भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८० भारत में अंगरेज़ी राज
कॉर्नवालिस ने उन फलों को बिना हाथ लगाए लौटा दिया। टीपू
के दूत से उसने सुलह की बातचीत करने तक से इनकार कर
दिया। इतिहास लेखक मिल लिखता है कि लूट के लोभ और यश
की इच्छा ने इस समय अंगरेज़ी सेना को अन्धा कर रक्खा था
और वह मैसूर निवासियों के साथ उस अमानुषिक व्यवहार पर
कटिबद्ध थी, जिसका कोई सभ्य क़ौम अपने बुरे से बुरे शत्रु के
साथ विचार तक नहीं कर सकती।*
टीपू ने अपनी शक्ति भर युद्ध जारी रक्खा। साथ ही उसने
मीडोज़ की हार फिर कॉर्नवालिस के साथ सुलह की बातचीत
करने की कोशिश की। वह अपनी उस समय
की अवस्था खूब समझ रहा था। किन्तु कॉर्नवालिस ने इस बार
टीपू के दूत को अपने सामने तक आने न दिया। आखिरकार
श्रीरंगपट्टन का मोहासरा शुरू हुआ। टीपू ने फिर अंगरेज़ों और
मराठों दोनों से सुलह की बातचीत शुरू की। इस बीच जनरल
मीडोज़ ने कॉर्नबालिस की इजाज़त से सोमरपीठ के प्रसिद्ध बुर्ज
पर हमला किया। सोमरपीठ उस समय 'श्रीरंगपट्टन के क़िले की
नाक' कहलाता था। सय्यद ग़फ़्फ़ार इस मोरचे का रक्षक था।
सय्यद ग़फ़्फ़ार ने खूब वीरता के साथ जनरल मीडोज़ का मुक़ाबला
- “ . . . . the fact is, that the English in India, at that time, had
been worked up into a mixture of fury and rage against Tipoo more
resembling the passion of savages against their enemy, . . . . than the
feelings with which a civilized nation regards the worst of its foes.”—Mill,
vol. v, p. 278.