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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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पृष्ठ 52

श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
संगहि लागा सब फिरै, राम नाम के साथ।
चिंतामणि हिरदै बसै, तो सकल पदार्थ हाथ ॥ 108 ॥
दादू आनन्द आत्मा, अविनाशी के साथ।
प्राणनाथ हिरदै बसै, तो सकल पदार्थ हाथ ॥ 109 ॥
पुरुष प्रकाशित
दादू भावै तहाँ छिपाइए, साच न छाना होइ।
शेष रसातल गगन धू, प्रगट कहिये सोइ ॥ 110 ॥
दादू कहाँ था नारद मुनिजना, कहाँ भक्त प्रहलाद।
परगट तीनों लोक में, सकल पुकारैं साध ॥ 111 ॥
दादू कहाँ शिव बैठा ध्यान धरै, कहाँ कबीरा नाम।
सो क्यों छाना होइगा, जेरु कहैगा राम ॥ 112 ॥
दादू कहाँ लीन शुकदेव था, कहाँ पीपा, रैदास।
दादू साचा क्यों छिपै, सकल लोक प्रकास ॥ 113 ॥
दादू कहाँ था, गोरख, भरथरी, अनंत सिधों का मंत।
परगट गोपीचन्द है, दत्त कहैं सब संत ॥ 114 ॥
अगम अगोचर राखिये, कर कर कोटि जतन।
दादू छाना क्यों रहै, जिस घट राम रतन ॥ 115 ॥
दादू स्वर्ग पयाल में, साचा लेवे नाम।
सकल लोक सिर देखिये, प्रकट सब ही ठाम ॥ 116 ॥
स्मरण लाम्बी रस
सुमिरण का शंसा रह्या, पछितावा मन मांहि।
दादू मीठा राम रस, सगला पिया नांहि ॥ 117 ॥
दादू जैसा नाम था, तैसा लीया नांहि।
हौंस रही यहु जीव में, पछितावा मन मांहि ॥ 118 ॥

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