अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)
Amar Shaheed Chandrashekhar Azad
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दी, तलाशी ले सकती थी तथा जमानत माँग सकती थी। इस प्रकार इस
समिति की सिफारिशों से जहाँ एक ओर पुलिस को तानाशाही अधिकार
प्राप्त हो जाते थे, वहीं दूसरी ओर इनसे न्यायालयों की कार्यवाहियों भी
प्रभावित होती थी। इसमें ऐसी सिफारिशें भी थीं, जिनसे अभियुक्तों को
बिना पर्याप्त प्रमाणों के शीघ्रातिशीघ्र दण्डित किया जा सके। इन
सिफारिशों को सरकार ने स्वीकार कर लिया तथा यही सिफारिशें रौलेट
बिल कही गईं।
रौलेट एक्ट का देशव्यापी विरोध :
1919 के आरम्भ में इस रिपोर्ट के प्रकाशित होते ही सारे देश में
असन्तोष की लहर फैल गई। कांग्रेस ने इसे भारतीयों के मौलिक अधिकारों
पर कुठाराघात कहकर इसका विरोध किया। महात्मा गांधी ने इस बिल
के विरोध में सारे देश में सत्याग्रह करने की चेतावनी दी। और 30 मार्च,
1919 को देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया। यद्यपि यह तिथि फिर
बदलकर 6 अप्रैल कर दी गई, किन्तु सूचना न मिल पाने के कारण दिल्ली
में 30 मार्च को ही सफल हड़ताल हुई। एक विशाल जुलूस निकाला गया,
जिसका नेतृत्व आर्य समाज के प्रधान स्वामी श्रद्धानन्द ने किया। गोरे
सिपाहियों ने स्वामीजी को गोली मार देने की धमकी दी, परन्तु स्वामीजी
इससे बिलकुल भी विचलित नहीं हुए। वह आगे बढ़ते गए। दिल्ली रेलवे
स्टेशन पर पुलिस ने गोली चलाई, जिसमें पाँच व्यक्तियों की मृत्यु हुई
तथा बीस व्यक्ति घायल हुए। देशवासियों का स्वतन्त्रता-प्रेम दासता की
जंजीरों को काट डालना चाहता था। सरकार उन्हें कुचल देना चाहती
थी। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर क्या किया जाए ?
दिल्ली के इस आन्दोलन में हिन्दू तथा मुसलमानों की एक अभूतपूर्व
एकता के दर्शन हुए। दोनों ने एक दूसरे के कन्धे से कन्धा मिलाकर इस
आन्दोलन को सफल बनाया। हिन्दुओं ने सार्वजनिक रूप में मुसलमानों के
हाथों से पानी पिया और 4 अप्रैल, 1919 को स्वामी श्रद्धानन्द ने दिल्ली
की शाही जामा मस्जिद की मिम्बर से वैदिक मन्त्रों का उच्चारण करते
हुए अपना भाषण दिया। निःसन्देह यह भारतीय इतिहास की