अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)
Amar Shaheed Chandrashekhar Azad
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संदर्भ में पढ़ेंचन्द्रशेखर आजाद
का असहयोग करने का आह्वान करते थे।
पूरे देश की तरह बनारस भी इस आन्दोलन से अछूता नहीं रह सका।
अनेक विद्यार्थी इस आन्दोलन में उतर पड़े। उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ दी।
प्रायः सदा ही प्रदर्शन होने, सभाएँ की जातीं तथा नारों से दसों दिशाएँ
गूंज उठतीं। असहयोग आन्दोलन में भाग लेने वाली जनता पर पुलिस
लाठियाँ बरसाती। चन्द्रशेखर सभाओं में जाते, भाषण सुनते तथा पुलिस के
अत्याचारों को देखते। इन सब बातों ने उनके किशोर मन को झकझोरकर
रख दिया। पुलिस के अत्याचारों को देखकर उनका मन विद्रोह कर उठता,
वह प्रारम्भ से ही स्वतन्त्रता प्रेमी थे। अतः अपने-आपको रोक नहीं सके।
वे पढ़ाई की ओर से विमुख होकर असहयोग आन्दोलन में उतर पड़े। अभी
उनकी अवस्था केवल पन्द्रह वर्ष के लगभग ही थी।
एक दिन कुछ आन्दोलनकर्ता एक विदेशी कपड़े की दुकान पर धरना
दे रहे थे। इतने में पुलिस आ गई। पुलिस का एक दारोगा धरना देनेवालों
पर डण्डे बरसाने लगा, वह उन्हें बुरी तरह पीट रहा था। चन्द्रशेखर से
यह अत्याचार नहीं देखा गया; वह अपने-आप पर संयम न रख सके। पास
में ही एक पत्थर पड़ा था। उन्होंने दूर से ही वह पत्थर उस दारोगा के माथे
पर दे मारा। निशाना अचूक लगा था; दारोगा का माथा फूट गया और
वह वहीं पर भूमि पर गिर पड़ा। एक दूसरे सिपाही ने चन्द्रशेखर को ऐसा
करते हुए देख लिया था, चन्द्रशेखर भी इस बात को जान गए, अतः वह
भीड़ के बीच से स्वयं को पुलिस की नजरों से बचाते हुए भाग खड़े हुए।
एक सिपाही ने उन्हें पकड़ने का प्रयत्न किया, परन्तु वह उसकी पकड़ में
नहीं आए।
चन्द्रशेखर के माथे पर चन्दन का टीका लगा था। जिस सिपाही ने
उन्हें पत्थर मारते हुए देखा था, वह उन्हें पहचान गया था। अतः वह कुछ
अन्य सिपाहियों को साथ लेकर उन्हें ढूँढ़ने के लिए निकल पड़ा। जहाँ-जहाँ
उनके मिलने की सम्भावना थी, उन सभी धर्मशालाओं, विद्यालयों तथा
अन्य स्थानों पर खोज अन्त में पुलिसवाले उस धर्मशाला में भी
पहुँच गए, जहाँ रहे थे। पुलिस का सिपाही कमरे में घुस
गया। वहाँ स ता साउपरछात्र, महात्मा गांधी राष्ट्रीय