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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 19, कुल 504 में से

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पृष्ठ 19

श्री स्वामी दादूदयालजी महाराज की वाणी
।। महिमा - महात्म्य ।।
।। दोहा ।। प्रगट कल्प तरु अवनि परि, उदय भयो इक आय ।
कृतसु दादूदास को मनवांछित फल दाय ॥ 1 ॥
।। कवित्त ।। अवनि कल्प तरु प्रगट, भई दादू की वाणी ।
साखी शब्द दोई ग्रन्थ, सुतो बड़ स्कन्द पिछाणीं ॥
साखी स्कन्द में डारि, अंग सैंतीस सुनाऊँ ।
पद स्कन्द में डारि, सप्त अरु बीस बताऊँ ॥
पच्चीससै पैंसठि साखि, सोउ पुनि साखा ।
चार सैं चंव्वालीस, पद सोउ उपदाखा ॥
पत्र अक्षर लक्ष कहै साठि, सहज पुनि और गनि ।
भक्ति पहुप वैराग्य फल, ब्रह्म बीज जगन्नाथ भनिं ॥ 2 ॥
प्रथम सत्ताईस राग पोई, अब मोटी डारा ।
तामैं छोटी और अंग, सैंतीस बिचारा ॥
पद जू चंव्वालीस चारि, सत ऊपर डलियाँ ।
उभय सहस शत पंच, साखी इकतीस दुकलियाँ ॥
अब पात सो अक्षर एक लख, साठ सहस पुनि और गन ।
भक्ति पहुप अरु दर्श फल, ब्रह्म बीज कहै लालजन ॥ 3 ॥
ज्ञान भक्ति वैराग्य भाग, बहु भेद बतायो ।
कोटि ग्रंथ को मन्त, पन्थ संक्षेप लखायो ॥
विशुद्धि बुद्धि अविरुद्धि, शुद्धि सर्वज्ञ उजागर ।
परमानंद प्रकाश नाश, बिगदंड महाधर ॥
वर्णबूँद साखी सलिल, पद ललिता सागर हरि ।
दादूदयालु दिनकर दुती, जिन विमल वृष्टि वाणी करी ॥ 4 ॥

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