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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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हैदरअली ३३७
के गवर्नर को लिखा कि जिस तरीक़े से आपने सन्धि की है
उससे—
"आपने हिन्दोस्तान में रहने वाले लोगों के लिए यह समझने की
बुनियाद डाल दी है कि वे जब उनका जी चाहे बेखटके कम्पनी की हतक कर
सकते हैं।"
दोनों सन्धि पत्रों पर कम्पनी की मोहरें लग चुकी थीं, किन्तु
इसके बाद से ही अंगरेज़ों ने सन्धि को तोड़ने के मौक़े ढूंढ़ने शुरू
कर दिए।
थोड़े दिनों बाद मराठों ने चौथी बार मैसूर पर हमला किया।
[हाशिया: मराठों का मैसूर पर हमला और अंगरेज़ों का सन्धि को तोड़ना] हैदर ने सन्धि की शर्तों के अनुसार अंगरेज़ों से
मदद चाही। ऐन मौक़े पर मद्रास कौन्सिल ने
मदद देने से इनकार कर दिया। मजबूर होकर
हैदर ने कुछ धन और अपना कुछ इलाक़ा
मराठों को देकर उनसे पीछा छुड़ाया। किन्तु
अंगरेज़ों की नीयत का उसे पता चल गया।
इसके बाद हैदर ने कुर्ग के राजा को, जो पहले मैसूर का
बाजगुज़ार रह चुका था और अब बाग़ी हो गया था, युद्ध द्वारा
फिर से अपने अधीन किया।
हैदर को अपना जो इलाक़ा मराठों को देना पड़ गया था वह
उसकी नज़रों में खटक रहा था। वह पूना दरबार की अवस्था की
पूरी ख़बर रखता था। जब उसे पेशवा नारायणराव की हत्या और
राघोबा और अंगरेज़ों की साज़िशों की ख़बर मिली तो उसने इस
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