जीव में, पछितावा मन मांहि ॥ 118 ॥

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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
स्मरण नाम चितावणी
दादू सिर करवत बहै, बिसरे आत्म राम।
मांहि कलेजा काटिये, जीव नहीं विश्राम ॥ 119 ॥
दादू सिर करवत बहै, राम हिरदै थैं जाइ।
माँहि कलेजा काटिये, काल दसों दिसी खाइ ॥ 120 ॥
दादू सिर करवत बहै, अंग परस नहीं होइ।
मांहि कलेजा काटिये, यहु बिथा न जाणै कोइ ॥ 121 ॥
दादू सिर करवत बहै, नैनहूँ निरखै नांहि।
मांहि कलेजा काटिये, साल रह्या मन मांहि ॥ 122 ॥
नाम चिंतन के फलाफल का विवेचन
जेता पाप सब जग करै, तैता नाम बिसारे होइ।
दादू राम संभालिये, तो येता डारे धोइ ॥ 123 ॥
दादू जब ही राम बिसारिये, तब ही मोटी मार।
खंड खंड कर नाखिये, बीज पड़ै तिहिं बार ॥ 124 ॥
दादू जबही राम बिसारिये, तब ही झंपै काल।
सिर ऊपर करवत बहै, आइ पड़ै जम जाल ॥ 125 ॥
दादू जब ही राम बिसारिये, तब ही कंध बिनाश।
पग पग परलै पिंड पडै, प्राणीजाइ निराश ॥ 126 ॥
दादू जब ही राम बिसारिये, तब ही हाना होइ।
प्राण पिंड सर्वस गया, सुखी न देख्या कोइ ॥ 127 ॥
नाम सम्पूर्णता
साहिब जी के नांव में, बिरहा पीड़ पुकार।
ताला बेली रोवणा, दादू है दीदार ॥ 128 ॥
विरह जागृति स्मरण विधि
साहिब जी के नांव में, भाव भगति विश्वास।
लै समाधि लागा रहै, दादू सांई पास ॥ 129 ॥

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श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
साहिब जी के नांव में, मति बुधि ज्ञान विचार।
प्रेम प्रीति स्नेह सुख, दादू ज्योति अपार ॥ 130 ॥
साहिब जी के नांव में, सब कुछ भरे भंडार।
नूर तेज अनन्त है, दादू सिरजनहार ॥ 131 ॥
जिसमें सब कुछ सो लिया, निरंजन का नांउँ।
दादू हिरदै राखिए, मैं बलिहारी जाउँ ॥ 132 ॥
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य
द्वितीयो स्मरण का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 2 ॥ साखी 132 ॥
दादूराम
राम
सत्यराम

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विरह का अंग
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अथ विरह का अंग-३
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ।। 1 ।।
रतिवंती आरति करै, राम सनेही आव।
दादू औसर अब मिलै, यहु विरहनी का भाव ।। 2 ।।
विरहिनी की विरह दशा और उसका विलाप
पीव पुकारै विरहनी, निशदिन रहे उदास।
राम राम दादू कहै, ताला-बेली प्यास ।। 3 ।।

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श्री दादूवाणी-विरह का अंग 3
विरहीजनों की अनन्यता
मन चित चातक ज्यों रटै, पीव पीव लागी प्यास ।
दादू दर्शन कारणै, पुरवहु मेरी आस ॥ 4 ॥
दादू विरहनी दुख कासनि कहै, कासनि देइ संदेश ।
पंथ निहारत पीव का, विरहनी पलटे केश ॥ 5 ॥
दादू विरहनी दुख कासनि कहै, जानत है जगदीश ।
दादू निशदिन बिरही है, विरहा करवत शीश ॥ 6 ॥
शब्द तुम्हारा ऊजला, चिरिया क्यों कारी ?
तूँही, तूँही निशदिन करूँ, विरहा की जारी ॥ 7 ॥
विरह विलाप
विरहनी रोवै रात दिन, झूरै मन ही मांहिं ।
दादू औसर चल गया, प्रीतम पाये नाहिं ॥ 8 ॥
दादू विरहनी कुरलै कुंज ज्यूं, निशदिन तलफत जाइ ।
राम सनेही कारणै, रोवत रैन विहाइ ॥ 9 ॥
पासैं बैठा सब सुणै, हमकों जवाब न देइ ।
दादू तेरे सिर चढै, जीव हमारा लेइ ॥ 10 ॥
सबको सुखिया देखिये, दुखिया नाहीं कोइ ।
दुखिया दादू दास है, ऐन परस नहीं होइ ॥ 11 ॥
विरहीजनों के दुःख का कारण
साहिब मुख बोलै नहीं, सेवक फिरै उदास ।
यहु बेदन जिय में रहै, दुखिया दादू दास ॥ 12 ॥
पीव बिन पल पल जुग भया, कठिन दिवस क्यों जाइ ।
दादू दुखिया राम बिन, काल रूप सब खाइ ॥ 13 ॥
दादू इस संसार में, मुझसा दुखी न कोइ ।
पीव मिलन के कारणै, मैं जल भरिया रोइ ॥ 14 ॥

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