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अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)

Amar Shaheed Chandrashekhar Azad

सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालय, भारत सरकार द्वारा

DevanagariHindipublished148 पृष्ठ

18 चन्द्रशेखर आज़ाद
दी, तलाशी ले सकती थी तथा जमानत माँग सकती थी। इस प्रकार इस
समिति की सिफारिशों से जहाँ एक ओर पुलिस को तानाशाही अधिकार
प्राप्त हो जाते थे, वहीं दूसरी ओर इनसे न्यायालयों की कार्यवाहियों भी
प्रभावित होती थी। इसमें ऐसी सिफारिशें भी थीं, जिनसे अभियुक्तों को
बिना पर्याप्त प्रमाणों के शीघ्रातिशीघ्र दण्डित किया जा सके। इन
सिफारिशों को सरकार ने स्वीकार कर लिया तथा यही सिफारिशें रौलेट
बिल कही गईं।
रौलेट एक्ट का देशव्यापी विरोध :
1919 के आरम्भ में इस रिपोर्ट के प्रकाशित होते ही सारे देश में
असन्तोष की लहर फैल गई। कांग्रेस ने इसे भारतीयों के मौलिक अधिकारों
पर कुठाराघात कहकर इसका विरोध किया। महात्मा गांधी ने इस बिल
के विरोध में सारे देश में सत्याग्रह करने की चेतावनी दी। और 30 मार्च,
1919 को देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया। यद्यपि यह तिथि फिर
बदलकर 6 अप्रैल कर दी गई, किन्तु सूचना न मिल पाने के कारण दिल्ली
में 30 मार्च को ही सफल हड़ताल हुई। एक विशाल जुलूस निकाला गया,
जिसका नेतृत्व आर्य समाज के प्रधान स्वामी श्रद्धानन्द ने किया। गोरे
सिपाहियों ने स्वामीजी को गोली मार देने की धमकी दी, परन्तु स्वामीजी
इससे बिलकुल भी विचलित नहीं हुए। वह आगे बढ़ते गए। दिल्ली रेलवे
स्टेशन पर पुलिस ने गोली चलाई, जिसमें पाँच व्यक्तियों की मृत्यु हुई
तथा बीस व्यक्ति घायल हुए। देशवासियों का स्वतन्त्रता-प्रेम दासता की
जंजीरों को काट डालना चाहता था। सरकार उन्हें कुचल देना चाहती
थी। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर क्या किया जाए ?
दिल्ली के इस आन्दोलन में हिन्दू तथा मुसलमानों की एक अभूतपूर्व
एकता के दर्शन हुए। दोनों ने एक दूसरे के कन्धे से कन्धा मिलाकर इस
आन्दोलन को सफल बनाया। हिन्दुओं ने सार्वजनिक रूप में मुसलमानों के
हाथों से पानी पिया और 4 अप्रैल, 1919 को स्वामी श्रद्धानन्द ने दिल्ली
की शाही जामा मस्जिद की मिम्बर से वैदिक मन्त्रों का उच्चारण करते
हुए अपना भाषण दिया। निःसन्देह यह भारतीय इतिहास की

न्द्रशेखर आजाद 19
पूर्व घटना है; एक उज्ज्वलतम ऐतिहासिक पहलू है ।
दिल्ली के साथ ही सारे देश में इस बिल का विरोध हुआ। सन् 1919
में अमृतसर में कांग्रेस का अधिवेशन होने वाला था। इसकी तैयारियाँ
डॉक्टर किचलू तथा सत्यपाल कर रहे थे। सरकार ने इन दोनों को
गिरफ्तार करके किसी अज्ञात स्थान पर भेज दिया। जनता इसका कारण
जानने के लिए मजिस्ट्रेट से मिलने के लिए चल पड़ी, किन्तु पुलिस ने उसे
रास्ते में ही रोक दिया। इसी बीच हिंसक उपद्रव हो गया, जिसमें पाँच
गोरे मारे गये। कई मकानों में आग लगा दी गई। जनता में आक्रोश की
कोई सीमा नहीं थी। गुजरांवाला तथा कसूर में भी हिंसक घटनाएँ हुईं।
डॉ० सत्यपाल ने गांधीजी को अमृतसर आने के लिए पत्र लिखा था। वह
8 अप्रैल को पंजाब के लिए प्रस्थान कर चुके थे। रास्ते में ही पलवल
नामक स्टेशन पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और बम्बई भेज दिया
गया।
रौलेट बिल के विरोध में पूरे पंजाब में जुलूस निकाले गये। सड़कों
पर तीन-तीन मील लम्बे जुलूस देखे गये। सड़कें प्रदर्शन करने वालों से
ठसाठस भरी हुई थीं। काले झण्डों का प्रदर्शन किया गया। प्रदर्शनों के
साथ ही हड़ताल भी की गई। यह हड़ताल सात दिनों तक चली। पुलिस
बलात् दूकान खुलवा देती, किन्तु पुलिस के हटते ही दुकानें फिर बन्द हो
जातीं। लाहौर में हड़ताल के दौरान बाजार की गलियों में खाना बनता
था। महिलाएँ अपनी इच्छा से इसमें काम करती थीं, ताकि काम करने
वाले तथा मजदूरी पर निर्भर रहनेवाली जनता को खाना मिल सके।
लोगों ने अपने संकीर्ण स्वार्थों से ऊपर उठकर देश के हित में आन्दोलन में
भाग लिया। जगह-जगह रौलेट बिल हाय-हाय के नारे लग रहे थे, सम्राट्
पञ्चम जार्ज के पुतले जलाये जा रहे थे। पुलिस जब चाहती जगह-जगह
लाठीचार्ज करती रहती थी। कई जगहों पर पुलिस ने गोलियां भी चलाईं।
धड़ाधड़ गिरफ्तारियाँ तथा बाजारों में खुलेआम प्रदर्शनकारियों को बेंत
लगाना साधारण बात हो गई थी। सरकार हड़ताल समाप्त करने तथा
प्रदर्शन रोकने के लिए पोस्टर चिपकाती, किन्तु जनता उन्हें फाड़
डालती।

ून डाला गया। इस घटना के लिए केवल जनरल डायर के"
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"डायर के" -> look at L27 start:
"सिर पर दोष थोपना गलत होगा, क्योंकि ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने योजना"

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"सिर पर दोष थोपना गलत होगा, क्योंकि ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने योजना"
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"बनाकर यह सारी बातें की थी, ऐसा ही मैं समझता हूँ। बात यह है कि"

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"बनाकर यह सारी बातें की थी, ऐसा ही मैं समझता हूँ। बात यह है कि"
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"लिए स्वाभाविक तौर पर सरकार यह नहीं चाहती थी कि इस प्रान्त में"

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"लिए स्वाभाविक तौर पर सरकार यह नहीं चाहती थी कि इस प्रान्त में"

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चन्द्रशेखर आजाद 21
सी प्रकार बदअमनी फैले। इस सम्बन्ध में सरकार पनपने से पहले नोच
लेने वाली नीति बरतना चाहती थी। जनरल डायर तब तक गोली
चलाते रहे, जब तक कि उनका सारा क्रोध ठण्डा न हो गया। और इस
बात को उन्होंने बड़ी अकड़ के साथ कमीशन के सामने कहा। क्यों न कहते,
उन्हें किसी प्रकार का डर तो था नहीं।"
इस काण्ड में कुल सोलह सौ गोलियाँ चली थीं। सरकार की रिपोर्ट
के अनुसार इसमें चार सौ व्यक्तियों की मृत्यु हुई तथा लगभग दो हजार
व्यक्ति घायल हुए। इस प्रकार की घटनाओं में सरकार की रिपोर्ट प्रायः
गलत ही होती है, अतः यह रिपोर्ट भी सही नहीं थी। बाद में इसकी जाँच
के लिए कांग्रेस ने एक आयोग का गठन किया, जिसकी रिपोर्ट के अनुसार
मृतकों एवं घायलों की संख्या सरकारी रिपोर्ट से लगभग दुगुनी थी।
इस काण्ड के बाद भी सरकार की क्रूरता में कमी नहीं आई। अमृतसर
के लिए पानी एवं बिजली की आपूर्ति बन्द कर दी गई। राह चलते लोगों
को बेंतों से पीटा जाता था, उन्हें छाती के बल रेंगकर चलने के लिए विवश
किया जाता था। सैनिक कानून के अन्तर्गत दुकानों में वस्तुओं के भाव
सैनिकों की इच्छा के अनुसार तय किये जाते थे। सैकड़ों लोगों को गिर-
फ्तार करके जेलों में भेजा गया था।
पंजाब के गवर्नर माइकल ओडायर ने जनरल डायर के इस कार्य की
प्रशंसा की थी। सैनिक शासन के इन अत्याचारों का वर्णन श्री मन्मथनाथ

22 चन्द्रशेखर अ...
बैंत लगवाये गए। , राह चलने वालो से कुलियों का काम लिया गया
हुक्म भी था कि स्कूल के लड़के दिन मे आकर तीन बार ब्रिटिश झ
मलामी करें, बच्चों से प्रतिज्ञा कराई गई कि वे कभी कोई अपरा
करेंगे तथा उनसे पश्चाताप करवाया गया। लाला हरिकिशन स
चालीस लाख रुपये जब्त कर लिये गए तथा उन्हें काले पानी की सज
इन अत्याचारों का कहाँ तक वर्णन किया जाए।"
पंजाब की इन घटनाओं से पूरे भारतवर्ष में एक क्षोभ का वाता
उत्पन्न हो गया। चन्द्रशेखर इन सब घटनाओं से अपरिचित नहीं र
समस्त घटनाओं के विषय में उन्होंने समाचार-पत्रों में पढ़ा। देशवा
पर विदेशी अंग्रेजों के इन अत्याचारों से किशोर चन्द्रशेखर का खून
लगा। उनके हृदय में प्रतिशोध की आग धधकने लगी। इस समय
अवस्था लगभग चौदह वर्ष थी।
बैंतों की सजा और चन्द्रशेखर से आजाद :
अमृतसर के बाद दूसरे वर्ष 1920 में कांग्रेस का अधिवेशन कल
में हुआ। यह एक विशेष अधिवेशन था, जिसमे लाला लाजपतराय स
पति बनाये गए। इस अधिवेशन में सरकार के साथ असहयोग का प्र
रखा गया। यद्यपि देशबन्धु चित्तरंजनदास, महामना मदनमोहन मालवी
विपिनचन्द्र पाल आदि पुराने नेता इस प्रस्ताव के विरुद्ध थे, फिर भी
प्रस्ताव पास हो गया। फिर इसी वर्ष कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन नाग
में हुआ, जिसके सभापति विजय राघवाचार्य थे। इस अधिवेशन में भी
प्रस्ताव भारी बहुमत से पास हो गया।
1921 के प्रारम्भ में ही महात्मा गांधी के नेतृत्व में पूरे देश में अस
योग आन्दोलन चलाया गया। असहयोग आन्दोलन की यह आँधी अपने
वेग के साथ देश-भर में फैल गई। विदेशी वस्त्रों की होलियां जलाई गई
वकीलों ने अदालतों का बहिष्कार कर दिया। विद्यार्थी सरकारी त
सरकार से सहायता लेनेवाले विद्यालयों का बहिष्कार करने लगे। विदे
वस्तुओं की दुकानों पर आन्दोलन करनेवाले धरना देते थे। जगह-जग
सभाएं हुईं। जुलूस निकाले गए। ... ... के साथ हर प्रका

चन्द्रशेखर आजाद
का असहयोग करने का आह्वान करते थे।
पूरे देश की तरह बनारस भी इस आन्दोलन से अछूता नहीं रह सका।
अनेक विद्यार्थी इस आन्दोलन में उतर पड़े। उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ दी।
प्रायः सदा ही प्रदर्शन होने, सभाएँ की जातीं तथा नारों से दसों दिशाएँ
गूंज उठतीं। असहयोग आन्दोलन में भाग लेने वाली जनता पर पुलिस
लाठियाँ बरसाती। चन्द्रशेखर सभाओं में जाते, भाषण सुनते तथा पुलिस के
अत्याचारों को देखते। इन सब बातों ने उनके किशोर मन को झकझोरकर
रख दिया। पुलिस के अत्याचारों को देखकर उनका मन विद्रोह कर उठता,
वह प्रारम्भ से ही स्वतन्त्रता प्रेमी थे। अतः अपने-आपको रोक नहीं सके।
वे पढ़ाई की ओर से विमुख होकर असहयोग आन्दोलन में उतर पड़े। अभी
उनकी अवस्था केवल पन्द्रह वर्ष के लगभग ही थी।
एक दिन कुछ आन्दोलनकर्ता एक विदेशी कपड़े की दुकान पर धरना
दे रहे थे। इतने में पुलिस आ गई। पुलिस का एक दारोगा धरना देनेवालों
पर डण्डे बरसाने लगा, वह उन्हें बुरी तरह पीट रहा था। चन्द्रशेखर से
यह अत्याचार नहीं देखा गया; वह अपने-आप पर संयम न रख सके। पास
में ही एक पत्थर पड़ा था। उन्होंने दूर से ही वह पत्थर उस दारोगा के माथे
पर दे मारा। निशाना अचूक लगा था; दारोगा का माथा फूट गया और
वह वहीं पर भूमि पर गिर पड़ा। एक दूसरे सिपाही ने चन्द्रशेखर को ऐसा
करते हुए देख लिया था, चन्द्रशेखर भी इस बात को जान गए, अतः वह
भीड़ के बीच से स्वयं को पुलिस की नजरों से बचाते हुए भाग खड़े हुए।
एक सिपाही ने उन्हें पकड़ने का प्रयत्न किया, परन्तु वह उसकी पकड़ में
नहीं आए।
चन्द्रशेखर के माथे पर चन्दन का टीका लगा था। जिस सिपाही ने
उन्हें पत्थर मारते हुए देखा था, वह उन्हें पहचान गया था। अतः वह कुछ
अन्य सिपाहियों को साथ लेकर उन्हें ढूँढ़ने के लिए निकल पड़ा। जहाँ-जहाँ
उनके मिलने की सम्भावना थी, उन सभी धर्मशालाओं, विद्यालयों तथा
अन्य स्थानों पर खोज अन्त में पुलिसवाले उस धर्मशाला में भी
पहुँच गए, जहाँ रहे थे। पुलिस का सिपाही कमरे में घुस
गया। वहाँ स ता साउपरछात्र, महात्मा गांधी राष्ट्रीय

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चन्द्रशेखर आजाद २५
विद्यार्थी निर्भीक खड़े थे। आजाद से पहलेवाले लड़के से मजिस्ट्रेट ने पूछा,
"तुम्हारा नाम?"
"नवम्बर।" लड़के ने उत्तर दिया।
"तुम्हारे बाप का नाम?"
"दिसम्बर।"
इन उत्तरों को खरेघाट ने अपने लिए अपमानजनक समझा। इसके
बाद उसने चन्द्रशेखर आजाद से पूछा, "तुम्हारा नाम"
"आजाद।" चन्द्रशेखर बोले।
"पिता का नाम?"
"स्वाधीन।"
"तुम्हारा घर कहाँ है?"
"जेल में।"
इस प्रकार के उत्तरों से मजिस्ट्रेट तिलमिलाकर रह गया। बड़े-बड़े
अपराधी उसके सामने उत्तर देने का साहस भी नहीं कर पाते थे। अतः
उसने क्रोध में आकर आजाद को पन्द्रह बेतों की कठोर सजा दी। बेतों की
सजा वास्तव में कठोर समझी जाती थी। इसे सुनकर ही अभियुक्त काँप
उठते थे, बेतों की मार से चमड़ी उधड़ जाती थी, परन्तु चन्द्रशेखर ने इस
दण्ड की कोई परवाह नहीं की।

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चन्द्रशेखर आजाद 27
उनका प्रेम और भी दृढ़ हो गया। इस सम्बन्ध में श्री मन्मथनाथ गुप्त
अपनी पुस्तक 'भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का इतिहास' में लिखते
हैं—
"आजाद ने मजिस्ट्रेट के सामने चुनौती दी। आजाद ने ठीक ही
कहा था कि कुशासन में आजाद लोगों का स्थान जेलखाना ही होता है।
खरेघाट ने सोचा कि यह बालक है, इसे ऐसी सजा देनी चाहिए, जिससे
कि इसे कुछ सबक हो और यह इन बातों को छोड़कर पढ़ने-लिखने में
लगे। इसके अनुसार उन्हें पन्द्रह बेंत मारने की सजा दी गई। जेल में ले
जाकर उन्हें बेंत लगाये गये। पर एक-एक बेंत मारा जाता था और वे
पहले से अधिक जोर से 'महात्मा गांधी की जय' बोलते थे। उन दिनों
'महात्मा गांधी की जय' का नारा भारत की युद्धयात्रा का नारा था।"
वास्तव में स्वतन्त्रता शरीर की नहीं मन की होती है। व्यक्ति के
शरीर को बन्दी बनाया जा सकता है, मन को नहीं। सच्चे स्वतन्त्रता प्रेमी
अत्याचारी शासन के लिए आँखों की किरकिरी बन जाते हैं, अतः उनका
जीवन अधिकतर कारागारों में ही बीतता है। ब्रिटिश शासन में सभी
देशप्रेमियों का घर जेल में ही बन गया था, इसलिए चन्द्रशेखर से जब
मजिस्ट्रेट ने उनके घर के विषय में पूछा तो उन्होंने जेल को ही अपना घर
बताया। उनके इस उत्तर में गम्भीर अर्थ छिपा था जो सरकार के अत्या-
चारों की ओर संकेत करता था।
इस घटना ने किशोर अवस्था में ही चन्द्रशेखर को एक लोकप्रिय नेता
के रूप में प्रसिद्ध कर दिया। यद्यपि यह सजा क्रूर अवश्य थी, फिर भी इसे
कोई भारी सजा नहीं कहा जा सकता, किन्तु यह घटना उनके भावी
क्रान्तिकारी जीवन के लिए प्रथम सोपान थी। इस दृष्टि से यह एक
महत्वपूर्ण घटना है और इसी घटना के बाद वह चन्द्रशेखर से चन्द्रशेखर
आजाद बने थे; वीर चन्द्रशेखर आजाद।
उनकी बेंतों की सजा का यह समाचार उनके घर वालों तक पहुँच
गया, क्योंकि यह समाचार देश के सभी समाचार-पत्रों में छपा था।
समाचार को पढ़कर उनके घर के लोग अत्यन्त चिन्तित हुए। पिता
श्री सीताराम तिवारी सीधे बनारस पहुँचे। उन्होंने पुत्र को अनेक प्रकार

26 चन्द्रशेखर आजाद
सारा शरीर लहूलुहान हो गया, किन्तु चन्द्रशेखर ने उफ तक नहीं की;
उनके मुखमण्डल पर पीड़ा या विषाद का कोई चिह्न नहीं था। उनके इस
प्रकार के धैर्य, साहस तथा देशप्रेम को देखकर सभी उपस्थित लोग आश्चर्य-
चकित रह गये।
चन्द्रशेखर को मिली बेंतों की सजा का समाचार पूरे बनारस नगर में
फैल गया था। जनता फूलमालाएं लेकर उनका स्वागत करने जेल के
दरवाजे पर पहुँच गई। जनता में बालक, युवा एवं वृद्ध तथा स्त्री एवं
पुरुष सभी ने उनको फूलों की मालाएं पहनाकर उनका स्वागत किया, उन्हें
अपने कन्धों पर उठा लिया और 'चन्द्रशेखर आजाद की जय', 'भारतमाता
की जय' तथा 'महात्मा गांधी की जय' आदि नारों से आकाश गूंज उठा।
उसी दिन बनारस के ज्ञानवापी नामक स्थान पर एक सभा हुई।
वहाँ भी लोगों की अपार भीड़ इस वीर बालक के दर्शनों के लिए उप-
स्थित थी। चन्द्रशेखर आजाद मंच पर आये तो उनके ऊपर फूलों की
वर्षा की गई; वह पुष्पमालाओं से लद गये। इस समय वह धोती एवं
कुर्ता पहने हुए थे, उनके माथे पर चन्दन का तिलक लगा हुआ था। मंच
पर से उन्होंने एक संक्षिप्त-सा भाषण दिया, जिसमें उन्होंने देश की
स्वतन्त्रता के लिए कार्य करने की प्रार्थना की तथा इस पावन कार्य के लिए
अपने प्राणों का बलिदान कर देने वाले वीरों को अपनी श्रद्धांजलि दी।
जन समुदाय ने पुनः 'चन्द्रशेखर आजाद जिन्दाबाद' के नारे लगाये। इसके
पश्चात् अन्य लोगों ने भी भाषण दिये, जिनमें चन्द्रशेखर आजाद के वीरता-
पूर्ण कार्य की प्रशंसा की गई।
उन दिनों बनारस से 'मर्यादा' नामक एक पत्र निकलता था, जिसके
प्रकाशक श्री शिवप्रसाद गुप्त तथा सम्पादक श्री सम्पूर्णानन्द थे। श्री
सम्पूर्णानन्द बाद में उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री तथा राजस्थान के राज्यपाल
भी बने। 'मर्यादा' में चन्द्रशेखर आजाद का चित्र तथा 'वीर बालक
आजाद' नाम से उनके विषय में एक लेख भी प्रकाशित हुआ जिसमें
उनके वीरतामय कार्य तथा अद्भुत साहस की भूरि-भूरि प्रशंसा की गयी।
यद्यपि अदालत में मजिस्ट्रेट खरेघाट ने चन्द्रशेखर को सबक सिखाने
के उद्देश्य से 'बेंतों' की सजा दी थी, किन्तु इस सजा से मातृभूमि के प्रति

चन्द्रशेखर आजाद 27
उनका प्रेम और भी दृढ़ हो गया। इस सम्बन्ध में श्री मन्मथनाथ गुप्त
अपनी पुस्तक 'भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का इतिहास' में लिखते
हैं—
"आजाद ने मजिस्ट्रेट के सामने चुनौती दी। आजाद ने ठीक ही
कहा था कि कुशासन में आजाद लोगों का स्थान जेलखाना ही होता है।
खरेघाट ने सोचा कि यह बालक है, इसे ऐसी सजा देनी चाहिए, जिससे
कि इसे कुछ सबक हो और यह इन बातों को छोड़कर पढ़ने-लिखने में
लगे। इसके अनुसार उन्हें पन्द्रह बेंत मारने की सजा दी गई। जेल में ले
जाकर उन्हें बेंत लगाये गये। पर एक-एक बेंत मारा जाता था और वे
पहले से अधिक जोर से 'महात्मा गांधी की जय' बोलते थे। उन दिनों
'महात्मा गांधी की जय' का नारा भारत की युद्धयात्रा का नारा था।"
वास्तव में स्वतन्त्रता शरीर की नहीं मन की होती है। व्यक्ति के
शरीर को बन्दी बनाया जा सकता है, मन को नहीं। सच्चे स्वतन्त्रता प्रेमी
अत्याचारी शासन के लिए आँखों की किरकिरी बन जाते हैं, अतः उनका
जीवन अधिकतर कारागारों में ही बीतता है। ब्रिटिश शासन में सभी
देशप्रेमियों का घर जेल में ही बन गया था, इसलिए चन्द्रशेखर से जब
मजिस्ट्रेट ने उनके घर के विषय में पूछा तो उन्होंने जेल को ही अपना घर
बताया। उनके इस उत्तर में गम्भीर अर्थ छिपा था जो सरकार के अत्या-
चारों की ओर संकेत करता था।
इस घटना ने किशोर अवस्था में ही चन्द्रशेखर को एक लोकप्रिय नेता
के रूप में प्रसिद्ध कर दिया। यद्यपि यह सजा क्रूर अवश्य थी, फिर भी इसे
कोई भारी सजा नहीं कहा जा सकता, किन्तु यह घटना उनके भावी
क्रान्तिकारी जीवन के लिए प्रथम सोपान थी। इस दृष्टि से यह एक
महत्त्वपूर्ण घटना है और इसी घटना के बाद वह चन्द्रशेखर से चन्द्रशेखर
आजाद बने थे; वीर चन्द्रशेखर आजाद।
उनकी बेंतों की सजा का यह समाचार उनके घर वालों तक पहुँच
गया, क्योंकि यह समाचार देश के सभी समाचार-पत्रों में छपा था।
समाचार को पढ़कर उनके घर के लोग अत्यन्त चिन्तित हुए। पिता
श्री सीताराम तिवारी सीधे बनारस पहुँचे। उन्होंने पुत्र को अनेक प्रकार

29
चन्द्रशेखर आजाद

ने समझाया तथा उन पर जोर डाला कि वह घर लौट चलें, किन्तु आजाद
भी बचपन से ही अपने हठ के धनी थे। वह देश-सेवा का व्रत ले चुके थे।
किसी भी श्रेष्ठ व्यक्ति के लिए अपना लक्ष्य ही सबसे महान होता है।
महापुरुष जिस कार्य को करने की ठान लेते हैं, दुनिया भर की विपत्तियां
आ जाने पर भी, वह अपने मार्ग से नहीं हटते, अतः उन्होंने अपने पिताजी
का यह प्रस्ताव नहीं माना। पिताजी निराश होकर वापस घर लौट गये।
यह उनका अपने घर के प्रति एक प्रकार का विद्रोह ही था। वस्तुतः
आजाद की दृष्टि में सारा देश ही अपना घर था। आचार्य चाणक्य ने
कुल के लिए एक व्यक्ति का, ग्राम के लिए कुल का तथा राज्य अथवा देश
के लिए ग्राम का भी परित्याग करने की शिक्षा दी है। चन्द्रशेखर आजाद
ने भी ऐसा ही किया, उन्होंने भारत भूमि के हित में संकीर्ण पारिवारिक
मोह तथा उसके सम्बन्धों को तिलांजलि दे दी।

द्वितीय अध्याय
क्रान्ति की ओर
पूर्वकथित बनारस की घटना के बाद वीर चन्द्रशेखर आजाद के
चरण स्वतन्त्रता आन्दोलन की ओर बढ़ते गये। वे पूर्णतया देशभक्ति के
रंग में रंग गये; पढ़ाई से उनका मन उठ गया, वे अपने विद्यालय के
साथियों को भी देश की स्वतन्त्रता के आन्दोलन में भाग लेने के लिए
तैयार करने लगे। आजादी प्राप्त करना ही आजाद का लक्ष्य बन गया।
आन्दोलन की वापसी : आजाद की निराशा.
असहयोग आन्दोलन ने चन्द्रशेखर आजाद को एक नई दिशा दिखाई
थी, वह भारत की स्वतन्त्रता के सपने देखने लगे थे। इसके लिए उनके
मन में कुछ करने की तमन्नाएँ थीं, किन्तु अगले ही वर्ष चौरीचौरा की
घटना के कारण महात्मा गांधी ने असहयोग आन्दोलन वापस ले लिया।
घटना इस प्रकार घटी कि असहयोग आन्दोलन पूरे जोरों से चल रहा था,
कई आन्दोलनकारी जेलों में बन्द कर दिये गए थे। यह आन्दोलन पूरी
तरह अहिंसात्मक था। गोरखपुर के पास चौरीचौरा नामक स्थान पर
पुलिस के अत्याचारों से आन्दोलनकर्ता अपना आपा खो बैठे, उनकी भीड़
ने एक थाने में आग लगा दी। इस आग में एक दरोगा तथा इक्कीस
सिपाहियों की जलकर मृत्यु हो गई। यह घटना 12 फरवरी, 1922 को
घटी थी, जिसे इतिहास में 'चौरीचौरा काण्ड' के नाम से जाना जाता है।
इस प्रकार की हिंसा को देखकर गांधीजी ने आन्दोलन रोक दिया। 13
मार्च, 1922 को गांधीजी गिरफ्तार कर लिये गये। इस समय क्रान्तिकारियों
का उत्साह अपनी चरम सीमा पर था, अतः महात्मा गांधी के इस निर्णय
से उन्हें भारी निराशा हुई। महात्माजी के इस प्रकार के निर्णय के विरुद्ध

30 चन्द्रशेखर आजाद
में भी मन्मथनाथ गुप्त लिखते हैं—
"....महात्मा गांधी ने इस पर आम लोगों में अहिंसा के भाव की कमी
देखकर आन्दोलन को स्थगित कर दिया। 13 मार्च को गांधीजी भी
गिरफ्तार कर लिये गए। एक आश्चर्य की बात यह है कि जब तक
आन्दोलन जोरों से चलता रहा और गांधी जी खुल्लमखुल्ला तौर पर
उसका नेतृत्व कर रहे थे, उस समय तक उनको किसी ने नहीं पकड़ा, किन्तु
ज्यों ही आन्दोलन को बन्द कर दिया गया, त्यों ही सरकार ने उनको
पकड़ लिया। यह कोई आकस्मिक घटना नहीं थी, क्योंकि गांधीजी जिस
समय आन्दोलन चला रहे थे, उस समय वह पैंतीस करोड़ थे, किन्तु जिस
समय उन्होंने आन्दोलन स्थगित कर दिया और लोगों की बढ़ती हुई
उमंगों पर पानी फेर दिया, उनको एक खामख्याली के नाम पर निरुत्साह
कर दिया, उस समय वे एक व्यक्ति हो गये।"
श्री गुप्त के इन शब्दों में कुछ अत्युक्ति हो सकती है, किन्तु इतना
निश्चित है कि एक मामूली-सी घटना के कारण आन्दोलन को इस प्रकार
बीच में ही रोक देने से भारतीयों को विशेषकर युवा वर्ग को इससे बड़ी
निराशा हुई। गुप्तजी स्वयं एक क्रान्तिकारी रहे हैं, अतः उनके इन शब्दों
से तत्कालीन क्रान्तिकारियों के मनोभावों का सुन्दर परिचय मिलता है।
आन्दोलन के इस प्रकार बीच में ही रुक जाने पर चन्द्रशेखर आजाद को
बड़ी निराशा हुई, किन्तु उनकी यह निराशा स्थायी न होकर एक क्षणिक
आवेग मात्र थी। वह जिस मार्ग पर बढ़ चुके थे, उससे पीछे लौटने का
उनके लिए प्रश्न ही नहीं उठता था।

हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) एवं काकोरी एक्शन

चन्द्रशेखर आजाद 31
गतिविधियों से अछूता नहीं रहा था। इन गतिविधियों में बंगाल के क्रान्ति-
कारियों की भूमिका महत्त्वपूर्ण रही थी। कुछ समय के लिए क्रान्तिकारी
आन्दोलन समाप्त जैसा हो गया था। बनारस षड्यन्त्र के नेता शचीन्द्र-
नाथ सान्याल को इस षड्यन्त्र में आजन्म कालेपानी की सजा तथा अन्य
लोगों को भी अनेक प्रकार की सजाएं हुई थीं। सन् 1920 में सभी राज-
नीतिक बन्दियों को आम माफी दे दी गई थी, फलतः ये सभी क्रान्तिकारी
छूट गये। इधर असहयोग आन्दोलन के इस प्रकार बीच में ही समाप्त
हो जाने पर युवक खिन्न थे। शचीन्द्रनाथ सान्याल ने इस अवसर का लाभ
उठाया तथा पुनः क्रान्तिकारी दल का गठन किया। सान्याल का मुख्य
क्षेत्र उत्तर प्रदेश ही था। उन्होंने शीघ्र ही क्रान्तिकारी दल को सुदृढ़ बना
दिया। इन्हीं दिनों बंगाल में अनुशीलन समिति नाम की क्रान्तिकारियों
की संस्था भी कार्य कर रही थी। अनुशीलन समिति ने बनारस में कल्याण
आश्रम नाम के एक आश्रम की स्थापना भी की थी, यह आश्रम वास्तव में
समिति के सदस्य क्रान्तिकारियों का कार्यालय ही था।
क्रान्तिकारी दल तथा अनुशीलन समिति लम्बे समय तक अलग-अलग
कार्य करते रहे। दोनों के उद्देश्य तथा कार्यप्रणालियां समान थीं, अतः
बाद में ये दोनों मिलकर एक दल के रूप में कार्य करने लगे। इस संयुक्त
दल का नाम 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' रखा गया। इस एसो-
सिएशन के निम्नलिखित मुख्य उद्देश्य थे—

  1. संगठित क्रान्ति द्वारा गणतन्त्र स्थापित करना, जिसमें प्रान्तों को
    आन्तरिक मामलों में पूर्ण स्वतन्त्रता होगी।
  2. प्रत्येक सही सलामत मस्तिष्क वाले वयस्क नागरिक को मता-
    धिकार।
  3. शोषण रहित समाज की स्थापना।
    स्पष्ट है कि ये सभी उद्देश्य साम्यवादी रूस की शासन प्रणाली से
    प्रभावित थे। कुछ ही वर्ष पूर्व सन् 1917 में अक्तूबर क्रान्ति के बाद
    सोवियत संघ में साम्यवाद की स्थापना हो चुकी थी। 'हिन्दुस्तान रिपब्लि-
    कन एसोसिएशन' के सदस्य पूरे उत्तर प्रदेश में फैले हुए थे। शाहजहांपुर
    में पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल, कानपुर में सुरेश बाबू तथा बनारस में श्री

32 चन्द्रशेखर आजाद
राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, श्री शचीन्द्रनाथ बख्शी तथा श्री रवीन्द्रमोहन बाग
इस दल के कार्यों को आगे बढ़ा रहे थे।
इन दिनों चन्द्रशेखर आजाद भी बनारस में प्रसिद्ध हो चुके थे, अतः
क्रान्तिकारी दल का एक सदस्य प्रणवेश उनसे मिला। आजाद से मिलकर
प्रणवेश अत्यधिक प्रभावित हुआ। इस प्रकार आजाद भी 'हिन्दुस्तान
रिपब्लिकन एसोसिएशन' के सदस्य बन गये। यहीं उनकी भेंट रामप्रसाद
बिस्मिल आदि महान् क्रान्तिकारियों से हुई और यहीं से उनके भावी
क्रान्तिकारी जीवन का एक नया अध्याय प्रारम्भ हुआ।
दल के संगठन में :
आजाद हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्य बन गये, तभी
दल की सदस्यता का विस्तार किया जाना निश्चित हुआ। आजाद ने इस
कार्य में बढ़-चढ़कर भाग लिया। वह ब्राह्मण के वेश में इधर-उधर घूमते
रहते तथा युवकों से मिलते और उनके विचार जानते। क्रान्तिकारी विचारों
वाले युवकों को खोजकर अपने दल का सदस्य बनाते। इस प्रकार थोड़े ही
समय में उनके प्रयत्नों से दल के सदस्यों की संख्या बढ़ने लगी, किन्तु दल
के पास धन का अभाव था। यद्यपि दल की जनशक्ति में भारी वृद्धि हो गई
थी, परन्तु दल के पास साधनों की कमी थी। इस कमी को दूर करने के
लिए दल के सदस्यों की बैठकें हुईं।

चन्द्रशेखर आजाद 33
था। उसने एक नई योजना रखी। योजना इस प्रकार थी कि गाजीपुर में
निर्मले साधुओं का एक मठ था। मठ के महन्त के पास अपार धन था
और मठ की अपनी भी पर्याप्त सम्पत्ति थी। महन्त वृद्ध हो चला था और
रोगी था; आशा थी वह शीघ्र ही संसार से चल बसेगा। अतः क्रान्ति-
कारियों के दल के किसी सदस्य को महन्त का शिष्य बनाना था, जिससे
महन्त के मरने के बाद महन्त तथा मठ की सम्पत्ति क्रान्तिकारियों के काम
आ सके। इस समय महन्त को किसी शिष्य की आवश्यकता भी थी। दल
के सभी सदस्यों ने इस कार्य के लिए चन्द्रशेखर आजाद को ही उपयुक्त
समझा। उन्हें पूरा विश्वास था कि महन्त उन्हें देखकर अवश्य अपना
शिष्य बना लेगा। इस कार्य के लिए सबने एक स्वर से चन्द्रशेखर आजाद
का नाम प्रस्तावित किया, किन्तु चन्द्रशेखर आजाद इससे सहमत नहीं हुए।
वह इसे पाखण्ड और धोखा समझते थे, किन्तु दल को धन की अत्यन्त
आवश्यकता थी, अतः इसे देखते हुए और साथियों के दबाव के कारण उन्हें
यह बात माननी पड़ी।
महन्त के शिष्य के रूप में :
पूरी योजना बनाकर ब्रह्मचारी साधु के रूप में आजाद गाजीपुर के
उक्त मठ में पहुँच गये। माथे पर चन्दन, गेरुआ परिधान, रुद्राक्ष की
मालाएँ उनके व्यक्तित्व को एक अनोखी भव्यता प्रदान कर रही थीं। वैसे
भी उनकी देह सुन्दर-सुदर्शन एवं आकर्षक थी। अपने व्यक्तिगत जीवन में
भी वह ब्रह्मचारी थे। महन्त के पास जाकर उन्होंने उसका शिष्य बनने की
इच्छा व्यक्त की। महन्त उनके मनमोहक व्यक्तित्व एवं बलिष्ठ शरीर को
देखकर तुरन्त सहमत हो गया। वह महन्त के शिष्य बन गये। उनकी सेवा
से बीमार महन्त धीरे-धीरे स्वस्थ होने लगा।
निर्मले साधु सिख होते हैं, जो 'गुरु ग्रन्थ साहिब' की उपासना करते
हैं। यहाँ रहकर आजाद ने गुरुमुखी लिपि तथा पंजाबी भाषा का भी
अध्ययन किया, क्योंकि मठ का महन्त बनने के लिए यह आवश्यक था।
यद्यपि मठ में किसी प्रकार का कोई भी अभाव नहीं था, फिर भी
आजाद तो ... कि उन्हें यहाँ ऐसा बन्दी जीवन जैसा लगने लगा।

34 चन्द्रशेखर आजाद
कहाँ एक क्रान्तिकारी युवक; कहाँ मठ का जीवन ! उनकी स्थिति पिंजरे
में बन्द शेर के समान हो गई। केवल दो महीनो में ही वह इस जीवन से
ऊब गये। उनकी सहन-शक्ति जवाब देने लगी। वे तो यह समझकर आये
थे कि महन्त बीमार है, इसलिए जल्द ही चल बसेगा, किन्तु यहाँ उल्टा ही
हो रहा था; मरने की तो बात ही दूर, वह और भी अधिक तगड़ा हो गया
था। अतः इस सम्बन्ध में अपने साथियों को एक पत्र लिखा- "महन्त के
मरने के कोई आसार नजर नही आ रहे हैं। आपका अनुमान सही नहीं
था; वह दिन पर दिन मोटा होता जा रहा है। मठ की सम्पत्ति हाथ में
आयेगी, हमें यह आशा छोड़ देनी चाहिए। मुझे इस बन्धन से मुक्त होने
की आज्ञा दो।"
पत्र दल के लोगों को मिला, वे किसी भी कीमत पर मठ की सम्पत्ति
को हाथ से नहीं जाने देना चाहते थे। अतः पत्र मिलते ही दो और सदस्य
गोविन्दप्रकाश तथा मन्मथनाथ गुप्त साधु वेश में गाजीपुर पहुँचे। गोविन्द-
प्रकाश गुरु तथा मन्मथनाथ गुप्त चेला बने थे। दोनों मठ में पहुँचे और
पहले महन्त से मिले तथा फिर चन्द्रशेखर आजाद से। फिर वे मठ के अंदर
में घूमे-फिरे। मठ एक किले की तरह था। चारों ओर ऊँची-ऊँची दीवारें
थीं। उन्होंने मठ की सम्पत्ति को भी देखा। मठ दल के कार्यक्रमों के लिए
पूर्णतया उपयुक्त जगह थी। उसकी सम्पत्ति दल को सुदृढ़ बनाने के काम
आ सकती थी। गोविन्द प्रकाश तथा मन्मथनाथ गुप्त ने इस पर सब प्रकार
से विचार किया और उन्होंने आजाद को वहीं बने रहने का परामर्श दिया।
आजाद इसे मान ही नहीं रहे थे, परन्तु दोनों साथियों ने उनपर इतना दबाव
डाला कि उनकी एक भी न चलने दी। तब विवश होकर आजाद को
उनकी बात माननी पड़ी। गोविन्द प्रकाश तथा मन्मथनाथ दोनों वापस
चले गये।
विवशता में लिये गए निर्णय पर दृढ़ रहना सरल नहीं होता। यद्यपि
उस समय चन्द्रशेखर आजाद ने अपने साथियों के दबाव में आकर मठ में
बने रहने की बात स्वीकार कर ली थी, किन्तु उनका मन उस मठ
में नहीं लग सका। उनके लिए यहाँ रहना असम्भव हो गया। अतः एक
दिन महन्त को बताए बिना आजाद चुपचाप इस बन्धन से आजाद हो गये

चन्द्रशेखर आजाद 35
और साथियों के पास बनारस पहुँच गये।
आजाद के इस प्रकार मठ को छोड़कर चले आने से उनके साथियों
को बड़ी निराशा हुई। उन्हें लगा कि हाथ में आया खजाना चला गया है।
दल के पास धन की कमी के कारण उसका काम भी आगे नहीं बढ़ सकता
था। अब आजाद पुनः दल के संगठन में जुट गये। यद्यपि उनके कठोर
परिश्रम से धन की कमी कुछ दूर हुई, किन्तु इससे कुछ नहीं हो सकता था,
अतः उन्होंने कुछ नई योजनाओं पर विचार किया।
दल के लिए ऋण और चन्दे :
'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' ने धन एकत्रित करने का
उत्तरदायित्व मुख्य रूप से चन्द्रशेखर आजाद को सौंपा। आजाद तत्परता
से इस काम में जुट गये। उनका व्यक्तित्व बड़ा ही मनमोहक था तथा वह
बातचीत करने की कला में भी कुशल थे, अतः जो भी व्यक्ति उनके सम्पर्क
में आता, उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रहता था। कदाचित् उनके इन्हीं
गुणों से पण्डित मोतीलाल नेहरू भी प्रभावित थे। इतिहास की पुस्तकों में
लिखा मिलता है कि विभिन्न राजनीतिक काण्डों में फरार हो जाने पर भी
आजाद उनसे मिलते रहते थे तथा आर्थिक सहायता प्राप्त करते रहते थे।
पण्डित मोतीलाल नेहरू दल को यदा-कदा चन्दा देते रहते थे। राजर्षि
पुरुषोत्तमदास टण्डन सदा ही मुक्तहस्त से क्रान्तिकारियों को आर्थिक
सहायता देते रहते थे। प्रसिद्ध साहित्यकार शरत्चन्द्र कलकत्ता के अटार्नी
जनरल निर्मलचन्द्र तथा वहीं के एडवोकेट जनरल सर एन० एन० सरकार
आदि महानुभाव भी इन क्रान्तिकारियों को नियमित रूप से चन्दा देते
रहते थे। दल की सदस्य संख्या निरन्तर बढ़ती जा रही थी, फलस्वरूप
खर्चे भी बढ़ते जा रहे थे। धन के अभाव में आजाद तथा उनके साथियों
को भयंकर तंगी का सामना करना पड़ता था। कभी-कभी तो हालात ऐसे
भी हो जाते कि सभी को भूखों रह जाना पड़ता। भयंकर सर्दी में साधारण
कपड़ों से ही गुजारा करना पड़ता था। इन अभावों के होते हुए भी इन
वीरों के उत्साह में कोई कमी नहीं आई; मातृभूमि की स्वतन्त्रता के कार्य
को वे अनवरत रूप में आगे बढ़ाते रहे। इस कार्य को आगे बढ़ाने के लिए,