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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

लॉर्ड कॉर्नवालिस ३७१
टीपू का जन्म सन् १७४६ ईसवी में हुआ । लिखा है कि एक
मुसलमान फ़क़ीर टीपू मस्तान औलिया के आशीर्वाद से हैदरअली
के यहाँ इस पुत्र का जन्म हुआ । इसीलिए उसका नाम फ़तहअली
टीपू रक्खा गया । इतिहास में वह टीपू सुलतान के नाम से मशहूर
हुआ । पराक्रम और युद्ध कौशल में टीपू अपने बाप के मुक़ाबले का
था । उसकी शुमार भारत के बल्कि संसार के ऊँचे से ऊँचे वीरों
में की जाती है। टीपू के चरित्र का अधिक दिग्दर्शन एक अगले
अध्याय में किया जायगा, यहाँ पर केवल कॉर्नवालिस और टीपू के
युद्ध को बयान कर देना ज़रूरी है ।
सन् १७८४ में टीपू और कम्पनी के बीच सन्धि हो चुकी थी,
[हाशिया: टीपू से अंगरेज़ों] जिसमें कम्पनी ने टीपू सुलतान को मैसूर का
[हाशिया: को डर] न्याय्य अधिपति स्वीकार कर लिया था और
वादा किया था कि आइन्दा हम कभी मैसूर के
राज में दख़ल न देंगे और टीपू सुलतान के साथ सदा मित्रता
क़ायम रक्खेंगे । तब से अब तक टीपू ने अपनी ओर से सन्धि का
ठीक ठीक पालन किया था और अंगरेज़ों के साथ कभी किसी
तरह की छेड़छाड़ न की थी । किन्तु टीपू और उसके पिता हैदर
के हाथों जो हार पर हार और ज़िल्लत पर ज़िल्लत अंगरेज़ों को
उठानी पड़ी थी वह हर अंगरेज़ के दिल में काँटे की तरह खटक रही
थी । बाप के मरने के बाद क़रीब एक साल तक जिस शान और
सफलता के साथ टीपू ने अंगरेज़ों के साथ युद्ध जारी रक्खा,
उसकी वजह से उन दिनों टीपू का नाम सुनकर अंगरेज़ चौंक उठते

३७२ भारत में अंगरेज़ी राज
थे। पादरी डब्ल्यू० एच० हटन लिखता है कि अंगरेज़ माताएँ टीपू
का नाम ले लेकर अपने शरीर बच्चों को चुप कराती थीं ।*
इसके अलावा टीपू के साथ कम्पनी के युद्ध छेड़ने की एक और
ज़बरदस्त वजह थी। अमरीका की 'संयुक्त रियासतें' किसी समय
इंगलिस्तान के अधीन थीं। किन्तु वहाँ के बाशिन्दे अधिकतर
यूरोप ही के अलग अलग देशों से जाकर बसे थे। उन्होंने अपनी
आज़ादी के लिए युद्ध किया। भयङ्कर रक्तपात हुआ। अन्त में
इंगलिस्तान हारा और अमरीका की 'संयुक्त रियासतें' सदा के लिए
ब्रिटिश साम्राज्य से अलग और आज़ाद हो गईं। इंगलिस्तान की
कीर्ति को इस घटना से ख़ासा धक्का पहुँचा। तुरन्त इंगलिस्तान के
शासकों ने अपनी क़ौम के यश को फिर से क़ायम करने और इस
कमी को पूरा करने के लिए हिन्दोस्तान में अपना राज बढ़ाने का
फैसला किया। लॉर्ड कॉर्नवालिस को जो हिदायतें देकर भारत
भेजा गया, उनमें से एक यह थी कि जितनी जल्दी हो सके भारत
में अमरीका की कमी को पूरा करने का यत्न किया जाय। ये सब
बातें उस समय के सरकारी पत्र व्यवहार में बिलकुल स्पष्ट हैं।
कॉर्नवालिस ने भारत पहुँचते ही टीपू के साथ युद्ध की तैयारी
[पार्श्व टिप्पणी: · टीपू के साथ युद्ध की तैयारी] शुरू कर दी। टीपू एक वीर और सुयोग्य शासक
था। उसने अपनी प्रजा के साथ कभी बुरा
व्यवहार नहीं किया। उसके राज में चारों ओर
वह उन्नति और खुशहाली नज़र आती थी जो उस समय के ब्रिटिश


  • Marquess of Wellesley, p. 32.

लॉर्ड कॉर्नवालिस ३७३
भारतीय इलाके में कहीं देखने को भी न मिलती थी। किन्तु टीपू
नातजरुबेकार था। विदेशियों से देश को कितना ख़तरा था, और
उस ख़तरे को दूर करने के लिए अपने भारतीय पड़ोसियों से मेल
बनाए रखने की कितनी ज़रूरत थी इन दोनों चीज़ों को वह अभी पूरी
तरह न समझ पाया था। कुछ सरहदी इलाक़ों के बारे में मराठों
और निज़ाम दोनों से उसके झगड़े चले आते थे, जिनमें ज़्यादती
चाहे किसी की भी रही हो, इसमें सन्देह नहीं टीपू अपने पड़ोसियों
के साथ उस तरह का प्रेम और मेल क़ायम न रख सका, जिस
तरह का हैदर ने रख रक्खा था। निज़ाम और मराठों के साथ टीपू
के इन आपसी झगड़ों से ही क[म्पनी] को टीपू के ख़िलाफ़ सबसे
ज़्यादा मदद मिली। कॉर्नवालिस ने सबसे पहले टीपू के विरुद्ध
निज़ाम के साथ एक नया समझौता किया। इस समझौते का
मतलब यह था कि कम्पनी की वह सबसीडीयरी सेना जो निज़ाम
के यहाँ निज़ाम के ख़र्च पर रक्खी गई थी, टीपू पर हमला करने के
लिए काम में लाई जा सकेगी, और निज़ाम टीपू पर हमला करने
में अंगरेज़ों को मदद देगा।*
इस दरमियान टीपू और मराठों में सुलह सफ़ाई की बातचीत
[हाशिया: मराठों और निज़ाम] हो रही थी, और यदि कॉर्नवालिस बीच में
[हाशिया: को टीपू के ख़िलाफ़] बाधा न डालता तो निस्सन्देह सुलह हो ही
[हाशिया: फोड़ना] गई थी। किन्तु कॉर्नवालिस खूब जानता था
कि टीपू को वश में करना अकेले अंगरेज़ों और
* Historical Sketches, by Colonel Wilks, vol. iii. p. 38.

३७४ भारत में अंगरेज़ी राज
निज़ाम के बूते का काम नहीं है। यह ख़बर पाते ही कि टीपू और
मराठों में सुलह हो रही है, कॉर्नवालिस ने फ़ौरन २३ अक्तूबर सन्
१७८७ को अपने एक अफ़सर जॉर्ज फ़ॉर्सटर को लिखा कि आप
मूदाजी भोंसले के पास नागपुर पहुँच कर गुप्त रीति से वहाँ
के सैन्यबल इत्यादि का पता लगावें और मूदाजी और उसके
साथियों को टीपू के ख़िलाफ़ अंगरेज़ों की ओर फोड़ने का यत्न
करें। इसी पत्र में कॉर्नवालिस ने लिखा कि—“यदि मराठों ने टीपू
के साथ सुलह कर ली है या सुलह करने का फ़ैसला कर लिया है
तो यह नामुमकिन है कि हमारे समझाने बुझाने से मराठे फ़ौरन
ही अपने उस फ़ैसले से टल जावें× × ×इसलिए आप इसमें कोई
कोशिश उठा न रखिए × × × कि टीपू को दोनों का दुश्मन दिखा
कर और मराठों को उकसाकर टीपू के ख़िलाफ़ मराठों के साथ
गहरा सम्बन्ध और मेल कर लिया जावे।”*
इसी मज़मून का एक पत्र कॉर्नवालिस ने १० मार्च सन् १७८८
को पूना के अंगरेज़ रेजिडेण्ट मैलेट को लिखा, जिसमें मैलेट से
पेशवा दरबार को टीपू के विरुद्ध फोड़ने के लिए कहा गया। पेशवा
दरबार और निज़ाम दोनों से कॉर्नवालिस ने यह वादा किया कि
यदि आप लोग टीपू के विरुद्ध अंगरेज़ों को युद्ध में मदद देंगे तो

  • In his letter to George Forster dated October 23, 1787, Lord Corn-
    wallis wrote :—“ If the Marhattas have engaged or resolved to keep peace
    with Tipoo, it is not probable that our solicitations would induce them to
    depart immediately from that plan.” Forster was therefore instructed to
    spare no pains to incite Marhattas “to form a close connexion and alliance
    against Tipoo as a common enemy.”

लॉर्ड कॉर्नवालिस ३७५
जितना इलाक़ा टीपू से विजय किया जावेगा वह सब कम्पनी,
निज़ाम और मराठों में बराबर बराबर बाँट दिया जावेगा। कॉर्न-
वालिस का दिया हुआ लोभ अपना काम कर गया। निज़ाम का
चरित्र कभी भी अधिक विश्वास के योग्य न रहा था। किन्तु इस
समय पेशवा दरबार का हैदर के बेटे के ख़िलाफ़ बिदेशियों के
हाथों में खेल जाना निस्सन्देह अत्यन्त अफ़सोसनाक था। टीपू के
विरुद्ध अंगरेज़ों, मराठों और निज़ाम में सन्धि हो गई। इस सन्धि
के बारे में उस समय के प्रसिद्ध अंगरेज़ नीतिज्ञ फ़ॉक्स ने कहा था
कि वह वास्तव में—"एक न्याय्य नरेश को मिटा देने के उद्देश से
डकैतों की साज़िश थी ।’*
इंगलिस्तान के मन्त्रियों ने समाचार पाते ही फ़ौरन कुछ गोरी
फ़ौज और पाँच लाख पाउण्ड नक़द बतौर क़र्ज़ कॉर्नवालिस की
मदद के लिए इंगलिस्तान से रवाना किए।
तमाम तैयारी पूरी हो गई, कॉर्नवालिस के लिए अब केवल
कोई बहाना ढूंढ़ना बाक़ी था। कहते हैं कि
[टीपू के साथ युद्ध] त्रिवानकुर के राजा और टीपू में कुछ झगड़ा
[का बहाना] चला आता था। त्रिवानकुर के राजा को यह
कह कर भड़काया गया कि टीपू तुम पर हमला करने का इरादा
कर रहा है। उस समय के तमाम पत्रों और उल्लेखों से साबित है
कि टीपू का त्रिवानकुर पर हमला करने का क़तई कोई इरादा न

  • "A plundering confederacy for the purpose of extirpating a lawful
    prince. "-Fox.

[३७६] भारत में अंगरेज़ी राज

था। मद्रास के गवरनर हॉलैण्ड के एक पत्र में यह भी लिखा है
कि—"कम्पनी से लड़ने का टीपू का बिलकुल इरादा न था और
यदि कोई बातें शिकायत की थीं भी तो वह उन्हें आपस में पत्र
व्यवहार द्वारा तय करने को राज़ी था।" टीपू ने खुद अंगरेज़ों
को यक़ीन दिलाया कि मेरा इरादा न हरगिज़ शान्ति भंग करने
का है और न त्रिषानकुर की प्राचीन रियासत पर हमला करने का।
कर्नल विल्क्स लिखता है कि टीपू "लड़ाई के लिए तैयार न था"
किन्तु कॉर्नवालिस को अपने मालिकों की आज्ञा मिल चुकी थी।
वह सन् १७८४ की सन्धि को पैरों तले रौंद कर, जिस तरह हो,
टीपू को मिटाने और भारतीय ब्रिटिश राज की सीमाओं को बढ़ाने
का सङ्कल्प कर चुका था। उसने मद्रास के गवरनर को उत्तर में
लिखा कि—"टीपू का तैयार न होना ही कम्पनी के लिए सब से
अच्छा मौक़ा है।" टीपू को बदनाम करने और अपने अन्याय को
लोगों की नज़रों में जायज़ क़रार देने के लिए टीपू के अन्यायों और
अत्याचारों के अनेक झूठे क़िस्से गढ़कर चारों ओर फैलाए गए,
जिनमें से अनेक अभी तक भारतीय स्कूलों की पाठ्य पुस्तकों में
पाए जाते हैं।
त्रिबानकुर की सहायता के नाम पर युद्ध छेड़ा गया, किन्तु
इसके बाद की तमाम काररवाइयों में त्रिबानकुर के राजा का कहीं
नाम भी नहीं आता।
सब से पहले जून सन् १७६० में मद्रास से एक फ़ौज जनरल
मीडोज़ के अधीन मैसूर पर हमला करने के लिए रवाना हुई।

लॉर्ड कॉर्नवालिस ३७७
इस फ़ौज के साथ बहुत सी फ़ौज करनल मेक्सवेल के अधीन बंगाल
को थी । टीपू अपनी सेना सहित मुक़ाबले के
[मार्जिन: युद्ध का प्रारम्भ] लिए आगे बढ़ा । मीडोज़ ने टीपू के कई सामन्तों
[मार्जिन: और टीपू की] को लोभ देकर अपनी तरफ़ फोड़ लिया । अनेक
[मार्जिन: विजय] स्थानों पर दोनों ओर की सेनाओं में संग्राम हुए,
जिनके विस्तार में पड़ने की ज़रूरत नहीं है। अन्त में टीपू की
वीरता और उसके बढ़े हुए युद्ध कौशल की वजह से बजाय इसके
कि अंगरेज़ी सेना मैसूर का कोई हिस्सा विजय कर सकती, टीपू
की सेना ने कम्पनी की सेना को पीछे भगाते भगाते मद्रास के
निकट तक पहुँचा दिया । टीपू ने फिर कर्नाटक के काफ़ी इलाक़े
पर क़ब्ज़ा कर लिया और जनरल मीडोज़ को जगह जगह ज़बरदस्त
हार खाकर, जान और माल का बेहद नुक़सान उठाकर, नाकाम
मद्रास लौट आना पड़ा ।
मीडोज़ की लज्जाजनक हार का हाल सुन कर कॉर्नवालिस ने
सेना की बाग ख़ुद अपने हाथों में ली । १२
[मार्जिन: तीन तीन शत्रुओं] दिसम्बर सन् १७६० को वह एक बहुत बड़ी
[मार्जिन: का एक साथ] फ़ौज लेकर कलकत्ते से मद्रास के लिए रवाना
[मार्जिन: मुक़ाबला] हुआ । मुमकिन है कि कॉर्नवालिस और उसकी
यह नई सेना भी टीपू को वश में करने के लिए काफ़ी न होती ।
किन्तु इस बीच निज़ाम और मराठों की सेनाएँ अंगरेज़ों की मदद
के लिए पहुँच चुकी थीं । मालूम नहीं नाना फड़नवीस उस समय
पूना में मौजूद था या नहीं और यदि था तो दरबार में उसका

३७८ भारत में अंगरेज़ी राज
कहाँ तक प्रभाव था। जो हो, पेशवा दरबार का उस समय
अंगरेज़ों के हाथों में खेल कर उन्हें उस घोर अन्याय में मदद देना
न केवल टीपू, बल्कि तमाम भारतीय राजशक्तियों के भविष्य के
लिए अत्यन्त अशुभ सूचक था। इस सब के अलावा हैदर की
अदूरदर्शिता का नतीजा भी इस समय टीपू को भोगना पड़ा। टीपू
के तमाम यूरोपियन नौकर यानी उसकी सेना के यूरोपियन अफ़सर
और सिपाही ऐन मौक़े पर शत्रु से जा मिले। कॉर्नवालिस ने गुप्त
पत्र व्यवहार द्वारा इन तमाम लोगों को, जिन्हें हैदर ने नौकर रक्खा
था, धन का लोभ देकर अपनी ओर कर लिया। पाँच लाख पाउंड
नक़द कॉर्नवालिस को इस तरह के कामों के लिए विलायत से क़र्ज़
मिल चुके थे। इतिहास लेखक थॉर्नटन लिखता है:—
"टीपू सुलतान के यूरोपियन नौकर जिस तरह पहले अपनी विद्या और
अपने कौशल को टीपू की रक्षा करने के लिए काम में लाते थे उसी तरह
अब वे अपनी उन्हीं ताक़तों को टीपू के नाश के लिए काम में लाने को हर
तरह तैयार हो गए।"*
मीर हुसेनअली ख़ाँ किरमानी लिखता है कि टीपू के कुछ
[हाशिया: टीपू की सेना में विश्वासघातक] अमीरों और सरदारों को भी अंगरेज़ों ने अपनी
ओर फोड़ लिया था। टीपू जो इस युद्ध के
लिए पहले से तैयार न था, एक ओर अंगरेज़ों,


  • "Tipu's European servants were now quite as ready to exercise their
    skill and knowledge for his destruction as they had previously been assiduous
    in using them for his defence."—History of British India, by Thornton.

[लॉर्ड कॉर्नवालिस ३७६]

मराठों और निज़ाम तीन तीन ताक़तों की सेनाओं द्वारा कई तरफ़
से घिर गया और दूसरी ओर उसकी अपनी सेना में विश्वासघातक
पैदा होगए ।
इस पर भी कॉर्नवालिस का काम इतना आसान न था । टीपू
[पार्श्व-शीर्षक: “शोकजनक] ने वीरता के साथ अपने तीनों शत्रुओं का
संहार”] मुक़ाबला किया । कई महीने युद्ध जारी रहा ।
उस युद्ध की अनेक लड़ाइयों को विस्तार के
साथ बयान करने की आवश्यकता नहीं है । किन्तु अकेला टीपू
इस तरह के तीन शत्रुओं का मुक़ाबला और इन हालतों में कब तक
कर सकता था ? अन्त में टीपू को पीछे हटना पड़ा, यहाँ तक कि
बंगलोर का नगर अंगरेज़ों के हाथों में आ गया । बंगलोर विजय के
बाद कॉर्नवालिस की आज्ञा से उसकी सेना ने बंगलोर निवासियों
के साथ जो व्यवहार किया उसे इतिहास लेखक मिल “शोकजनक
संहार” * कह कर बयान करता है । बंगलोर के नगर को जी भर
के लूटा गया ।
बंगलोर लेने के बाद कॉर्नवालिस ने मैसूर की राजधानी
श्रीरंगपट्टन पर चढ़ाई की । जिस समय अंगरेज़ी
[पार्श्व-शीर्षक: श्रीरंगपट्टन पर] सेना राजधानी के निकट पहुँची, टीपू ने अपने
[पार्श्व-शीर्षक: अंगरेज़ों की चढ़ाई] एक दूत के हाथ अनेक ऊँट फलों से लदवा कर
सुलह की इच्छा के चिह्न रूप कॉर्नवालिस की सेवा में भेजे, किन्तु


  • "Deplorable carnage."—Mill.

३८० भारत में अंगरेज़ी राज
कॉर्नवालिस ने उन फलों को बिना हाथ लगाए लौटा दिया। टीपू
के दूत से उसने सुलह की बातचीत करने तक से इनकार कर
दिया। इतिहास लेखक मिल लिखता है कि लूट के लोभ और यश
की इच्छा ने इस समय अंगरेज़ी सेना को अन्धा कर रक्खा था
और वह मैसूर निवासियों के साथ उस अमानुषिक व्यवहार पर
कटिबद्ध थी, जिसका कोई सभ्य क़ौम अपने बुरे से बुरे शत्रु के
साथ विचार तक नहीं कर सकती।*
टीपू ने अपनी शक्ति भर युद्ध जारी रक्खा। साथ ही उसने
मीडोज़ की हार फिर कॉर्नवालिस के साथ सुलह की बातचीत
करने की कोशिश की। वह अपनी उस समय
की अवस्था खूब समझ रहा था। किन्तु कॉर्नवालिस ने इस बार
टीपू के दूत को अपने सामने तक आने न दिया। आखिरकार
श्रीरंगपट्टन का मोहासरा शुरू हुआ। टीपू ने फिर अंगरेज़ों और
मराठों दोनों से सुलह की बातचीत शुरू की। इस बीच जनरल
मीडोज़ ने कॉर्नबालिस की इजाज़त से सोमरपीठ के प्रसिद्ध बुर्ज
पर हमला किया। सोमरपीठ उस समय 'श्रीरंगपट्टन के क़िले की
नाक' कहलाता था। सय्यद ग़फ़्फ़ार इस मोरचे का रक्षक था।
सय्यद ग़फ़्फ़ार ने खूब वीरता के साथ जनरल मीडोज़ का मुक़ाबला

  • “ . . . . the fact is, that the English in India, at that time, had
    been worked up into a mixture of fury and rage against Tipoo more
    resembling the passion of savages against their enemy, . . . . than the
    feelings with which a civilized nation regards the worst of its foes.”—Mill,
    vol. v, p. 278.

[Header]
लॉर्ड कॉर्नवालिस ३८१

किया। घमासान संग्राम हुआ जिसमें मीर किरमानी के अनुसार
दो हज़ार अंगरेज़ सिपाही मैदान में काम आए। पराजित अंगरेज़
सेनापति को अपने बचे हुए आदमियों सहित पीछे लौट आना
पड़ा। लिखा है कि जनरल मीडोज़ को इस पराजय पर इतनी
लज्जा आई कि उसने अपने खेमे में जाकर आत्महत्या करना चाहा,
उसने अपनी पिस्तौल का उपयोग किया। पहली गोली उसकी
बगल को छीलते हुए निकल गई, उसने दोबारा पिस्तौल चलाना
चाहा, इतने में कर्नल मैलकम ने जो आवाज़ सुनकर खेमे में घुस
आया था, मीडोज़ के हाथ से पिस्तौल छीन ली। कॉर्नवालिस को
इस घटना की सूचना दी गई। उसने आकर मीडोज़ को सान्त्वना
दी और इस अवसर पर टीपू के साथ सुलह की इच्छा प्रकट की।
श्रीरंगपट्टन से पूरब की ओर लालबाग़ नाम का एक बड़ा
[हाशिया: हैदरअली की समाधि का अपमान] सुन्दर बाग़ है, जिसमें हैदरअली की समाधि
बनी हुई है। टीपू सुलतान ने अपने पिता की
याद में इस बाग़ और समाधि के सौन्दर्य को
बढ़ाने में काफ़ी धन खर्च किया था। लॉर्ड कॉर्नवालिस ने इस
बाग़ पर क़ब्ज़ा कर लिया। वहाँ के लम्बे 'सर्व' और अन्य सुन्दर
वृक्षों को कटवा डाला और हैदरअली की समाधि का अपमान
किया। टीपू को यह देखकर बड़ा दुख हुआ।
टीपू और मराठों के बीच भी इस समय सुलह के लिए पत्र
[हाशिया: श्रीरंगपट्टन की संधि] व्यवहार हो रहा था। अब तक अंगरेज़ों ने टीपू
पर जो विजय प्राप्त की थी वह अधिकतर मराठों

३८२ भारत में अंगरेज़ी राज
और निज़ाम ही के बल पर की थी । कहा जाता है कि इस अवसर
पर मराठों और ख़ास कर नाना फड़नवीस ने कॉर्नवालिस को
सुलह के लिए मजबूर किया । अंगरेज़ मराठों की इच्छा के विरोध
का साहस न कर सकते थे । अन्त में २३ फ़रवरी सन १७९२ को
श्रीरंगपट्टन में दोनों दलों के बीच संधि होगई, जिसके अनुसार
टीपू का ठीक आधा राज उससे लेकर कम्पनी, निज़ाम और
मराठों ने आपस में बराबर बराबर बाँट लिया ।
इसके अलावा असहाय टीपू ने, तीन सालाना क़िस्तों में, तीन
करोड़, तीस हज़ार रुपए दण्ड स्वरूप देने का वादा किया ।
और इस दण्ड की अदायगी के समय तक के लिए अपने दो बेटे
जिनमें शहज़ादे अब्दुल ख़ालिक़ की आयु दस साल की और
शहज़ादे मुईजुद्दीन की आयु आठ साल की थी, बतौर बन्धकों के
अंगरेज़ों के हवाले कर दिए ।
इस तरह दूसरे मैसूर युद्ध का अन्त हुआ । टीपू के दिल पर
टीपू की प्रतिज्ञा इस युद्ध का इतना ज़बरदस्त असर हुआ कि
मीर हुसेनअली ख़ाँ किरमानी लिखता है कि
सन्धि के दिन से टीपू ने पलँग और बिस्तर पर सोना छोड़ दिया ।
उस दिन से मृत्यु के समय तक वह केवल चन्द टुकड़े 'खादी' के
ज़मीन पर डाल कर उनके ऊपर सोया करता था । यों तो उस
समय तक भारत का बना तमाम कपड़ा ही हाथ का कता और
हाथ का बुना होता था, किन्तु किरमानी लिखता है कि 'खादी'

लार्ड कार्नवालिस टीपू सुल्तान के दो बेटों को बतौर बन्धक ले रहा है।
[ By the courtesy of the Trustees, Victoria Memorial, Calcutta.

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लॉर्ड कॉर्नवालिस ३८३

उस समय एक मोटी क़िस्म के कपड़े को कहते थे जो ख़ेमे बनाने
के काम में आता था।
अगले साल यानी सन् १७६३ ईसवी में कॉर्नवालिस ने
फ़्रांसीसियों के तमाम भारतीय इलाक़ों पर हमला करके उन्हें
अंगरेज़ कम्पनी के अधीन कर लिया।
इसके बाद भारत के अन्य नरेशों के साथ कॉर्नवालिस के
कॉर्नवालिस और व्यवहार को बयान करना बाक़ी है। दिल्ली का
दिल्ली सम्राट सम्राट अभी तक कहने के लिए समस्त भारत
का अधिराज था। अंगरेज़ क़ायदे के अनुसार
उसकी प्रजा थे। वारन हेस्टिंग्स के समय तक बंगाल, बिहार और
उड़ीसा की दीवानी के लिए वे दिल्ली दरबार को सालाना खिराज
भेजा करते थे। हेस्टिंग्स ने माधोराव सींधिया के साथ मिलकर
दिल्ली सम्राट को मराठों के हवाले करवा दिया, और कलकत्ते से
दिल्ली खिराज जाना रुक गया। उसके बाद सर जॉन मैकफ़रसन
केवल अस्थायी गवर्नर जनरल था। इस दरमियान दिल्ली से
खिराज की माँग बराबर आती रही। कॉर्नवालिस के समय में
सम्राट की ओर से फिर माँग आई। कॉर्नवालिस ने अब सदा के
लिए खिराज देने से इनकार कर दिया। इसलिए नहीं कि दिल्ली
सम्राट ने इस बीच अंगरेज़ों का कोई अहित किया हो, बल्कि केवल
इसलिए क्योंकि दिल्ली का सम्राट अब काफ़ी बलहीन हो चुका था
और अंगरेज़ अपना बल काफ़ी बढ़ा चुके थे। सम्राट दरबार में
इतनी हिम्मत न थी कि सेना भेजकर कलकत्ते से खिराज वसूल

३८४ भारत में अंगरेज़ी राज
कर सके। इस तरह बङ्गाल, बिहार और उड़ीसा के प्रान्त अब
साफ़ साफ़ दिल्ली साम्राज्य से कटकर अंगरेज़ कम्पनी के स्वायत्त
शासन में आ गए ।
अवध के नवाब के साथ भी कॉर्नवालिस का सलूक इसी
तरह का था। कम्पनी की एक विशाल सेना
[पार्श्व टिप्पणी: कॉर्नवालिस और नवाब अवध] जिसके सब अफ़सर अंगरेज़ थे, ज़बरदस्ती
अवध के ऊपर मढ़ दी गई थी। नवाब को
उसका ख़र्च देना पड़ता था। वारन हेस्टिंग्स ने नवाब से वादा
किया था कि भविष्य में जब ज़रूरत न रहेगी तो यह सेना अवध
से वापस बुला ली जायगी। नवाब ने अब उस वादे को पूरा करने
के लिए कॉर्नवालिस से प्रार्थना की। किन्तु इतिहास लेखक मिल
लिखता है :—
"गोकि उस समय अवध के सामने कोई ख़ास ख़तरा न था, और
जितने रुपए नवाब से कम्पनी को लेने का हक़ था उससे ज़्यादा फ़तहगढ़
की इस सेना पर नवाब का ख़र्च होता था, फिर भी कॉर्नवालिस अपने इस
निश्चय पर क़ायम रहा कि सेना फ़तहगढ़ से न हटाई जावे।"*
इस प्रकार ब्रिटिश साम्राज्य पिपासा को भविष्य में शान्त
करने के वास्तविक उद्देश से पचास लाख रुपए सालाना से ऊपर
का दण्ड ज़बरदस्ती कम्पनी के मित्र अवध के नवाब से वसूल
किया जाता रहा।

  • Mill, vol. V. p. 222.

लॉर्ड कॉर्नवालिस ३८५
कम्पनी के दूसरे मित्र निज़ाम के साथ कॉर्नवालिस का सलूक
इससे बेहतर न था। इंगलिस्तान से चलते
कॉर्नवालिस और समय डाइरेक्टरों ने उसे हिदायत कर दी थी
निज़ाम कि 'गुण्टूर का इलाक़ा' किसी तरह निज़ाम से
ले लिया जाय। कॉर्नवालिस जानता था कि यदि मैसूर युद्ध से
पहले निज़ाम पर यह बात ज़ाहिर हो गई तो निज़ाम के टीपू से
मिल जाने का डर है। वह मौक़े की ताक में रहा। युद्ध के बाद
जब उसने निज़ाम को निर्बल पाया तो अपने एक अफ़सर कप्तान
केन्नावे को इस काम के लिए निज़ाम के दरबार में भेजा। इतिहास
लेखक मिल लिखता है :—
“तय हो गया था कि जब तक कप्तान केन्नावे दरबार में पहुँच न जावे
तब तक निज़ाम को यह ख़बर न होने पावे कि उससे गुण्टूर माँगे जाने की
तजवीज़ की जा रही है x x x मद्रास की गवरमेण्ट ने इधर उधर के बहाने
लेकर एक सेना गुण्टूर के आस पास पहुँचा दी, और इससे पहले कि कोई
दूसरी शक्ति लड़ने के लिए या एतराज़ करने के लिए पहुँच सके, खुद उस
इलाक़े पर क़ब्ज़ा करने की तैयारी कर ली।”*
निज़ाम पहले ही कायर और कमज़ोर था। युद्ध की ज़रूरत

  • "No intimation was to be given to the Nizam of the proposed
    demand, till after the arrival of Captain Kennaway at his Court . . . .
    the Government of Madras, under spacious pretences, conveyed a body of
    troops to the neighbourhood of the Sircar; and held themselves in readiness
    to seize the territory before any other power could interpose, either with
    arms or remonstrance."—Mill, vol. v, p. 225.
    २५

३८६ भारत में अंगरेज़ी राज
भी न पड़ी और गुण्टूर का इलाक़ा कम्पनी के हाथों में आ गया ।
कहा जाता है कि किसी डाकू की माँ ने सिकन्दर के सामने
विजेताओं और डाकुओं की परस्पर समानता दर्शाई थी। निस्संदेह
उसे इससे बढ़कर मिसाल न मिल सकती ।
अन्त में लॉर्ड कॉर्नवालिस के शासनकाल की और कुछ
कम्पनी के मुलाज़िमों काररवाइयों और उसके 'शासन सुधारों' पर
की नियुक्ति नज़र डालना ज़रूरी है। सब से पहले उसके
समय के कम्पनी के नौकरों की नियुक्ति का
ढङ्ग । इतिहास में दर्ज है कि उस समय के इंग्लिस्तान के युवराज
(प्रिन्स ऑफ़ वेल्स) ने अनेक बार अपने अनेक मित्रों या आश्रितों
की भारत की ख़ास ख़ास नौकरियों के लिए सिफ़ारिश की और
कॉर्नवालिस बराबर युवराज की इच्छा को पूरा करता रहा। एक
बार युवराज ने कॉर्नवालिस को लिखा कि आप "एलीकान नामक
एक काले" को बनारस की फ़ौजदारी की चीफ़ जजी से हटा कर
पैल्लेग्राइन ट्रीव्ज़ नामक एक अंगरेज़ को उसकी जगह नियुक्त कर
दें। पैल्लेग्राइन ट्रीव्ज़ इंग्लिस्तान के एक बदनाम महाजन का बेटा
था और युवराज को उस महाजन का कुछ क़र्ज़ा अदा करना था ।
कॉर्नवालिस इस बार युवराज की इच्छा पूरी न कर सका। उसने
युवराज को लिखा कि अली इब्राहीम ख़ाँ (जिसे युवराज ने 'काला
एलीकान' लिखा था) गोकि हिन्दोस्तानी है फिर भी "भारत के
सब से अधिक योग्य और सब से अधिक सम्मानित सरकारी
अफ़सरों में से है।" जब कि ट्रीव्ज़ नौजवान और बिलकुल नातजरु

बेकार है; और एक इतने ज़िम्मेवारी के ओहदे पर उसे नियुक्त करना
केवल मज़ाक़ उड़वाना होगा, इत्यादि ।
कॉर्नवालिस ने भारत आकर देखा कि उस समय ऊँचे ऊँचे
ओहदों पर कम्पनी के ज़्यादातर यूरोपियन नौकर अयोग्य और
रिश्वतख़ोर थे। कॉर्नवालिस ने इसे महसूस किया और इसके दो
इलाज किए। एक यह कि उसने नियम कर दिया कि आइन्दा
सिवाय छोटी से छोटी नौकरियों के कम्पनी के इलाक़े में कोई बड़ी
नौकरी किसी हिन्दोस्तानी को न दी जाय। दूसरे उसने कम्पनी के
यूरोपियन मुलाज़िमों की तनख़्वाहें बढ़ा दीं।
अत्यन्त प्राचीन काल से भारत की ८६ फ़ीसदी जन संख्या
[हाशिया: भारत की ग्राम] ग्रामों में रहती रही है। हर गाँव में सदा से एक
[हाशिया: पंचायतें] ग्राम पंचायत होती थी। इतिहास लेखक टॉरेन्स
के शब्दों में “भारतवासियों का सारा सामाजिक,
औद्योगिक और राजनैतिक जीवन इन्हीं ग्रामों और ग्राम पंचायतों के
आधार पर क़ायम था और इन्हीं का बना हुआ था।”* इन ग्राम
पञ्चायतों के सङ्गठन और उनके कार्यों के विषय में हम उस समय
के केवल एक दो अंगरेज़ इतिहास लेखकों की गवाही पेश करते हैं।
टॉरेन्स लिखता है :—
“उस प्राचीन काल से लेकर, जिसकी कि कोई याद तक बाक़ी नहीं रही,
हर गाँव के बड़े बूढ़ों की एक पञ्चायत गाँव पर शासन करती रही है, गाँव के

  • “... the village Community was, as it is still, the unit of
    social, industrial and political existence.”—Torrens' Empire in Asia, p. 100.

३८८ भारत में अंगरेज़ी राज
पंचायती कामों को चलाती रही है और गाँव भर के हितों की रक्षा करती रही
है। पञ्चों की तादाद् पहले पाँच हुआ करती थी, अब अक्सर पाँच से अधिक
होती है। किन्तु पञ्चों में सदा सब बिरादरियों के चुने हुए लोग शामिल रहे
हैं। जब कभी कोई झगड़ा होता है पञ्च ही प्राचीन मर्यादा के अनुसार उसका
फ़ैसला करते हैं, और जब कभी कोई नए ढङ्ग का प्रश्न आ खड़ा होता है
तो पञ्च ही नए नियम बनाकर आइन्दा के लिए मर्यादा क़ायम करते हैं।"*
सर जॉन मैलकम लिखता है :—
"भारत की म्युनिसिपल और ग्राम पंचायतों को छोटे बड़े तमाम लोगों
ने मिल कर जो अधिकार दे रक्खे थे उनके बल पर ये पंचायतें अपने अपने
दायरे के अन्दर पूरी तरह शान्ति और व्यवस्था क़ायम रख सकती थीं। मध्य
भारत में अन्यायी शासकों ने भी कभी इन पंचायतों के स्वत्वों और उनके
अधिकारों पर हमला नहीं किया, जब कि तमाम न्यायशील नरेशों की कीर्ति
और सर्वप्रियता का ख़ास सबब यही होता था कि वे इन पंचायतों का पूरा
ख़याल रखते थे।"†

  • "Time out of mind, the village and its common interests and affairs
    have been ruled over by a council of elders, anciently five in number, now
    frequently more numerous, but always representative in character, who,
    -when any dispute arises, declare what is the customary law, and who, when
    any new or unprecedented case occurs, occasionally legislate,"—Ibid p. 101.
    † "The Municipal and village institutions of India were competent,
    from the power given them by the common assent of all ranks, to maintain
    order and peace within their respective circles. In Central India, their rights
    and privileges never were contested even by tyrants, while all just princes
    founded their chief reputation and claim to popularity on attention to them."
    alcolm vol. i. Chap. xii. Ibid, p. 101.