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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

श्री दादूवाणी-श्री दादूलीला विहंगावलोकन

और बोले - “जो हमारी वाणी का आश्रय लेकर निर्गुण भक्ति करेंगे, उनकी
परब्रह्म रक्षा करेंगे और जो इष्ट - भ्रष्ट होगा, उसे परम - पद नहीं मिलेगा
।” इसी कारण श्री महाराजजी के महाप्रयाण के बाद उनकी वाणी ही सबसे
अधिक पूज्यनीय सिद्ध हुई । आज भी दादू - सम्प्रदाय के सभी पूजन
स्थलोंमें श्रीवाणीजी का प्रमुख पूजन होता है । कहीं कहीं भक्तजनों ने अपनी
भावनानुसार चित्र भी प्रतिष्ठित किए हैं ।
निजस्वरूप में प्रवेश शनैः शनैः तपोमूर्ति श्री दादूदयालजी महाराज के
लीला संवरण का समय आ पहुँचा । परमज्योति से ज्योति का मिलन तो
अवश्यंभावी है । उस समय श्री महाराजजी नारायणा में विराजमान थे । संत
माधोदासजी के अनुसार -
बासुर होय समीप रहे दिन, आवत पालकी पंथ आकाशा ।
के शर चन्दन छाय सुगन्धित, ल्याय धरे सुर मंदिर पासा ।।
ज्येष्ठ कृष्ण सप्तमी वि. सं. 1660, उस दिन चार दिव्य पार्षद पुरुष पालकी
लिए हुए आकाश मार्ग से धरा पर उतरे । सभी शिष्यों ने, राजा
नारायणदासजी ने तथा उनकी प्रजा ने इस अदभुत दृश्य को देखा । सबने
महाराजजी से पालकी के आने का कारण पूछा तब उन्हों ने कहा
“कल करिहैं निज लोक प्रवेशा ”
दूसरे दिन परम पावन पुण्य तिथि अष्टमी को तीन बार आकाशवाणी द्वारा
महाराज श्री को पालकी में बिराजमान होने का निर्देश मिला । श्री
महाराजजी शांतभाव से पालकी में बिराजमान हुए । दिव्य पालकी के आने
एवं महाराज श्री के निजस्वरूप में प्रवेश का समाचार तो पहले दिन ही पूरे
क्षेत्र में फैल चुका था । हजारों, हजारों की संख्या में दूर - दूर से आए
भक्त गण नारायणा में श्री महाराजजी के दर्शनार्थ एकत्र होगए । एकत्र
विशाल जनसमुदाय के सामने ही श्री महाराजजी ने शांत भाव से पालकी में
प्रवेश किया । तब दिव्य पार्षद - पुरुषों द्वारा संचालित वह पालकी ऊपर

  • 17 -

श्री दादूवाणी-श्री दादूलीला विहंगावलोकन
उठ कर आकाश मार्ग से होती हुई धीरे धीरे भैराणा पर्वत के एक खोल
(वर्तमान दादूखोल) में पहुँची । सारा शिष्यवृंद तथा विशाल जनसमुदाय भी
पालकी के पीछे - पीछे वहां पहुँच गया । दादू खोल में पालकी के स्थित
होते ही एक अद्भुत दिव्य दृश्य नभ मंडल में दिखाई पड़ा । देव, गंधर्व,
किन्नर आदि प्रकट होकर जय जयकार करते हुए पुष्प केशर की वर्षा करने
लगे, अप्सराएं यशोगान करती हुई नृत्य करने लगीं । ठीक यही दृश्य श्री
महाराजजी के प्राकट्य के दिन भी उपस्थित हुआ था और संयोग से उस
दिन भी अष्टमी तिथि थी । सारे भक्तजन इस अनोखे दृश्य को देखकर
आश्चर्य, आनंद एवं श्रद्धा से प्लावित हो गए । तत्पश्चात् अचानक पालकी
फिर ऊपर उठी और उड़ती हुई भैराणा पर्वत की एक गुफा ( यहां वर्तमान
गुफा मंदिर है ) के द्वार तक गई । पालकी के गुफा में प्रविष्ट होने के पूर्व श्री
महाराज जी ने दाहिना कर - कमल वरद मुद्रा में उठाकर उच्च स्वर से
“संतों ! भक्तों ! सत्यराम” का उद्घोष किया और पालकी गुफा में
अंतर्ध्यान होगई । तभी से दादू सम्प्रदाय में “सत्यराम” महामंत्र का प्रयोग
आशीर्वादात्मक तथा अभिवादनात्मक दोनों भावों में किया जाता है । जब भी
दादू भक्तों को परस्पर अभिवादन करना होता है या आशीर्वाद देना होता है
तब अपने सद्गुरुदेव का स्मरण करते हुए “सत्यराम” का उच्चारण करते हैं,
अतः यह श्रेष्ठ अभिवादन है ।
( परम श्रद्धेय श्री दादूदयालजी महाराज की यह संक्षिप्त जीवनी है )

  • 18 -

श्री स्वामी दादूदयालजी महाराज की वाणी
।। महिमा - महात्म्य ।।
।। दोहा ।। प्रगट कल्प तरु अवनि परि, उदय भयो इक आय ।
कृतसु दादूदास को मनवांछित फल दाय ॥ 1 ॥
।। कवित्त ।। अवनि कल्प तरु प्रगट, भई दादू की वाणी ।
साखी शब्द दोई ग्रन्थ, सुतो बड़ स्कन्द पिछाणीं ॥
साखी स्कन्द में डारि, अंग सैंतीस सुनाऊँ ।
पद स्कन्द में डारि, सप्त अरु बीस बताऊँ ॥
पच्चीससै पैंसठि साखि, सोउ पुनि साखा ।
चार सैं चंव्वालीस, पद सोउ उपदाखा ॥
पत्र अक्षर लक्ष कहै साठि, सहज पुनि और गनि ।
भक्ति पहुप वैराग्य फल, ब्रह्म बीज जगन्नाथ भनिं ॥ 2 ॥
प्रथम सत्ताईस राग पोई, अब मोटी डारा ।
तामैं छोटी और अंग, सैंतीस बिचारा ॥
पद जू चंव्वालीस चारि, सत ऊपर डलियाँ ।
उभय सहस शत पंच, साखी इकतीस दुकलियाँ ॥
अब पात सो अक्षर एक लख, साठ सहस पुनि और गन ।
भक्ति पहुप अरु दर्श फल, ब्रह्म बीज कहै लालजन ॥ 3 ॥
ज्ञान भक्ति वैराग्य भाग, बहु भेद बतायो ।
कोटि ग्रंथ को मन्त, पन्थ संक्षेप लखायो ॥
विशुद्धि बुद्धि अविरुद्धि, शुद्धि सर्वज्ञ उजागर ।
परमानंद प्रकाश नाश, बिगदंड महाधर ॥
वर्णबूँद साखी सलिल, पद ललिता सागर हरि ।
दादूदयालु दिनकर दुती, जिन विमल वृष्टि वाणी करी ॥ 4 ॥

  • 19 -

श्री दादूवाणी-महिमा महात्म्य
भये सम्पूर्ण पद अरु साखी, भक्ति मुक्ति तिनमें सो भाखी ।
मनसा वाचा बाचै कोई, ताकूँ आवागमन न होई ॥5॥
वाणी दादू दयालु की, सब शास्त्रन को सार ।
पढे विचारे प्रीती सूं, जे जन उतरे पार ॥ 6 ॥
दादू दीन दयालु की, वाणी विस्वावीस ।
तिनकूं खोजि विचार करि, अंग धरे सैंतीस ॥ 7 ॥
तिन माहीं जो हारडे, तिनके तिते स्वरुप ।
कोई विवेकी केलवे, काढै अर्थ अनूप ॥ 8 ॥
वाणी दादू दयालु की, वाणी कंचन रूप ।
कोई इक सोनी संत जन, घड़ि हैं घाट अनूप ॥ 9 ॥
वाणी दादू दयालु की, वाणी अनुभव सार ।
जो जन या हृदय धरै, सो जन उतरे पार ॥ 10 ॥
जे जन पढ़े जु प्रीति सूं, उपजे आत्मज्ञान ।
तिनकूं आनन भास ही, एक निरंजन ध्यान ॥ 11 ॥
जिनके या हृदय बसी, याही में मन दीं ।
तिनकूं अति मीठी लगी, आठ पहर लैलीन ॥ 12 ॥
वेद पुराण सब शास्त्र, और जीते जो ग्रन्थ ।
तिनको बोध बिलोइकै, यह काढ्या निज मंथ ॥ 13 ॥
बोले दादू दासजी, साचै शब्द रसाल ।
तिनकी उपमा को कहै, मानो उगले लाल ॥ 14 ॥
या वाणी सुनि ज्ञान ह्वे, याही तै वैराग्य ।
या सुन भजन भक्ति बढ़े, या सुन माया त्याग ॥ 15 ॥
या वाणी पढ़ि प्रेम ह्वे, या पढ़ि प्रीति अपार ।
या पढ़ि निश्चय नाम की, या पढ़ि प्राण अधार ॥ 16 ॥

  • 20 -

श्री दादूवाणी-दादूवाणी के अंग नाम
या पढ़ि कूँ खोजतां, क्षमा शील संतोष ।
याही विचारत बुद्धि ह्वे, या धारत जिव मोक्ष ॥ 17 ॥
आदि निरंजन अन्त निरंजन, मध्य निरंजन आदू ।
कहि जगजीवन अलख निरंजन, तहाँ बसे गुरु दादू ॥ 18 ॥
बषना वाणी बरसणी, बरसो गहर गंभीर ।
सूकानैं हरिया करे, गुरु वाणी का नीर ॥ 19 ॥
अविचल मंत्र जपे निशि वासुर, अविचल आरती गावै ।
अविचल इष्ट रहै शिर ऊपरि, अविचल ही पद पावै ॥ 20 ॥
जिनकी वाणी अमृत बखानी, सन्तन मानी सुखदानी ।
जो सुनकर प्राणी हिरदै आनी, बुद्धि थिरानी उन जानी ॥
यह अकथ कहानी प्रगट प्रवानी, नाहिं न छानी गंगा सी ।
गुरु दादू आया शब्द सुनाया, ब्रह्म बताया अविनाशी ॥
दादूवाणी के अंग नाम
गुरु मिल सुमिरण सों लागा, बिरहा जब आया ।
परचा पिवजी सों भया, जरना ठहराया ॥ 1 ॥
हैरान देख लय लग रही, निहकर्मी पतिवन्ता ।
चिंतामणि मन को भई, सूक्ष्म-जन्म अनन्ता ॥ 2 ॥
माया त्यागी, साँच गहि, भेख रु पंथ निराले ।
साध अंग सब सोध कर, मध मारग चालै ॥ 3 ॥
सारगृही जू विचार कर, विश्वास हरि दीया ।
पीव पिछाना आपना, समरथ सब कीया ॥ 4 ॥
सब्द सुना श्रवणों धरा, जीवत मिरतक हूवा ।
सूरातन साहस किया, अरु इन्द्रिय मूवा ॥ 5 ॥

  • 21 -

श्री दादूवाणी-दादूवाणी के राग नाम
कालहि मेट सजीवनी, पारस घर आया ।
उपजन, दया, निर्वैरता, सुंदरि पिव पाया ॥ 6 ॥
कस्तूरी की बॉंस ले, निन्दा परिहरिये ।
निगुणा नेह निवार कर, हरी बिनती करिये ॥ 7 ॥
साखीभूत बेली बधी, अबिहड़ अंग लागा ।
अमर भये अरु थिर हुवै, हरि-संगति पागा ॥ 8 ॥
दादू दीनदयाल की, बानी बिस्वाबीस ।
सकल अंक सो सोध कर, अंग धरे सैंतीस ॥ 9 ॥
इन सैंतीसों अंग में, परमारथ गाया ।
'महानन्द' मुक्ता भया, गुरु दादू पाया ॥ 10 ॥
दादूवाणी के राग नाम
राग विविध बहु शोध कर, हरि का गुण गाया ।
साध महामुनि जे भये, परमेश्वर पाया ॥ 1 ॥
प्रथम गौड़ी मालवा, कीया कल्याना ।
कनड़ा अड़ाणा आण कर, केदार ठाना ॥ 2 ॥
मारू रामकली भली, आशावरि सिन्धूड़ा ।
देवगन्धार कलिंगडा, परजिया पाया ॥ 3 ॥
भाणमली गायन रली, सारँग सार तोडी ।
हुसैनी बंगाली गावताँ, ऐसे मन होडी ॥ 4 ॥
नटनारायण सोरठी, गुंड प्रेम अपारा ।
बिलावल सोहे सदा, सोहे रस सारा ॥ 5 ॥
बसंत भैरूं ललिता भनी, जैतश्री सवाई ।
धनाश्री और अनन्त की, मिल आरति गाई ॥ 6 ॥

  • 22 -

श्री दादूवाणी-मंगलाचरण
आदि अंत हरि सेवही, मिल सबही साधू ।
इन रागन में पद किये, श्री सतगुरु-दादू ॥ 7 ॥
अंग-रागन का जोड़ यह, महानन्द गाया ।
गुरु-दादू परसाद तैं, हरि हिरदै पाया ॥ 8 ॥
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरञ्जनं, नमस्कार गुरु देवतः ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ॥ 1 ॥
परब्रह्म परापरं, सो मम् देव निरंजनम् ।
निराकारं निर्मलं, तस्य दादू वन्दनम् ॥ 2 ॥
गुरुब्रह्मा गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरुः साक्षात् परंब्रह्म, तस्मै श्री गुरवे नमः॥ 3 ॥
अखण्डमण्डलाकारं, व्याप्तं येन चराचरं ।
तत्पदं दर्शितं येन, तस्मै श्री गुरवे नमः॥ 4 ॥
केशराम्बरधरं स्वामी, नूर तेज सुधामयम् ।
दादू दयालु दया कृत्यं, सर्व विघ्न विनाशन् ॥ 5 ॥
काश्मीर रंजितं वस्त्रं, गौरवर्णं शशीप्रभम् ।
दधानं श्रीगुरुंदादूं, वंदे कारण विग्रहम् ॥ 6 ॥
जो प्रभु जग में ज्योतिर्मय, कारण करण अभेव ।
विघ्न हरण मंगलकरण, श्री नमो निरंजन देव ॥ 7 ॥
स्वामी दादू सुमिरिये, गहिये निर्मल ज्ञान ।
मनसा वाचा कर्मणा, सुन्दर धरिये ध्यान ॥ 8 ॥
स्वामी दादू ब्रह्म है, फेर सार नहिं कोय ।
सुन्दर ताकों सुमिरतां, सब सिध कारज होय ॥ 9 ॥

  • 23 -

श्री दादूवाणी-मंगलाचरण
स्वामीजी सिर ऊपरे, स्वामीजी उर मांहि ।
स्वामी दादू सारिसा, सुन्दर दूजा नाहिं ॥ 10 ॥
स्वामी दादू दीनदयाल सा, नजर न आया कोय ।
घडसी सारी मांड में, कर्ता करे सो होय ॥ 11 ॥
सब संतन सौं बीनती, जे सुमिरें जगदीस ।
हरि गुरु हिरदै में, बसो और हमारे शीश ॥ 12 ॥
हरि वन्दन गुरु रीझहीं, गुरु वन्दन सुख राम ।
जगन्नाथ हरि गुरु खुशी, करियो जन परनाम ॥ 13 ॥
सदा हमारे रामजी, गुरु गोविंदजी सहाय ।
जन रज्जब जोख्यों नहीं, विघ्न विलय होय जाय ॥ 14 ॥
नाम लेत नव ग्रह टरें, भजन करत भय जाय ।
जगजीवन अजपा जपें, सबही विघ्न विलाय ॥ 15 ॥
विघ्न बचें हरि नाम सौं, व्याधि विकार विलाय ।
ऐसा शरणा नाम का, सब दुख सहजैं जाय ॥ 16 ॥

  • 24 -

दादूराम ।। ॐ परमात्मने नमः ।। सत्यराम
।। श्री दादूदयालवे नमः ।।
अथ श्री स्वामी दादूदयाल जी की
अनुभव वाणी
गुरूदेव
का
अंग
www.dadooram.org
अथ गुरुदेव का अंग - १
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।
वन्दनं सर्वसाधवा, प्रणामं पारंगत: ।। 1 ।।

  • 25 -

श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1
परब्रह्म परापरं, सो मम देव निरंजनम् ।
निराकारं निर्मलं, तस्य दादू वन्दनम् ॥ 2 ॥
गुरु प्राप्ति और फल
दादू गैब मांहिं गुरुदेव मिल्या, पाया हम परसाद ।
मस्तक मेरे कर धर्या,दिक्ष्या अगम अगाध ॥ 3 ॥
दादू सतगुरु सहज में, किया बहु उपकार ।
निर्धन धनवंत करि लिया, गुरु मिलिया दातार ॥ 4 ॥
दादू सतगुरु सूं सहजैं मिल्या, लिया कंठ लगाइ ।
दया भई दयाल की, तब दीपक दिया जगाइ ॥ 5 ॥
दादू देखु दयाल की, गुरु दिखाई बाट ।
ताला कूंची लाइ कर, खोले सबै कपाट ॥ 6 ॥
सद्गुरु सामर्थ्य के अंग
दादू सतगुरु अंजन बाहिकर, नैन पटल सब खोले ।
बहरे कानों सुणने लागे, गूं गे मुख सौं बोले ॥ 7 ॥
सतगुरु दाता जीव का, श्रवण सीस कर नैन ।
तन मन सौंज संवारि सब, मुख रसना अरु बैन ॥ 8 ॥
राम नाम उपदेश कर, अगम गवन यहु सैन ।
दादू सतगुरु सब दिया, आप मिलाये ऐन ॥ 9 ॥
सत गुरु किया फेरि कर, मन का औरै रूप ।
दादू पंचों पलटि कर, कैसे भये अनूप ॥ 10 ॥
साचा सतगुरु जे मिलै, सब साज संवारै ।
दादू नाव चढ़ाय कर, ले पार उतारै ॥ 11 ॥
सतगुरु पसु मानस करै, मानस थैं सिध सोइ ।
दादू सिध थैं देवता, देव निरंजन होइ ॥ 12 ॥

  • 26 -

श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1
दादू काढै काल मुखि, अंधे लोचन देइ।
दादू ऐसा गुरु मिल्या, जीव ब्रह्म कर लेइ ॥ 13 ॥
दादू काढै काल मुखि, श्रवणहुँ सबद सुनाइ।
दादू ऐसा गुरु मिल्या, मृतक लिये जिलाइ ॥ 14 ॥
दादू काढै काल मुखि, गूंगे लिये बुलाइ।
दादू ऐसा गुरु मिल्या, सुख में रहे समाइ ॥ 15 ॥
दादू काढै काल मुख, मिहर दया करि आइ।
दादू ऐसा गुरु मिल्या, महिमा कही न जाइ ॥ 16 ॥
सतगुरु काढै केस गहि, डूबत इहि संसार।
दादू नाव चढ़ाइ करि, कीये पैली पार ॥ 17 ॥
भौ सागर में डूबतां, सतगुरु काढै आय।
दादू खेवट गुरु मिल्या, लीये नाव चढ़ाइ ॥ 18 ॥
दादू उस गुरुदेव की, मैं बलिहारी जाऊँ।
जहाँ आसण अमर अलेख था, ले राखे उस ठाऊँ ॥ 19 ॥
ज्ञानोत्पत्ति
आत्म मांहै ऊपजै, दादू पंगुल ज्ञान।
कृतम् जाइ उलंधि करि, जहां निरंजन थान ॥ 20 ॥
आत्म बोध बँझ का बेटा, गुरु मुखि उपजै आइ।
दादू पंगुल पंच बिन, जहाँ राम तहँ जाइ ॥ 21 ॥
गुरु शब्द
साचा सहजैं ले मिलै, शब्द गुरु का ज्ञान।
दादू हमको ले चल्या, जहाँ प्रीतम का स्थान ॥ 22 ॥
दादू शब्द विचार करि, लागि रहे मन लाइ।
ज्ञान गहै गुरुदेव का, दादू सहज समाइ ॥ 23 ॥

  • 27 -

श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1
दया विनती
दादू कहै सतगुरु शब्द सुनाइ करि, भावै जीव जगाइ।
भावै अन्तरि आप कहि, अपने अंग लगाइ ॥ 24 ॥
सतगुरु शब्द बाण
दादू बाहरि सारा देखिये, भीतरि किया चूर।
सतगुरु शब्दों मारिया, जाण न पावै दूर ॥ 25 ॥
दादू सतगुरु मारे शब्द सौं, निरखि निरखि निज ठौर।
राम अकेला रह गया, चित्त न आवै और ॥ 26 ॥
दादू हमको सुख भया, साध शब्द गुरु ज्ञान।
सुधि बुधि सोधी समझकर, पाया पद निर्वाण ॥ 27 ॥
सतगुरु शब्द बाण
दादू शब्द बाण गुरु साध के, दूर दिसन्तरि जाइ।
जिहि लागे सो ऊबरे, सूते लिये जगाइ ॥ 28 ॥
सतगुरु शब्द मुख सौं कह्या, क्या नेड़े क्या दूर।
दादू सिष श्रवणहुँ सुण्या, सुमिरण लागा सूर ॥ 29 ॥
करनी बिना कथनी
शब्द दूध घृत राम रस, मथि करि काढै कोइ।
दादू गुरु गोविन्द बिन, घट घट समझि न होइ ॥ 30 ॥
शब्द दूध घृत राम रस, कोई साध बिलोवणहार।
दादू अमृत काढ़ि ले, गुरुमुखि गहै विचार ॥ 31 ॥
घीव दूध में रमि रह्या, व्यापक सब ही ठौर।
दादू वक्ता बहुत हैं, मथि काढैं ते और ॥ 32 ॥
कामधेनु घट घीव है, दिन दिन दुर्बल होइ।
गौरू ज्ञान न ऊपजै, मथि नहिं खाया सोइ ॥ 33 ॥

  • 28 -

श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1
साचा समर्थ गुरु मिल्या, तिन तत्त दिया बताइ ।
दादू मोटा महाबली, घट घृत मथि कर खाइ ॥ 34 ॥
मथि करि दीपक कीजिये, सब घट भया प्रकाश ।
दादू दीवा हाथि करि, गया निरंजन पास ॥ 35 ॥
परमार्था
दीवै दीवा कीजिये, गुरुमुख मार्ग जाइ ।
दादू अपने पीव का, दर्शन देखै आइ ॥ 36 ॥
दादू दीया है भला, दीया करौ सब कोइ ।
घर में धन्धा न पाइये, जे कर दीया न होइ ॥ 37 ॥
दादू दीये का गुण तेल है, दीया मोटी बात ।
दीया जग में चाँदणां, दीया चालै साथ ॥ 38 ॥
सत्य गुरु
निर्मल गुरु का ज्ञान गहि, निर्मल भक्ति विचार ।
निर्मल पाया प्रेम रस, छूटे सकल विकार ॥ 39 ॥
निर्मल तन मन आत्मा, निर्मल मनसा सार ।
निर्मल प्राणी पंच कर, दादू लंघे पार ॥ 40 ॥
परापरी पासै रहै, कोइ न जाणै ताहि ।
सतगुरु दिया दिखाइ करि, दादू रह्या ल्यौ लाइ ॥ 41 ॥
शिष्य जिज्ञासा
जिन हम सिरजे सो कहाँ, सतगुरु देहु दिखाइ ।
दादू दिल अरवाह का, तहँ मालिक ल्यौ लाइ ॥ 42 ॥
मुझ ही मैं मेरा धणी, पड़दा खोलि दिखाइ ।
आत्म सौं परमात्मा, प्रकट आण मिलाइ ॥ 43 ॥
भरि भरि प्याला, प्रेम रस, अपणे हाथ पिलाइ ।
सतगुरु के सदिकै किया, दादू बलिबलि जाइ ॥ 44 ॥

  • 29 -

श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1
सरवर भरिया दह दिसा, पंखी प्यासा जाइ ।
दादू गुरु प्रसाद बिन, क्यों जल पीवै आइ ॥ 45 ॥
सतगुरु बेपरवाही
मान सरोवर मांहिं जल, प्यासा पीवै आइ ।
दादू दोष न दीजिये, घर घर कहण न जाइ ॥ 46 ॥
गुरु लक्षण
दादू गुरु गरवा मिल्या, ताथैं सब गमि होइ ।
लोहा पारस परसतां, सहज समाना सोइ ॥ 47 ॥
दीन गरीबी गहि रह्या, गरवा गुरु गम्भीर ।
सूक्ष्म शीतल सुरति मति, सहज दया गुरु धीर ॥ 48 ॥
सो धी दाता पलक में, तिरे तिरावण जोग ।
दादू ऐसा परम गुरु, पाया किहीं संजोग ॥ 49 ॥
दादू सतगुरु ऐसा कीजिये, राम रस माता ।
पार उतारे पलक में, दर्शन का दाता ॥ 50 ॥
देवै किरका दरद का, टूटा जोड़ै तार ।
दादू सांधै सुरति को, सो गुरु पीर हमार ॥ 51 ॥
दादू घाइल ह्वै रहे, सतगुरु के मारे ।
दादू अंग लगाय कर, भौसागर तारे ॥ 52 ।
दादू साचा गुरु मिल्या, साचा दिया दिखाइ ।
साचे को साचा मिल्या, साचा रह्या समाइ ॥ 53 ॥
साचा सतगुरु सोधि ले, साचे लीजे साध ।
साचा साहिब सोधि करि, दादू भक्ति अगाध ॥ 54 ॥
सन्मुख सतगुरु साधु सौं, साईं सौं राता ।
दादू प्याला प्रेम का, महारस माता ॥ 55 ॥

  • 30 -

श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1
सांई सौं साचा रहै, सतगुरु सौं सूरा ।
साधू सौं सनमुख रहै, सो दादू पूरा ॥ 56 ॥
सतगुरु मिलै तो पाइये, भक्ति मुक्ति भंडार ।
दादू सहजैं देखिए, साहिब का दीदार ॥ 57 ॥
दादू सांई सतगुरु सेविये, भक्ति मुक्ति फल होइ ।
अमर अभय पद पाइये, काल न लागै कोइ ॥ 58 ॥
सतगुरु विमुख ज्ञान
इक लख चन्दा आण घर, सूरज कोटि मिलाय ।
दादू गुरु गोविन्द बिन, तो भी तिमिर न जाय ॥ 59 ॥
अनेक चंद उदय करै, असंख्य सूर प्रकास ।
एक निरंजन नांव बिन, दादू नहीं उजास ॥ 60 ॥
दादू कद यहु आपा जाइगा, कद यहु बिसरै और ।
कद यह सूक्ष्म होइगा, कद यहु पावै ठौर ॥ 61 ॥
दादू विषम दुहेला जीव को, सतगुरु तैं आसान ।
जब दरवै तब पाइए, नेड़ा ही अस्थान ॥ 62 ॥
गुरु ज्ञान
दादू नैन न देखे नैन को, अन्तर भी कुछ नाहिं ।
सतगुरु दर्पण कर दिया, अरस परस मिलि माहिं ॥ 63 ॥
घट घट रात रतन है, दादू लखै न कोइ ।
सतगुरु सब्दौं पाइये, सहजैं ही गम होइ ॥ 64 ॥
जब ही कर दीपक दिया, तब सब सूझन लाग ।
यों दादू गुरु ज्ञान थैं, राम कहत जन जाग ॥ 65 ॥
आत्मार्थी भेष
दादू मन माला तहँ फेरिये, जहाँ दिवस न परसै रात ।
तहाँ गुरु बाना दिया, सहजैं जपिये तात ॥ 66 ॥

  • 31 -

श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1
दादू मन माला तहँ फेरिये, जहाँ प्रीतम बैठे पास ।
आगम गुरु थैं गम भया, पाया नूर निवास ॥ 67 ॥
दादू मन माला तह फेरिये जहाँ आपै एक अनन्त ।
सहजैं सो सतगुरु मिल्या, जुग-जुग फाग बसन्त ॥ 68 ॥
दादू सतगुरु माला मन दिया, पवन सुरति सूँ पोइ ।
बिन हाथों निश दिन जपै, परम जाप यूँ होय ॥ 69 ॥
दादू मन फकीर मांही हुवा, भीतर लिया भेख ।
शब्द गहै गुरुदेव का, मांगै भीख अलेख ॥ 70 ॥
दादू मन फकीर सतगुरु किया, कहि समझाया ज्ञान ।
निश्चल आसन बैस कर, अकल पुरुष का ध्यान ॥ 71 ॥
दादू मन फकीर जग तैं रह्या, सतगुरु लीया लाइ ।
अहर्निश लागा एक सौं, सहज शून्य रस खाइ ॥ 72 ॥
दादू मन फकीर ऐसैं, भया, सतगुरु के प्रसाद ।
जहाँ का था लागा तहाँ, छूटे वाद विवाद ॥ 73 ॥
ना घर रह्या न वन गया, ना कुछ किया कलेश ।
दादू मन ही मन मिल्या, सतगुरु के उपदेश ॥ 74 ॥
भ्रम विध्वंस
दादू यहु मसीति यहु देहुरा, सतगुरु दिया दिखाइ ।
भीतर सेवा बंदगी, बाहर काहे जाइ ॥ 75 ॥
कस्तूरिया मृग
दादू मंझे चेला मंझि गुरु, मंझे ही उपदेश ।
बाहर ढूँढें बावरे, जटा बधाये केश ॥ 76 ॥
मन का दमन
मन का मस्तक मूंडिये, काम क्रोध के केश ।
दादू विषय विकार सब, सतगुरु के उपदेश ॥ 77 ॥

  • 32 -

श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1
भ्रम विध्वंश
दादू पड़दा भ्रम का, रह्या सकल घट छाइ ।
गुरु गोविन्द कृपा करें, तो सहजैं ही मिट जाइ ॥ 78 ॥
सूक्ष्म मार्ग
दादू जिहिं मत साधू उद्धरैं, सो मत लिया सोध ।
मन लै मारग मूल गहि, यह सतगुरु का परमोध ॥ 79 ॥
विचार
दादू सोइ मार्ग मन गह्या, जिहिं मारग मिलिए जाइ ।
वेद कुरानों ना कह्या, सो गुरु दिया दिखाइ ॥ 80 ॥
दादू मन भुजंग यहु विष भऱ्या, निर्विष क्योंही न होइ ।
दादू मिल्या गुरु गारड़ी, निर्विष कीया सोइ ॥ 81 ॥
एता कीजे, आप थैं, तन मन उनमन लाइ ।
पंच समाधी राखिये, दूजा सहज सुभाइ ॥ 82 ॥
दादू जीव जंजालों पड़ गया, उलझया नौ मण सूत ।
कोई इक सुलझे सावधान, गुरु बाइक अवधूत ॥ 83 ॥
मन का निग्रह करना
चंचल चहुँ दिसि जात है, गुरु बाइक सूँ बंधि ।
दादू संगति साध की, पारब्रह्म सौं संधि ॥ 84 ॥
गुरु अंकुश मानैं नहीं, उदमद माता अंध ।
दादू मन चेतै नहीं, काल न देखे फंध ॥ 85 ॥
दादू मान्यां बिन मानै नहीं, यहु मन हरि की आन ।
ज्ञान खड़ग गुरुदेव का, ता संगि सदा सुजान ॥ 86 ॥
जहाँ मन उठि चलै, फेरि तहां ही राखि ।
तहाँ दादू लैलीन करि, साध कहैं गुरु साखि ॥ 87 ॥
दादू मनहीं सौं मल उपजै, मन हीं सौं मल धोइ ।
सीख चली गुरु साध की, तौ तूं निर्मल होइ ॥ 88 ॥

  • 33 -

श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1
दादू कच्छब अपने करि लिये, मन इन्द्रिय निज ठौर ।
नाम निरंजन लागि रहु, प्राणी परिहर और ॥ 89 ॥
अधिकारी अनधिकारी के लक्षण
मन के मतै सब कोई खेलै, गुरु मुख बिरला कोई ।
दादू मन की मानैं नहीं, सतगुरु का सिष सोइ ॥ 90 ॥
सब जीवों को मन ठगै, मन को बिरला कोइ ।
दादू गुरु के ज्ञान सौं, सांई सन्मुख होइ ॥ 91 ॥
दादू एक सौं लैलीन होना, सबै सयानप येह ।
सतगुरु साधु कहत हैं, परम तत्त जपि लेह ॥ 92 ॥
सतगुरु शब्द विवेक बिन, संयम रह्या न जाइ ।
दादू ज्ञान विचार बिन, विषय हलाहल खाइ ॥ 93 ॥
घर घर घट कोल्हू चलै, अमी महारस जाइ ।
दादू गुरु के ज्ञान बिन, विषै हलाहल खाइ ॥ 94 ॥
गुरु शिष्य परमोध
सतगुरु शब्द उलंधि करि, जनि कोई सिष जाइ ।
दादू पग पग काल है, जहाँ जाइ तहँ खाइ ॥ 95 ॥
सतगुरु बरजै सिष करै, क्यूँ कर बंधै काल ।
दहदिश देखत बह गया, पाणी फोड़ी पाल ॥ 96 ॥
दादू सतगुरु कहै सो सिष करै, सब सिधि कारज होइ ।
अमर अभय पद पाइये, काल न लागै कोई ॥ 97 ॥
दादू जे साहिब को भावै नहीं, सो हम थें जनि होइ ।
सतगुरु लाजै आपना, साध न मानै कोइ ॥ 98 ॥
दादू हूं की ठाहर है कहो, तन की ठाहर तूं ।
री की ठाहर जी कहो, ज्ञान गुरु का यूं ॥ 99 ॥

  • 34 -

श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1
दादू पंच स्वादी पंच दिशि, पंचे पंचों बाट।
तब लग कह्या न कीजिये, गहि गुरु दिखाया घाट ॥ 100 ॥
दादू पंचों एक मत, पंचों पूज्या साथ।
पंचों मिल सन्मुख भये, तब पंचों गुरु की बाट ॥ 101 ॥
सतगुरु विमुख ज्ञान
दादू ताता लोहा तिणैं सौं, क्यूं कर पकड़या जाइ।
गहन गति सूझै नहीं, गुरु नहीं बूझै आइ ॥ 102 ॥
गुरुमुख कसौटी
दादू औगुण गुण कर माने गुरु के, सोई शिष्य सुजाण।
सतगुरु औगुण क्यों करै, समझै सोई सयाण ॥ 103 ॥
सोने सेती बैर क्या, मारे घण के घाइ।
दादू काटि कलंक सब, राखै कंठ लगाइ ॥ 104 ॥
पाणी माहैं राखिये, कनक कलंक न जाहि।
दादू गुरु के ज्ञान सौं, ताइ अगनि में बाहि ॥ 105 ॥
दादू माहैं मीठा हेत करि, ऊपर कड़वा राख।
सतगुरु सिष कौं सीख दे, सब साधों की साख ॥ 106 ॥
दादू कहै, सिष भरोसे आपणै, ह्वै बोली हुसियार।
कहेगा सो बहेगा, हम पहली करैं पुकार ॥ 107 ॥
दादू सतगुरु कहै सो कीजिये, जे तूं सिष सुजाण।
जहाँ लाया तहँ लागि रहु, बुझे कहा अजाण ॥ 108 ॥
गुरु पहली मन सौं कहै, पीछे नैन की सैन।
दादू सिष समझै नहीं, कहि समझावै बैन ॥ 109 ॥
कहै लखै सो मानवी, सैन लखै सो साध।
मन लखै सो देवता, दादू अगम अगाध ॥ 110 ॥

  • 35 -

श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1
कठोरता
दादू कहि कहि मेरी जीभ रही, सुनि सुनि तेरे कान ।
सतगुरु बपुरा क्या करै, जो चेला मूढ़ अजान ॥ 111 ॥
गुरु शिष्य प्रबोध
एक शब्द सब कुछ कह्या, सतगुरु सिष समझाइ ।
जहाँ लाया तहँ लागै नहीं, फिर फिर बूझै आइ ॥ 112 ॥
अज्ञ स्वभाव अपलट
ज्ञान लिया सब सीख सुणि, मन का मैल न जाइ ।
गुरु बिचारा क्या करै, सिष विषै हलाहल खाइ ॥ 113 ॥
सतगुरु की समझै नहीं, आपणै उपजै नांहि ।
तो दादू क्या कीजिए, बुरी बिथा मन मांहि ॥ 114 ॥
सत्यासत्य गुरु पारख
गरु अपंग पग पंष बिन, शिष शाखा का भार ।
दादू खेवट नाव बिन, क्यूं उतरेंगे पार ॥ 115 ॥
दादू शंसा जीव का, शिष शाखा का साल ।
दोनों को भारी पड़ी, होगा कौण हवाल ॥ 116 ॥
झूठे गुरु और झूठे शिष्यों की गति
अंधे अंधा मिल चले, दादू बंध कतार ।
कूप पड़े हम देखतां, अंधे अंधा लार ॥ 117 ॥
सोधी नहीं शरीर की, औरों को उपदेश ।
दादू अचरज देखिया, ये जाहिंगे किस देस ॥ 118 ॥
दादू सोधी नहीं शरीर की, कहैं अगम की बात ।
जान कहावैं बापुड़े, आवध लिए हाथ ॥ 119 ॥
सत्यासत्य गुरु पारख लक्षण
दादू माया माहै काढि करि, फिर माया में दीन्ह ।
दोऊ जन समझैं नहीं, एको काज न कीन्ह ॥ 120 ॥

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