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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 21, कुल 504 में से

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पृष्ठ 21

श्री दादूवाणी-दादूवाणी के अंग नाम
या पढ़ि कूँ खोजतां, क्षमा शील संतोष ।
याही विचारत बुद्धि ह्वे, या धारत जिव मोक्ष ॥ 17 ॥
आदि निरंजन अन्त निरंजन, मध्य निरंजन आदू ।
कहि जगजीवन अलख निरंजन, तहाँ बसे गुरु दादू ॥ 18 ॥
बषना वाणी बरसणी, बरसो गहर गंभीर ।
सूकानैं हरिया करे, गुरु वाणी का नीर ॥ 19 ॥
अविचल मंत्र जपे निशि वासुर, अविचल आरती गावै ।
अविचल इष्ट रहै शिर ऊपरि, अविचल ही पद पावै ॥ 20 ॥
जिनकी वाणी अमृत बखानी, सन्तन मानी सुखदानी ।
जो सुनकर प्राणी हिरदै आनी, बुद्धि थिरानी उन जानी ॥
यह अकथ कहानी प्रगट प्रवानी, नाहिं न छानी गंगा सी ।
गुरु दादू आया शब्द सुनाया, ब्रह्म बताया अविनाशी ॥
दादूवाणी के अंग नाम
गुरु मिल सुमिरण सों लागा, बिरहा जब आया ।
परचा पिवजी सों भया, जरना ठहराया ॥ 1 ॥
हैरान देख लय लग रही, निहकर्मी पतिवन्ता ।
चिंतामणि मन को भई, सूक्ष्म-जन्म अनन्ता ॥ 2 ॥
माया त्यागी, साँच गहि, भेख रु पंथ निराले ।
साध अंग सब सोध कर, मध मारग चालै ॥ 3 ॥
सारगृही जू विचार कर, विश्वास हरि दीया ।
पीव पिछाना आपना, समरथ सब कीया ॥ 4 ॥
सब्द सुना श्रवणों धरा, जीवत मिरतक हूवा ।
सूरातन साहस किया, अरु इन्द्रिय मूवा ॥ 5 ॥

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