सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-विरह का अंग 3
विरहीजनों की अनन्यता
मन चित चातक ज्यों रटै, पीव पीव लागी प्यास ।
दादू दर्शन कारणै, पुरवहु मेरी आस ॥ 4 ॥
दादू विरहनी दुख कासनि कहै, कासनि देइ संदेश ।
पंथ निहारत पीव का, विरहनी पलटे केश ॥ 5 ॥
दादू विरहनी दुख कासनि कहै, जानत है जगदीश ।
दादू निशदिन बिरही है, विरहा करवत शीश ॥ 6 ॥
शब्द तुम्हारा ऊजला, चिरिया क्यों कारी ?
तूँही, तूँही निशदिन करूँ, विरहा की जारी ॥ 7 ॥
विरह विलाप
विरहनी रोवै रात दिन, झूरै मन ही मांहिं ।
दादू औसर चल गया, प्रीतम पाये नाहिं ॥ 8 ॥
दादू विरहनी कुरलै कुंज ज्यूं, निशदिन तलफत जाइ ।
राम सनेही कारणै, रोवत रैन विहाइ ॥ 9 ॥
पासैं बैठा सब सुणै, हमकों जवाब न देइ ।
दादू तेरे सिर चढै, जीव हमारा लेइ ॥ 10 ॥
सबको सुखिया देखिये, दुखिया नाहीं कोइ ।
दुखिया दादू दास है, ऐन परस नहीं होइ ॥ 11 ॥
विरहीजनों के दुःख का कारण
साहिब मुख बोलै नहीं, सेवक फिरै उदास ।
यहु बेदन जिय में रहै, दुखिया दादू दास ॥ 12 ॥
पीव बिन पल पल जुग भया, कठिन दिवस क्यों जाइ ।
दादू दुखिया राम बिन, काल रूप सब खाइ ॥ 13 ॥
दादू इस संसार में, मुझसा दुखी न कोइ ।
पीव मिलन के कारणै, मैं जल भरिया रोइ ॥ 14 ॥
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