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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

३२२ भारत में अंगरेज़ी राज
कौन्सिल टीपू को अचानक मद्रास के सामने देखकर घबरा गए।
लिखा है कि जिस दिन प्रातःकाल टीपू के सवार मद्रास के पास
पहुँचे, गवरनर और उसकी कौन्सिल के मेम्बर और नवाब मोहम्मद
अली मद्रास के क़िले से कुछ दूर कम्पनी के एक बग़ीचे में हवा
खा रहे थे और दरख़्तों के नीचे खाना सजा हुआ था। इन लोगों
को इस तेज़ी से भागना पड़ा कि घबराहट में गवरनर की तलवार
और उसकी टोपी तक रह गई। सौभाग्यवश एक छोटा सा जहाज़
उस समय सामने था। गवरनर और उसके अंगरेज़ साथियों ने
भागकर इस जहाज़ में पनाह ली। एक यूरोपियन इतिहास लेखक
लिखता है कि यदि वह जहाज़ मौक़े पर न होता तो गवरनर और
उसके साथियों को टीपू के सवारों ने अवश्य क़ैद कर लिया होता।*
नवाब मोहम्मदअली अपने तेज़ घोड़े पर सवार होकर सड़क के
रास्ते मद्रास से भाग निकला।
टीपू ने मद्रास के क़िले से पाँच मील दूर सेण्ट टॉमस की
पहाड़ी पर क़ब्ज़ा कर लिया और आस पास के अंगरेज़ी इलाक़े
को अपने अधीन कर लिया।
इस बीच त्रिनमल्ली नामक स्थान पर हैदरअली और जनरल
[हाशिया: हैदरअली के साथ] स्मिथ का मुक़ाबला हुआ। निज़ाम की सेना
[हाशिया: निज़ाम का] अभी तक हैदर की सेना के साथ साथ थी,
[हाशिया: विश्वासघात] किन्तु निज़ाम और अंगरेज़ों में गुप्त बातचीत
हो चुकी थी। ऐन इस मौक़े पर अंगरेज़ी सेना

  • History of Hyder Shah, By M. M. D. L. T., p. 192.

हैदरअली ३९३
पर हमला करने के बहाने निज़ाम ने अपनी तमाम सेना को हैदर
और अंगरेज़ों की सेना के बीच में लाकर खड़ा कर दिया। थोड़ी
ही देर बाद निज़ाम ने अपनी सेना को इस बुरो तरह पीछे की ओर
भगाया कि हैदर की तमाम सेना में खलबली मच गई। हैदरअली
को अब पूरी तरह निज़ाम के विश्वासघात का पता 'चल गया ।
उसे मजबूर होकर अपनी सेना कुछ दूर पीछे हटा लेनी पड़ी।
फिर भी हैदर के एक सिपाही को भी गिरफ़्तार करने का अंगरेज़ों
को मौक़ा न मिल सका और न जनरल स्मिथ को आगे बढ़कर
हैदर पर हमला करने का साहस हुआ ।
हैदर के इस तरह पीछे हटने को उसकी पराजय बताकर अंगरेज़ों
ने खूब बढ़ा कर इस ख़बर को दूर दूर तक फैला दिया ।
यहाँ पर युद्ध के प्रसङ्ग से हटकर हम हैदरअली और उसकी
[पार्श्व-शीर्षक: हैदरअली की माँ] बूढ़ी माँ के सम्बन्ध की एक घटना बयान करना
चाहते हैं। हैदर की माँ उस समय लड़ाई के
मैदान से क़रीब दो सौ मील दूर हैदरनगर के महल में थी। बेटे
की इस पराजय की ख़बर उसके कानों तक पहुँची। वह फ़ौरन
पालकी में बैठकर अपने बेटे को हिम्मत दिलाने के लिए हैदरनगर
से चल पड़ी। बरसात के दिन, उस ज़माने की यात्रा के कष्ट और
उस पर लड़ाई का मैदान। फिर भी रात दिन चलकर बूढ़ी माँ
चन्द रोज़ के अन्दर ही अपने बेटे की सेना के निकट आ पहुँची।
ख़बर पाते ही हैदर अपने छोटे बेटों सहित स्वागत के लिए आगे
बढ़ा। माँ के साथ क़रीब एक हज़ार सिपाही घोड़ों और ऊँटों पर,

३२४ भारत में अंगरेज़ी राज
और इनके अलावा पालकी के आगे आगे दो सौ स्त्रियाँ बुरक़े पहने
हुए घोड़ों पर सवार थीं। कहा जाता है कि माँ के ख़ेमे में उतरते
ही हैदर ने हैरान होकर पूछा—"आप इतना कष्ट उठाकर इस समय
यहाँ कैसे आईं ?" बूढ़ी माँ ने उत्तर दिया—"बेटा, मैं यह देखना
चाहती थी कि तुम अपनी पराजय को कितने धैर्य के साथ सह
सकते हो।" हैदर ने जवाब में अपनी हिम्मत दिखलाते हुए माँ को
विश्वास दिलाया कि वह पराजय कोई पराजय ही न थी। इस पर
माँ ने उत्तर दिया—"ख़ूब, बहुत ख़ूब, अगर यही बात है तो ख़ुदा
का शुक्र है और मैं फ़ौरन लौट जाऊँगी, ताकि मेरे रहने से तुम्हारे
काम में रुकावट न पड़े।" अपने पहुँचने के ठीक तीसरे रोज़ हैदर
की बूढ़ी माँ बेटे को दुआ देकर हैदरनगर की ओर लौट गई।
निस्सन्देह इस प्रकार की वीर माता ही हैदर जैसे वीर पुत्र को
जन्म दे सकती थी।
टीपू मद्रास के क़िले से केवल एक कोस की दूरी पर था। उस
समय के उल्लेखों से ज़ाहिर है कि टीपू के लिए
टीपू के साथ छल उस समय मद्रास विजय कर सकना कुछ भी
मुश्किल न था। जनरल स्मिथ ने त्रिनमल्ली की विजय के बाद
टीपू को पीछे हटाने की एक ख़ासी सुन्दर चाल चली। उसने एक
साँडनी सवार फ़ौरन मद्रास की ओर भेजा। इस सवार ने टीपू
की सेना में पहुँच कर यह ज़ाहिर किया कि मुझे सुलतान हैदरअली
ने अपने बेटे की ख़बर लेने के लिए भेजा है। टीपू को उसने
त्रिनमल्ली की पराजय की ख़बर दी और कहा कि सुलतान का हुकुम

[Header]
हैदरअली ३२५

है कि आप फ़ौरन लौटकर सुलतान से जा मिलें । इस छल के बाद
इसी दूत ने टीपू की सेना से निकल कर आगे बढ़कर मद्रास के
अंगरेज़ों को विजय की सूचना दी, जिसकी झूठी खुशी में एक सौ
एक तोपें मद्रास के क़िले से छोड़ी गईं ।
नातजरुबेकार टीपू ने धोखे में आकर अपने सेनापतियों से
सलाह की । सब की सलाह यही हुई कि इस हालत में मद्रास के
क़िले का मोहासरा करना ठीक नहीं। टीपू अपनी सेना सहित
पीछे लौटकर पिता से आ मिला ।
माँ के जाने के दूसरे दिन हैदरअली वनियमबाड़ी के क़िले की
[हाशिया: वनियमवाड़ी में हैदर की विजय] ओर बढ़ा । वनियमवाड़ी का क़िला भी एक
निहायत मजबूत क़िला था, किन्तु हैदर की
चन्द घण्टे की गोलाबारी ने क़िले की अंगरेज़ी
तोपों को ठण्डा कर दिया । क़िले के अंगरेज़ अफ़सर ने सफ़ेद
झण्डा गाड़ दिया । हैदर की सेना ने क़िले पर क़ब्ज़ा कर लिया ।
हैदर ने क़िले के तमाम अंगरेज़ अफ़सरों और सिपाहियों को उनसे
यह वादा कराकर छोड़ दिया कि हम लोग कम से कम एक साल
तक किसी लड़ाई में आपके ख़िलाफ़ न लड़ेंगे ।
इस क़िले की रक्षा का उचित प्रबन्ध करके हैदरअली आम्बूर
[हाशिया: पीरज़ादा ख़ाकी शाह] की ओर बढ़ा । आम्बूर के मोहासरे में हैदरअली
का एक प्रसिद्ध मित्र पीरज़ादा ख़ाकीशाह घायल
होकर मर गया । यह पीरज़ादा एक मुसलमान
फ़क़ीर था, जो अक्सर हैदर की सेना के साथ रहा करता था ।

३२६ भारत में अंग्रेज़ी राज
उसका मुख्य काम यह था कि वह हर विजय के बाद यह देखने
के लिए घर घर घूमता फिरता था कि हैदर के सिपाही सिवाय
नक़दी और अस्त्र शस्त्र ले लेने के प्रजा के साथ किसी तरह का
अत्याचार न करें। इस सराहनीय प्रयत्न में ही पीरज़ादा ख़ाकी
शाह की जान गई। क़िले के अन्दर की अंगरेज़ी सेना ने अपने
कारतूस एक तालाब के अन्दर फेंक दिए और शस्त्रागार को आग
लगा दी। फिर भी हैदर को इस क़िले के अन्दर अंगरेज़ों की १८
पीतल की तोपें, तीन हज़ार बन्दूकें और बहुत कुछ गोला बारूद
और रसद का सामान मिला।
जनरल स्मिथ की सेना अब हार पर हार खाकर पीछे हटती
[पार्श्व टिप्पणी: विश्वासघात के पक्ष] जा रही थी। उसकी सहायता के लिए कर्नल
[पार्श्व टिप्पणी: में ईसाई पादरियों] बुड एक नई सेना सहित बंगाल से रवाना
[पार्श्व टिप्पणी: का फ़तवा] किया गया। इसी समय के निकट हैदर की
सेना में विश्वासघात के बीज बोने का अंगरेज़ों
ने एक ख़ासा षड्यन्त्र रचा। अनेक यूरोपियन उस ज़माने में यूरोप
से आकर अनेक हिन्दुस्तानी नरेशों की फ़ौजों में नौकरियाँ कर लेते
थे। हैदर की सेना में भी अनेक यूरोपियन कई ऊँचे पदों पर
नियुक्त थे। कई कम्पनियाँ फ्रांसीसी सिपाहियों की भी उसकी
सेना में शामिल थीं। अंगरेज़ों ने ईसाई पादरियों के ज़रिए हैदर
के इन तमाम यूरोपियन मुलाज़िमों को फोड़ने की कोशिश की। इस
षड्यन्त्र की कुछ भनक हैदर के कानों तक पहुँच गई। उसने अपने
तमाम यूरोपियन मुलाज़िमों को जमा करके उनकी तनख़ाहें दिलवा

हैदरअली ३२७
दीं और उनसे कह दिया कि तुम लोग अगर चाहो तो नौकरी
छोड़ कर जा सकते हो । किन्तु उन सब ने ‘इंजील और सलीब
हाथ में लेकर’ हैदर की वफ़ादारी की क़सम खाई । वे सब फिर
से नौकर रख लिए गए । अंगरेज़ों के जासूस जब फिर इन लोगों
के पास पहुँचे तो अधिकांश यूरोपियन सिपाहियों ने यह एतराज़
किया कि हम ‘इंजील और सलीब हाथ में लेकर’ सुलतान को
वफ़ादारी की क़सम खा चुके हैं । इस पर अंगरेज़ों ने यूरोपियन
ईसाई पादरियों के दस्तख़त से एक फ़तवा लिखवा कर उसकी
नक़लें हैदर के यूरोपियन नौकरों में बँटवा दीं, जिसमें लिखा था
कि—‘‘जो क़समें ‘इंजील और सलीब लेकर’ भी मुसलमानों के
सामने खाई जावें, ईसाई उनके पालन करने के लिए बाध्य नहीं
हैं।” एक फ्रांसीसी लेखक, जो उस समय हैदर की सेना में मौजूद
था, लिखता है कि इस षड्यन्त्र को सफल करने के लिए अंगरेज़ों
ने गुप्त हत्या और जालसाज़ी से भी काम लिया । अंगरेज़ी जासूसों
के पास हैदर के फ्रांसीसी सिपाहियों को फोड़ने के लिए इस समय
पुद्दुचरी के फ्रांसीसी गवरनर का एक जाली ख़त भी मौजूद था ।
इस पर भी हैदर के यूरोपियन मुलाज़िमों में से, जिनमें अधिकांश
फ्रांसीसी थे, बहुत कम ने हैदर के साथ विश्वासघात किया । जिन
यूरोपियन पादरियों ने ऊपर लिखे फ़तवे पर दस्तख़त किए उनमें
से अनेक हैदर की प्रजा थे और हैदर ने उनके साथ अनेक रिआयतें
कर रक्खी थीं ।
इस समय तक यानी सन् १७६८= के अन्त से पहले पहले हैदर

३२८ भारत में अंग्रेज़ी राज
ने अपना यह तमाम इलाक़ा, जो थोड़े दिनों के लिए अंग्रेज़ों के
हाथों में चला गया था, फिर से विजय कर लिया।
किन्तु जिस समय हैदर अपनी तमाम सेना सहित मैसूर राज
की पूर्वी सरहद पर था, अंग्रेज़ों ने एक नई सेना पीछे की ओर से
हैदरअली के पच्छिमी इलाक़े मंगलोर पर हमला करने के लिए भेज
दी। इस सेना ने हैदरअली की ग़ैर मौजूदगी में एक बार आसानी
से मंगलोर पर क़ब्ज़ा कर लिया। मंगलोर विजय की ख़ुशी में
फिर एक सौ एक तोपें मद्रास के क़िले से छोड़ी गईं। हैदरअली
को अब दो ओर से अंग्रेज़ों का मुक़ाबला करना पड़ा। सामने की
ओर जनरल स्मिथ और करनल वुड की सेनाएँ और पीछे की
ओर बम्बई की सेना।
मंगलोर के पतन की ख़बर पाते ही हैदर ने अपने बेटे टीपू को
तीन हज़ार सवार देकर मंगलोर की ओर भेजा। टीपू के पीछे पीछे
हैदर खुद थोड़ी सी सेना लेकर मंगलोर की ओर रवाना हुआ।
बाक़ी सेना उसने अपने सम्बन्धी मख़दूम के अधीन स्मिथ और
वुड के मुक़ाबले के लिए पूर्वी सरहद पर छोड़ दी।
जनरल स्मिथ और करनल वुड ने हैदर की ग़ैर हाज़िरी से
पूरा लाभ उठाया। जनरल स्मिथ ने एक छोटा
सा क़िला इस समय एक बड़ी सुन्दर चाल द्वारा
मख़दूम के आदमियों से ले लिया। स्मिथ ने
अपने एक हरकारे को मख़दूम के हरकारों की सी
पोशाक पहनाई। उसके हाथ मख़दूम का एक जाली पत्र क़िलेदार


[हाशिया / Side note: पंक्तियाँ L19–L22 के बाएँ]
जनरल स्मिथ की
चाल और उसका
जवाब

[Header] हैदरअली ३२६

के पास भेजा, जिसमें लिखा था कि—"अंगरेज़ी सेना तुम्हारे
क़िले पर हमला करने वाली है, इसलिए तुम्हारी मदद के लिए
पाँच सौ सिपाही आज शाम को भेजे जावेंगे, क़िले का फाटक
खुला रखना।" चाल काम कर गई और उसी दिन शाम को कम्पनी
के वरदी बदले हुए सिपाहियों ने जाकर क़िले पर क़ब्ज़ा कर
लिया। मख़दूम को जब यह बात मालूम हुई तो उसने बदला लेने
का इरादा किया। चन्द रोज़ के अन्दर ही उसने अपने कुछ सवारों
को अंगरेज़ी वर्दियाँ पहना कर क़िले के सामने भेजा। इन सवारों
में से एक ने, जो इत्तफ़ाक़ से अंगरेज़ी सेना का भागा हुआ एक
अंगरेज़ सिपाही था, आगे बढ़ कर क़िले के अंगरेज़ अफ़सर से
चिल्लाकर कहा—"हैदर की सेना हम लोगों का पीछा कर रही है।
मेरी सेना के कमांडर की प्रार्थना है कि आप फाटक खोल दीजिये,
ताकि हम सब लोग भीतर आ जावें।" यह चाल भी चल गई और
मख़दूम की सेना ने फिर से उस क़िले के ऊपर क़ब्ज़ा कर लिया।
स्मिथ और वुड दोनों की सेनाएँ मिलकर अब हैदर की ग़ैर
हाज़िरी में बंगलोर विजय करने के इरादे से आगे बढ़ीं। राजधानी
श्रीरंगपट्टन के बाद पूरब में बंगलोर और पश्चिम में मंगलोर ही
मैसूर राज के प्रधान नगर थे।
उधर मंगलोर की प्रजा ने टीपू का बड़े उल्लास के साथ
स्वागत किया। बम्बई की अंगरेज़ी सेना और
[हाशिया: मंगलोर में टीपू की शानदार विजय] टीपू की सेना में एक भयंकर लड़ाई हुई जिसमें
टीपू ने पूरी विजय प्राप्त की। अंगरेज़ सेनापति,

३३० भारत में अंगरेज़ी राज

४६ अंगरेज़ अफ़सरों, ६८० अंगरेज़ सिपाहियों और ६,००० से
ऊपर कम्पनी के हिन्दोस्तानी सिपाहियों को टीपू ने इस लड़ाई में
क़ैद कर लिया और उनके तमाम अस्त्र शस्त्र और सामान ज़ब्त
कर लिया। मंगलोर की यह लड़ाई वास्तव में अंगरेज़ों और हैदर
दोनों के लिए बड़े मार्के की लड़ाई थी। केवल तीस दिन अंगरेज़ी
सेना के क़ब्ज़े में रहने के बाद मंगलोर का क़िला और नगर टीपू
के हाथों में आ गया। नौजवान बेटे की इस शानदार विजय के एक
दिन बाद हैदर अपनी सेना सहित मंगलोर पहुँचा। फ़तह की
ख़बर सुनते ही सुलतान हैदर ने टीपू को छाती से लगा लिया और
मारे ख़ुशी के उसकी आँखों में आँसू आ गए।
मङ्गलोर में पुर्तगाली ईसाइयों के तीन गिरजे थे। ये यूरोपियन
पादरी उस समय की प्रथा के अनुसार अपने को
ब्राह्मण ईसाई “ब्राह्मण ईसाई” कहा करते थे। ब्राह्मणों के से
कपड़े पहनते थे, गले में जनेऊ डालते थे, निरामिष भोजन करते
थे, खड़ाऊँ पहनते थे और ब्राह्मणों का सा सब आचार विचार
रखते थे। इस चाल से उन्हें हिन्दू जनता को ईसाई बनाने में
आसानी होती थी। ये लोग हैदर की प्रजा थे। हैदर ने इनके साथ
अनेक रिआयतें कर रक्खी थीं। फिर भी अंगरेज़ों के मङ्गलोर पर
हमला करते समय इन तीनों गिरजों के यूरोपियन पादरियों ने हैदर
के ख़िलाफ़ उसके शत्रुओं को मदद दी। हैदर को जब इसका पता
लगा तो उसने उनका माल असबाब ज़ब्त कर लिया और उन्हें

हैदरअली ३३१

उस समय तक के लिए क़ैद कर दिया, जब तक कि हैदर और
अंगरेज़ों में सुलह न हो गई।
मङ्गलोर की विजय के बाद हैदर वहाँ की हिफ़ाज़त का
उचित प्रबन्ध कर स्वयं टीपू तथा सेना सहित
[पार्श्व-शीर्षक: हैदरअली मद्रास के फाटक पर] बङ्गलूर की रक्षा के लिए पीछे लौट आया।
इस बार हैदर ने अपनी सेना के तीन हिस्से
किए और वह तीन रास्तों से आगे बढ़ा। जनरल स्मिथ के लिए
बङ्गलूर विजय करने का इरादा स्वप्न मात्र साबित हुआ। हैदर की
सेना के लौटते ही जनरल स्मिथ और करनल वुड की सेना को
बुरी तरह हैदर की सेना के आगे आगे भागना पड़ा। अपने तमाम
इलाक़े से अंगरेज़ी सेना को फिर एक बार बाहर निकाल देने के
बाद हैदर की तीनों सेनाएँ अब अंगरेज़ों और नवाब करनाटक के
इलाक़ों में बढ़ती चली गईं। हैदरअली की सेना के मुक़ाबले में
कम्पनी की सेना के कहीं भी पैर न जम सके। नवाब मोहम्मदअली
बेहद डर गया। बढ़ते बढ़ते हैदर की सेना मद्रास के निकट पहुंचने
लगी। मद्रास का अंगरेज़ गवर्नर और उसकी कौन्सिल के मेम्बर
घबरा गए।
मद्रास की कौन्सिल ने अब कप्तान ब्रूक को हैदर के पास सुलह
के लिए भेजा। हैदर को मौक़ा मिला कि जो व्यवहार चन्द महीने
पहले अंगरेज़ों ने हैदर के दूत के साथ किया था वही अब हैदर
अंगरेज़ दूत के साथ करे। हैदर ने कप्तान ब्रूक को उत्तर दिया—

३३२ भारत में अंगरेज़ी राज
“मैं मद्रास के फाटक पर आ रहा हूँ और गवरनर और उसकी कौन्सिल
को जो कुछ कहना होगा वहीं आकर सुनूँगा।”
कप्तान ब्रूक निराश होकर मद्रास लौट आया। हैदर ने अपना
[अंगरेज़ों का] तमाम भारी सामान और माल असबाब मैसूर भेज
[भयभीत हो] दिया और खुद सेना सहित मद्रास की ओर
[जाना] बढ़ा। हैदर की तमाम सैन्य यात्राएँ अत्यन्त
आश्चर्यजनक होती थीं। विशाल सेनाओं सहित
पूरब से पच्छिम और पच्छिम से पूरब सैकड़ों मील की यात्राएँ
चन्द दिनों के अन्दर तय करना और फिर बिना आराम किए
घबराई हुई अँगरेज़ी सेना पर जा टूटना उसके लिए एक मामूली
बात थी। इस बार साढ़े तीन दिन के अन्दर उसने १३० मील का
फ़ासला तय किया और एक दिन अचानक मद्रास के क़िले से दस
मील की दूरी पर दिखाई दिया। अंगरेज़ भय से काँप उठे। हैदर
की सेना और मद्रास के बीचों बीच सेण्ट टॉमस की पहाड़ी थी।
यह वही जगह थी जिस पर टीपू एक बार क़ब्ज़ा कर चुका था।
अंगरेज़ों ने अब बड़ी फुरती के साथ इस पहाड़ी की रक्षा का
इन्तज़ाम किया और वहाँ पर अपनी सेना जमा की, ताकि हैदर
आसानी से मद्रास तक न पहुँचने पावे। किन्तु अंगरेज़ी सेना अभी
सेण्ट टॉमस पर जमने भी न पाई थी कि हैदर अपनी विशाल सेना
सहित दूर का चक्कर देकर मद्रास क़िले के दूसरी ओर के फाटक
पर आ पहुँचा। अंगरेज़ी सेना क़िले के दूसरी ओर फ़सील से दो
तीन मील के फ़ासले पर थी। अंगरेज़ों के भय की उस समय कोई

हैदरअली ३३३
सीमा न थी। हैदर यदि चाहता तो उसी दम बड़ी आसानी से
मद्रास पर क़ब्ज़ा कर सकता था और कम से कम दक्खिन भारत
से अंगरेज़ों के रहे सहे प्रभाव का ख़ात्मा कर सकता था। किन्तु
उसने कप्तान ब्रूक के साथ वादा कर लिया था कि मद्रास के फाटक
पर आकर मैं सुलह की बातचीत सुन लूँगा। पूर्वीय मर्यादा के
अनुसार उसने अपने वचन का पालन किया। उसने मद्रास के
अंगरेज़ गवर्नर को अपने पहुँचने की सूचना दी। गवर्नर ने तुरन्त
डूप्रे और बौशियर दो अंगरेज़ अफ़सरों को सुलतान हैदरअली से
सुलह करने के लिए भेजा। इन दोनों अंगरेज़ों में डूप्रे आइन्दा के
लिए मद्रास का गवर्नर नियुक्त हो चुका था और बौशियर उस
समय के गवर्नर का सगा भाई था।
हैदर ने बड़े आदर के साथ अंगरेज़ दूतों का स्वागत किया और
उनकी प्रार्थना के अनुसार सेण्ट टॉमस की पहाड़ी पर अपना
ख़ेमा लगवाया। सुलह की शर्तें लिखी जाने लगीं। हैदरअली की
उस समय की स्थिति को बयान करते हुए अंगरेज़ इतिहास लेखक
कर्नल मालेसन लिखता है :—
“वास्तव में हैदर उस समय सारी स्थिति पर हावी था। मद्रास का
देशी नगर और अंगरेज़ों के मकान सब उसकी दया पर थे। उसके आने से
सब के ऊपर इतना आतंक छा गया था कि मद्रास का क़िला भी उसके हाथों
में आ जाता। उसकी स्थिति इस समय ऐसी थी कि वह जो शर्तें चाहता,
अंगरेज़ों से मंजूर करा सकता था और वास्तव में उसने ऐसा ही किया भी।”*

  • "Hyder, in fact, was master of the situation. The native town and

३३४ भारत में अंग्रेज़ी राज
१५ अप्रैल सन् १७६६ को अंगरेज़ों, सुलतान हैदरअली और
[हाशिया: सीरा के सूबेदार] अरकाट के नवाब मोहम्मदअली के दरमियान दो
[हाशिया: और बादशाह] अलग अलग सुलहनामे लिखे गए और हर
[हाशिया: तीसरे जॉर्ज में] सुलहनामे पर तीनों के दस्तख़त हुए ।
[हाशिया: सन्धि] अब तक की सन्धियाँ ईस्ट इण्डिया कम्पनी
और भारतीय नरेशों के बीच हुआ करती थीं।
हैदरअली ने कम्पनी के किसी तरह के राजनैतिक अस्तित्व ही को
स्वीकार करने से इनकार किया। इसलिए इनमें पहला सुलहनामा
इंगलिस्तान के बादशाह के नाम से, जिस तरह हैदर ने चाहा उस
तरह लिखा गया। इस सन्धि में तय हुआ कि इंगलिस्तान के
बादशाह तीसरे जॉर्ज और सीरा प्रान्त के सूबेदार हैदरअली ख़ाँ
और इन दोनों की प्रजा के बीच सदा अमन और मित्रता क़ायम
रहेगी, इत्यादि। हैदरअली का जो कुछ इलाक़ा युद्ध के शुरू में
अंगरेज़ों ने ले लिया था और जिसे हैदरअली फिर से विजय कर
चुका था, वह सब हैदरअली के पास रहा और अंगरेज़ों का जो
कुछ इलाक़ा हाल में हैदरअली ने जीत लिया था, वह उसने अंगरेज़ों
को लौटा दिया। केवल कारूड़ का प्रान्त, जो अंगरेज़ों के दोस्त
अरकाट के नवाब मोहम्मद अली के राज में शामिल था, अंगरेज़ों ने
उससे लेकर सदा के लिए हैदरअली की नज़र कर दिया। युद्ध के


the private houses of Madras were at his mercy. In the panic which his
arrival had caused, the fort itself might have fallen. He was in a position to
dictate his own terms, and, virtually, he did dictate them."—The Decisive
Battles of India, By Colonel Malleson, p. 230.

हैदर अली
[ एम० एम० डी० एल० टी० कृत फ्रेंच पुस्तक के अंगरेज़ी
संस्करण "हिस्ट्री आफ़ हैदरशाह" से ]

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हैदरअली ३३५
ख़र्च और ज़ुरमाने के तौर पर एक बहुत बड़ी रक़म अंगरेज़ों ने
हैदरअली को भेंट की और यह तय हुआ कि भविष्य में यदि
कोई तीसरा हैदरअली पर हमला करेगा तो अंगरेज़ हैदरअली की
मदद करेंगे और यदि कोई अंगरेज़ों पर हमला करेगा तो हैदरअली
उनको मदद करेगा ।
दूसरे सुलहनामे में, जो हैदरअली और मोहम्मदअली के
[हैदरअली और] दरम्यान था, यह तय हुआ कि मोहम्मदअली
[अरकाट के नवाब] अरकाट का नवाब बना रहे; किन्तु आइन्दा
[में सन्धि] से अरकाट का नवाब मैसूर का सामन्त समझा
जावे, छै लाख रुपए सालाना बतौर ख़िराज
मैसूर दरबार को अदा किया करे, और पहले साल का ख़िराज
पेशगी इसी समय अदा किया जावे ।
दोनों सन्धियों के पालन की ज़िम्मेदारी अंगरेज़ों ने अपने
ऊपर ली और इन सब बातों के अलावा हैदरअली के एक जहाज़
के बदले में, जो उन्होंने युद्ध के शुरू में धोखे से बम्बई में ले लिया
था, अंगरेज़ों ने एक नया युद्ध का जहाज़ पचास तोपों सहित हैदर
को भेंट करने का वादा किया ।
इस युद्ध ने साबित कर दिया कि हैदर की वीरता, उसका
युद्ध कौशल और उसकी उदारता तीनों ही ऊँचे दर्जे की थीं और
अंगरेज़ किसी तरह भी उसके मुक़ाबले में न ठहर सकते थे ।
दक्खिनी भारत में अंगरेज़ों की अब काफ़ी दुर्दशा हो चुकी

३३६ भारत में अंगरेज़ी राज
थी। एक फ़्रांसीसी इतिहास लेखक लिखता है कि इस विजय के
[मद्रास क़िले के] अवसर पर हैदर ने अंगरेज़ों से कहकर मद्रास
[फाटक पर एक] के सेण्ट जॉर्ज क़िले के सदर फाटक पर एक चित्र
[चित्र] बनवाया, जिसमें हैदर एक शामियाने के नीचे
तोपों के ढेर के ऊपर बैठा हुआ है, पीछे की ओर
सेण्ट जॉर्ज का क़िला है जिसकी फ़सील पर गवर्नर और उसकी
कौन्सिल के सब अंगरेज़ मेम्बर दोज़ानू बैठे हुए हैदर की ओर
अपने हाथ बढ़ा रहे हैं। अंगरेज़ दूत डूप्रे और बौशियर दोनों हैदर
के सामने ज़मीन पर दोज़ानू बैठे हैं। डूप्रे के नाक की जगह हाथी
की सी सूँड बनी हुई है, हैदर उसकी सूँड को पकड़े हुए है और
उसमें से अशरफ़ियाँ हैदर के सामने खनाखन ज़मीन पर गिर रही हैं।
दूसरी ओर पराजित अंगरेज़ सेनापति जनरल स्मिथ सन्धि पत्र
हाथ में लिए हुए अपने हाथ से अपनी तलवार के दो टुकड़े कर
रहा है।
इस सन्धि का यहाँ तक असर हुआ कि इंगलिस्तान में उसकी
[कम्पनी के हिस्सों] ख़बर पहुँचते ही ईस्ट इण्डिया कम्पनी के हिस्सों
[की दर का गिरना] की दर एकदम गिर कर ४० फ़ी सदी रह गई।
युद्ध के दिनों में ही जैसे जैसे हैदर और टीपू की
विजयों की ख़बरें इंगलिस्तान पहुँचती जाती थीं, कम्पनी के हिस्सों
की दर गिरती जाती थी। इस पर डाइरेक्टरों ने बार बार मद्रास
के अधिकारियों पर ज़ोर दिया कि हैदर के साथ सुलह कर ली
जावे। किन्तु अब सुलह हो जाने पर उन्हीं डाइरेक्टरों ने मद्रास

हैदरअली ३३७
के गवर्नर को लिखा कि जिस तरीक़े से आपने सन्धि की है
उससे—
"आपने हिन्दोस्तान में रहने वाले लोगों के लिए यह समझने की
बुनियाद डाल दी है कि वे जब उनका जी चाहे बेखटके कम्पनी की हतक कर
सकते हैं।"
दोनों सन्धि पत्रों पर कम्पनी की मोहरें लग चुकी थीं, किन्तु
इसके बाद से ही अंगरेज़ों ने सन्धि को तोड़ने के मौक़े ढूंढ़ने शुरू
कर दिए।
थोड़े दिनों बाद मराठों ने चौथी बार मैसूर पर हमला किया।
[हाशिया: मराठों का मैसूर पर हमला और अंगरेज़ों का सन्धि को तोड़ना] हैदर ने सन्धि की शर्तों के अनुसार अंगरेज़ों से
मदद चाही। ऐन मौक़े पर मद्रास कौन्सिल ने
मदद देने से इनकार कर दिया। मजबूर होकर
हैदर ने कुछ धन और अपना कुछ इलाक़ा
मराठों को देकर उनसे पीछा छुड़ाया। किन्तु
अंगरेज़ों की नीयत का उसे पता चल गया।
इसके बाद हैदर ने कुर्ग के राजा को, जो पहले मैसूर का
बाजगुज़ार रह चुका था और अब बाग़ी हो गया था, युद्ध द्वारा
फिर से अपने अधीन किया।
हैदर को अपना जो इलाक़ा मराठों को देना पड़ गया था वह
उसकी नज़रों में खटक रहा था। वह पूना दरबार की अवस्था की
पूरी ख़बर रखता था। जब उसे पेशवा नारायणराव की हत्या और
राघोबा और अंगरेज़ों की साज़िशों की ख़बर मिली तो उसने इस
२२

३३८ भारत में अंगरेज़ी राज
इलाक़े को मराठों से वापस लेने के लिए अपने बेटे टीपू को सेना
सहित भेजा। टीपू ने वह सारा इलाक़ा फिर मराठों से विजय कर
लिया। इसके बाद सन् १७७८ में छै साल के लिए मराठों और
हैदर में सन्धि हो गई।
अंगरेज़ों और हैदर के दरमियान जो सन्धि हुई थी उसका
उल्लंघन हैदर पर मराठों के हमले के समय अंगरेज़ कर ही चुके थे।
दूसरी सन्धि मोहम्मदअली और हैदर के दरमियान थी। उसके
पालन की ज़िम्मेदारी भी अंगरेज़ों ने अपने ऊपर ली थी। किन्तु
मोहम्मदअली का अंगरेज़ों के पंजे से निकल कर मैसूर का
बाजगुज़ार हो जाना अंगरेज़ों के लिए बहुत बुरा था। इसलिए
सन्धि के बाद उन्होंने अपने वादे को पूरा करने के बजाय नवाब
मोहम्मदअली को हैदरअली के ख़िलाफ़ भड़काए रक्खा। मैसूर
की अन्य सामन्त रियासतों को भी उन्होंने अब हैदरअली के
ख़िलाफ़ भड़काना शुरू किया। इनमें एक छोटी सी रियासत
चित्तलद्रुग की थी। अंगरेज़ों ने वहाँ के राजा को भड़काकर उससे
हैदर के ख़िलाफ़ बगावत करवा दी। हैदर ने चित्तलद्रुग पर हमला
करके राजा को फिर से अपने अधीन कर लिया। इस लड़ाई में ही
हैदर ने अंगरेज़ों की बेवफ़ाई का पूरा परिचय पाकर खुले एलान कर
दिया कि मैं अंगरेज़ी इलाक़े पर हमला करने वाला हूँ। उसने फिर
एक बार दक्खिन के अन्दर मुग़ल दरबार के मुख्य नायब निज़ाम
से मदद की प्रार्थना की। निज़ाम ने फिर मदद का वादा किया
और फिर दूसरी बार ऐन मौक़े पर हैदर के साथ दग़ा की।

हैदरअली ३३६
अब वह समय आया जब कि नाना फड़नवीस ने अंगरेज़ों की
चालों और उनसे देश की हानि को अच्छी तरह
हैदर और नाना समझ कर सन् १७८० में अपना एक दूत
फड़नवीस में गणेशराव हैदर के पास मेल करने के लिए भेजा ।
अंगरेज़ों के ख़िलाफ़ हैदर को भी अंगरेज़ों के चरित्र का काफ़ी अनुभव
सन्धि हो चुका था । हैदर और नाना फड़नवीस दोनों
में ख़ास समझौता हो गया । 'चौथ' की उस रक़म को, जो मैसूर
दरबार से पेशवा दरबार को मिला करती थी और जिस पर
मराठों और हैदर में अनेक बार झगड़े हो चुके थे, आइन्दा के लिए
नाना ने बहुत कम कर दिया । हैदर का जो इलाक़ा पहले मराठों ने
ले लिया था और हाल में टीपू ने मराठों से विजय किया था उसे
पेशवा दरबार ने हैदर ही का इलाक़ा स्वीकार कर लिया, और
हैदर ने मराठों से वादा किया कि अंगरेज़ों को हिन्दोस्तान से बाहर
निकालने में मैं आप लोगों की पूरी मदद करूँगा ।
अंगरेज़ों को जब इस सन्धि का पता चला और मालूम हुआ
कि हैदर अंगरेज़ी इलाक़े पर फिर से हमला करने की तैयारी कर
रहा है तो उन्होंने मद्रास से एक दूसरे के बाद दो दूत दोबारा
सन्धि करने के लिए हैदर के दरबार में भेजे । किन्तु हैदर अंगरेज़ों
को पूरी तरह समझ चुका था, उसने स्वीकार न किया । अंगरेज़
दूत ग्रे को उसने अंगरेज़ों की दग़ाबाज़ी पर लानत मलामत की और
अपने यहाँ उसके साथ वह सलूक किया जो एक राजदूत के साथ
नहीं, बल्कि किसी जासूस के साथ किया जाता है ।