भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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और निज़ाम ही के बल पर की थी । कहा जाता है कि इस अवसर
पर मराठों और ख़ास कर नाना फड़नवीस ने कॉर्नवालिस को
सुलह के लिए मजबूर किया । अंगरेज़ मराठों की इच्छा के विरोध
का साहस न कर सकते थे । अन्त में २३ फ़रवरी सन १७९२ को
श्रीरंगपट्टन में दोनों दलों के बीच संधि होगई, जिसके अनुसार
टीपू का ठीक आधा राज उससे लेकर कम्पनी, निज़ाम और
मराठों ने आपस में बराबर बराबर बाँट लिया ।
इसके अलावा असहाय टीपू ने, तीन सालाना क़िस्तों में, तीन
करोड़, तीस हज़ार रुपए दण्ड स्वरूप देने का वादा किया ।
और इस दण्ड की अदायगी के समय तक के लिए अपने दो बेटे
जिनमें शहज़ादे अब्दुल ख़ालिक़ की आयु दस साल की और
शहज़ादे मुईजुद्दीन की आयु आठ साल की थी, बतौर बन्धकों के
अंगरेज़ों के हवाले कर दिए ।
इस तरह दूसरे मैसूर युद्ध का अन्त हुआ । टीपू के दिल पर
टीपू की प्रतिज्ञा इस युद्ध का इतना ज़बरदस्त असर हुआ कि
मीर हुसेनअली ख़ाँ किरमानी लिखता है कि
सन्धि के दिन से टीपू ने पलँग और बिस्तर पर सोना छोड़ दिया ।
उस दिन से मृत्यु के समय तक वह केवल चन्द टुकड़े 'खादी' के
ज़मीन पर डाल कर उनके ऊपर सोया करता था । यों तो उस
समय तक भारत का बना तमाम कपड़ा ही हाथ का कता और
हाथ का बुना होता था, किन्तु किरमानी लिखता है कि 'खादी'