भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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लॉर्ड कॉर्नवालिस ३८१
किया। घमासान संग्राम हुआ जिसमें मीर किरमानी के अनुसार
दो हज़ार अंगरेज़ सिपाही मैदान में काम आए। पराजित अंगरेज़
सेनापति को अपने बचे हुए आदमियों सहित पीछे लौट आना
पड़ा। लिखा है कि जनरल मीडोज़ को इस पराजय पर इतनी
लज्जा आई कि उसने अपने खेमे में जाकर आत्महत्या करना चाहा,
उसने अपनी पिस्तौल का उपयोग किया। पहली गोली उसकी
बगल को छीलते हुए निकल गई, उसने दोबारा पिस्तौल चलाना
चाहा, इतने में कर्नल मैलकम ने जो आवाज़ सुनकर खेमे में घुस
आया था, मीडोज़ के हाथ से पिस्तौल छीन ली। कॉर्नवालिस को
इस घटना की सूचना दी गई। उसने आकर मीडोज़ को सान्त्वना
दी और इस अवसर पर टीपू के साथ सुलह की इच्छा प्रकट की।
श्रीरंगपट्टन से पूरब की ओर लालबाग़ नाम का एक बड़ा
[हाशिया: हैदरअली की समाधि का अपमान] सुन्दर बाग़ है, जिसमें हैदरअली की समाधि
बनी हुई है। टीपू सुलतान ने अपने पिता की
याद में इस बाग़ और समाधि के सौन्दर्य को
बढ़ाने में काफ़ी धन खर्च किया था। लॉर्ड कॉर्नवालिस ने इस
बाग़ पर क़ब्ज़ा कर लिया। वहाँ के लम्बे 'सर्व' और अन्य सुन्दर
वृक्षों को कटवा डाला और हैदरअली की समाधि का अपमान
किया। टीपू को यह देखकर बड़ा दुख हुआ।
टीपू और मराठों के बीच भी इस समय सुलह के लिए पत्र
[हाशिया: श्रीरंगपट्टन की संधि] व्यवहार हो रहा था। अब तक अंगरेज़ों ने टीपू
पर जो विजय प्राप्त की थी वह अधिकतर मराठों