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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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पृष्ठ 604

हैदरअली ३३३
सीमा न थी। हैदर यदि चाहता तो उसी दम बड़ी आसानी से
मद्रास पर क़ब्ज़ा कर सकता था और कम से कम दक्खिन भारत
से अंगरेज़ों के रहे सहे प्रभाव का ख़ात्मा कर सकता था। किन्तु
उसने कप्तान ब्रूक के साथ वादा कर लिया था कि मद्रास के फाटक
पर आकर मैं सुलह की बातचीत सुन लूँगा। पूर्वीय मर्यादा के
अनुसार उसने अपने वचन का पालन किया। उसने मद्रास के
अंगरेज़ गवर्नर को अपने पहुँचने की सूचना दी। गवर्नर ने तुरन्त
डूप्रे और बौशियर दो अंगरेज़ अफ़सरों को सुलतान हैदरअली से
सुलह करने के लिए भेजा। इन दोनों अंगरेज़ों में डूप्रे आइन्दा के
लिए मद्रास का गवर्नर नियुक्त हो चुका था और बौशियर उस
समय के गवर्नर का सगा भाई था।
हैदर ने बड़े आदर के साथ अंगरेज़ दूतों का स्वागत किया और
उनकी प्रार्थना के अनुसार सेण्ट टॉमस की पहाड़ी पर अपना
ख़ेमा लगवाया। सुलह की शर्तें लिखी जाने लगीं। हैदरअली की
उस समय की स्थिति को बयान करते हुए अंगरेज़ इतिहास लेखक
कर्नल मालेसन लिखता है :—
“वास्तव में हैदर उस समय सारी स्थिति पर हावी था। मद्रास का
देशी नगर और अंगरेज़ों के मकान सब उसकी दया पर थे। उसके आने से
सब के ऊपर इतना आतंक छा गया था कि मद्रास का क़िला भी उसके हाथों
में आ जाता। उसकी स्थिति इस समय ऐसी थी कि वह जो शर्तें चाहता,
अंगरेज़ों से मंजूर करा सकता था और वास्तव में उसने ऐसा ही किया भी।”*

  • "Hyder, in fact, was master of the situation. The native town and